भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 503, कुल 680 में से

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पृष्ठ 503

तृतीय उद्योतः ४४३ ध्वन्यालोकः रसाद्यनुगुणत्वेन व्यवहारोऽर्थशब्दयोः । औचित्यवान्यस्ता एता वृत्तयो द्विविधाः स्थिताः ॥३३॥ व्यवहारो हि वृत्तिरित्युच्यते । तत्र रसानुगुण औचित्यवान् वाच्याश्रयो यो व्यवहारस्ता एताः कैशिक्याद्या वृत्तयः । वाचकाश्रया- श्चोपनागरिकाद्याः । वृत्तयो हि रसादितात्पर्येण संनिवेशिताः कामपि नाट्यस्य काव्यस्य च च्छायामावहन्ति । रसादयो हि द्वयोरपि तयोर्जीवभूताः । इतिवृत्तादि तु शरीरभूतमेव । अत्र केचिदाहुः—‘गुणगुणिव्यवहारो रसादीनामितिवृत्तादिभिः सह युक्तः, न तु जीवशरीरव्यवहारः । रसादिमयं हि वाच्यं प्रतिभासते न तु रसादिभिः पृथग्भूतम्’ इति । अत्रोच्यते—यदि रसादिमयमेव अर्थ और शब्द का रसादि के अनुगुण रूप से जो औचित्यवान् व्यवहार है वह ये दो प्रकार की वृत्तियां मानी गई हैं ॥ ३३ ॥ व्यवहार 'वृत्ति' कहलाता है । वहां रस के अनुगुण औचित्यवान् वाच्याश्रित जो व्यवहार है वे ये कैशिकी आदि वृत्तियां हैं । और वाचकाश्रित (वृत्तियां) उपनाग- रिका आदि हैं । वृत्तियां रसादि के तात्पर्य से संनिवेशित होकर नाट्य और काव्य की अपूर्व शोभा कर देती हैं । रसादि उन दोनों के भी जीवभूत हैं । इतिवृत्त आदि तो शरीरभूत ही हैं । यहां कुछ लोग कहते हैं—'रसादि का इतिवृत्त आदि के साथ गुणगुणिव्यवहार ठीक है न कि जीव-शरीरव्यवहार । क्यों कि वाच्य रसादिमय प्रतीत होता है न कि रसादि से पृथग्भूत (प्रतीत होता है)' । यहां कहते हैं—यदि वाच्य रसादिमय ही लोचनम् इत्यादिना रसोपयोगजीवितः शब्दवृत्तिलक्षणो व्यवहार उक्तः । शरीरभूत- मिति । 'इतिवृत्तं हि नाट्यस्य शरीरं' इति मुनिः । नाट्यं च रस एवेत्युक्तं प्राक् । गुणगुणिव्यवहार इति । अत्यन्तसम्मिश्रतया प्रतिभासनाद्धर्मधर्मिव्यवहारो युक्तः । न त्विति । क्रमस्यासंवेदनादिति भावः । इत्यादि द्वारा रस के उपयोग से जीवित शब्दवृत्तिरूप व्यवहार कहा गया है । शरीरभूत—। मुनि के अनुसार 'इतिवृत्त नाट्य का शरीर है' । और नाट्य रस ही है यह पहले कह चुके हैं । गुणगुणिव्यवहार—। अत्यन्त मिले-जुले (सम्मिश्र) रूप से मालूम पड़ने के कारण धर्मधर्मिव्यवहार ठीक है । न कि—। भाव यह कि क्रम मालूम नहीं पड़ता ।

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