ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
तृतीय उद्योतः ४४३ ध्वन्यालोकः रसाद्यनुगुणत्वेन व्यवहारोऽर्थशब्दयोः । औचित्यवान्यस्ता एता वृत्तयो द्विविधाः स्थिताः ॥३३॥ व्यवहारो हि वृत्तिरित्युच्यते । तत्र रसानुगुण औचित्यवान् वाच्याश्रयो यो व्यवहारस्ता एताः कैशिक्याद्या वृत्तयः । वाचकाश्रया- श्चोपनागरिकाद्याः । वृत्तयो हि रसादितात्पर्येण संनिवेशिताः कामपि नाट्यस्य काव्यस्य च च्छायामावहन्ति । रसादयो हि द्वयोरपि तयोर्जीवभूताः । इतिवृत्तादि तु शरीरभूतमेव । अत्र केचिदाहुः—‘गुणगुणिव्यवहारो रसादीनामितिवृत्तादिभिः सह युक्तः, न तु जीवशरीरव्यवहारः । रसादिमयं हि वाच्यं प्रतिभासते न तु रसादिभिः पृथग्भूतम्’ इति । अत्रोच्यते—यदि रसादिमयमेव अर्थ और शब्द का रसादि के अनुगुण रूप से जो औचित्यवान् व्यवहार है वह ये दो प्रकार की वृत्तियां मानी गई हैं ॥ ३३ ॥ व्यवहार 'वृत्ति' कहलाता है । वहां रस के अनुगुण औचित्यवान् वाच्याश्रित जो व्यवहार है वे ये कैशिकी आदि वृत्तियां हैं । और वाचकाश्रित (वृत्तियां) उपनाग- रिका आदि हैं । वृत्तियां रसादि के तात्पर्य से संनिवेशित होकर नाट्य और काव्य की अपूर्व शोभा कर देती हैं । रसादि उन दोनों के भी जीवभूत हैं । इतिवृत्त आदि तो शरीरभूत ही हैं । यहां कुछ लोग कहते हैं—'रसादि का इतिवृत्त आदि के साथ गुणगुणिव्यवहार ठीक है न कि जीव-शरीरव्यवहार । क्यों कि वाच्य रसादिमय प्रतीत होता है न कि रसादि से पृथग्भूत (प्रतीत होता है)' । यहां कहते हैं—यदि वाच्य रसादिमय ही लोचनम् इत्यादिना रसोपयोगजीवितः शब्दवृत्तिलक्षणो व्यवहार उक्तः । शरीरभूत- मिति । 'इतिवृत्तं हि नाट्यस्य शरीरं' इति मुनिः । नाट्यं च रस एवेत्युक्तं प्राक् । गुणगुणिव्यवहार इति । अत्यन्तसम्मिश्रतया प्रतिभासनाद्धर्मधर्मिव्यवहारो युक्तः । न त्विति । क्रमस्यासंवेदनादिति भावः । इत्यादि द्वारा रस के उपयोग से जीवित शब्दवृत्तिरूप व्यवहार कहा गया है । शरीरभूत—। मुनि के अनुसार 'इतिवृत्त नाट्य का शरीर है' । और नाट्य रस ही है यह पहले कह चुके हैं । गुणगुणिव्यवहार—। अत्यन्त मिले-जुले (सम्मिश्र) रूप से मालूम पड़ने के कारण धर्मधर्मिव्यवहार ठीक है । न कि—। भाव यह कि क्रम मालूम नहीं पड़ता ।
४४४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः वाच्यं यथा गौरत्वमयं शरीरम्। एवं सति यथा शरीरे प्रतिभासमाने नियमेनैव गौरत्वं प्रतिभासते सर्वस्य तथा वाच्येन सहैव रसादयोऽपि सहृदयस्यासहृदयस्य च प्रतिभासेरन्। न चैवम्; तथा चैतत्प्रतिपादि- तमेव प्रथमोद्द्योते। स्यान्मतम्; रत्नानामिव जात्यत्वं प्रतिपत्तृविशेषतः संवेद्यं वाच्यानां है, जैसे शरीर गौरत्वमय है। ऐसा होने पर जैसे शरीर के प्रतीत होने पर नियमतः ही गौरत्व सबको प्रतीत होता है उस प्रकार वाच्य के साथ ही रसादि भी सहृदय और असहृदय को प्रतीत होने चाहिए। और ऐसा नहीं होता, जैसा कि प्रथम उद्योत में प्रतिपादन किया ही जा चुका है। यह कह सकते हैं कि रत्नों के जात्यत्व की भांति वाच्यों का रसादिरूपत्व प्रति- लोचनम् प्रथमेति। 'शब्दार्थशासनज्ञानमात्रेणैव न वेद्यते' इत्यादिना प्रतिपादितमदः। ननु यद्यस्य धर्मरूपं तत्तत्प्रतिभाने सर्वस्य नियमेन भातीत्यनैकान्तिकमेतत्। माणिक्यधर्मो हि जात्यत्वलक्षणो विशेषो न तत्प्रतिभासेऽपि सर्वस्य नियमेन भातीत्याशङ्कते-स्यादिति। एतत्परिहरति-नैवमिति। एतदुक्तं भवति- अत्यन्तोन्मग्नस्वभावत्वे सति तद्धर्मत्वादिति विशेषणमस्माभिः कृतम्। उन्मग्न- रूपता च न रूपवज्जात्यत्वस्य, अत्यन्तलीनस्वभावत्वात्। रसादीनां चोन्म- ग्नतास्त्येवेत्येवं केचिदेतं ग्रन्थमनेषुः। अस्मद्गुरवस्त्वाहुः-अत्रोच्यत इत्य- नेनेदमुच्यते-यदि रसादयो वाच्यानां धर्मास्तथा सति द्वौ पक्षौ रूपादिसदृशा प्रथम-। 'शब्द और अर्थ के शासन के ज्ञान मात्र से नहीं जाना जाता है' इत्यादि द्वारा यह प्रतिपादन किया जा चुका है। (शङ्का) जो (गौरत्वादि) जिस (शरीरादि) का धर्मरूप है, वह (गौरत्वादि) उस (शरीरादि) के प्रतीत होने पर सब को नियमतः प्रतीत होते हैं, यह (नियम) अनैकान्तिक (व्यभिचारी) है, क्योंकि माणिक्य का धर्म जात्यत्वरूप विशेष उस (माणिक्य) के प्रतीत होने पर भी सबको नियमतः प्रतीत नहीं होता, यह आशङ्का करते हैं-यह कह सकते हैं-। इसका परिहार करते हैं-ऐसा नहीं-। बात यह कही गई-'हमने यह विशेषण बनाया है कि उसका धर्म अत्यन्त उन्मग्न स्वभाव वाला होना चाहिए (अर्थात् धर्म को वस्तु से अत्यन्त भिन्न रूप से प्रतीत होना चाहिए)। और जात्यत्व में रूप की भांति उन्मग्नरूपता (वस्तु से भिन्नरूपता) नहीं, क्योंकि वह अत्यन्त लीन स्वभाव का है। और रसादि में उन्मग्नता है ही' इस प्रकार इसको कुछ लोगों ने लगाया है। परन्तु हमारे गुरु कहते हैं-'यहां कहते हैं' इससे यह बात कही गई है-यदि रसादि वाच्यों के धर्म हैं, ऐसा होने पर दो पक्ष होंगे (तो वे रसादि
तृतीय उद्योतः ४४५ ध्वन्यालोकः रसादिरूपत्वमिति। नैवम्; यतो यथा जात्यत्वेन प्रतिभासमाने रत्ने रत्नस्वरूपानतिरिक्तत्वमेव तस्य लक्ष्यते तथा रसादीनामपि विभावा- नुभावादिरूपवाच्याव्यतिरिक्तत्वमेव लक्ष्येत । न चैवम्; न हि विभावानुभावव्यभिचारिण एव रसा इति कस्यचिदवगमः । अत एव च विभावादिप्रतीत्यविनाभाविनी रसादीनां प्रतीतिरिति तत्प्रतीत्योः पत्ता विशेष द्वारा संवेद्य है । ( किन्तु ) ऐसा नहीं; क्योंकि जिस प्रकार जात्यत्व रूप से प्रतिभासमान रत्न में उस ( जात्यत्व ) को रत्न के स्वरूप से अनतिरिक्तता लक्षित होती है उस प्रकार रसादि की भी विभाव, अनुभाव आदि रूप वाच्य से अव्यति- रिक्तता ही लक्षित होनी चाहिए । किन्तु ऐसा नहीं होता, क्योंकि किसी के ऐसी प्रतीति नहीं होती कि विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी ही रस हैं । और इसलिए विभावादि की प्रतीति की अविनाभाविनी रसादि की प्रतीति है, इस प्रकार उन लोचनम् वा स्युर्माणिक्यगतजात्यत्वसदृशा वा । न तावत्प्रथमः पक्षः, सर्वान् प्रति तथा- नवभासात् । नापि द्वितीयः, जात्यत्ववदनतिरिक्तत्वेनाप्रकाशनात् । एष च हेतुराद्येऽपि पक्षे सङ्गच्छत एव । तदाह—स्यान्मतमित्यादिना न चैवमित्य- न्तेन । एतदेव समर्थयति—न हीति । अत एव चेति । यतो न वाच्यधर्मत्वेन रसादीनां प्रतीतिः, यतश्च तत्प्रतीतौ वाच्यप्रतीतिः सर्वथानुपयोगिनी तत एव हेतोः क्रमेणावश्यं भाव्यं, सहभूतयोरुपकाराद्योगात् । स तु सहृदयभावना- भ्यासान्न लक्ष्यते अन्यथा तु लक्ष्येतापीत्युक्तं प्राक् । यस्यापि प्रतीतिविशेषा- त्मैव रस इत्युक्तिः, प्राक्तस्यापि व्यपदेशिवद्भाद्रसादीनां प्रतीतिरित्येवमन्यत्र । धर्म ) रूपादि के सदृश हैं अथवा माणिक्य में रहने वाले जात्यत्व के सदृश हैं । प्रथम पक्ष नहीं होगा, क्योंकि ( रसादि धर्म ) सब को उस प्रकार प्रतीत नही होते । दूसरा भी नहीं होगा, क्योंकि जात्यत्व की भांति अनतिरिक्त रूप से प्रकाशित नहीं होते । यह हेतु प्रथम पक्ष में संगत होता ही है । उसे कहते हैं—'यह कह सकते हैं' इत्यादि द्वारा 'ऐसा नहीं इस ( ग्रन्थ ) तक । इसी का समर्थन करते हैं—नहीं होती कि—। और इसलिए—। जिस कारण वाच्य के धर्म के रूप में रसादि की प्रतीति नहीं है और जिस कारण उस ( रसादि ) की प्रतीति में वाच्य की प्रतीति सर्वथा अनुपयोगिनी है उसी कारण से क्रम को अवश्य होना चाहिए । क्योंकि साथ में उत्पन्न होने वाले एक दूसरे का उपकार नहीं कर सकते । परन्तु वह क्रम सहृदयों की भावना के अभ्यास से नहीं लक्षित होता अन्यथा लक्षित भी होता यह पहले कह चुके हैं । पहले जिसकी भी यह उक्ति है कि रस प्रतीतिविशेष रूप ही है उसकी भी रसादि की प्रतीति ( 'राहु का सिर' की भांति ) व्यपदेशिवद्भाव ( भेदारोप ) से होगी । इसी प्रकार अन्यत्र भी ।
४४६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः कार्यकारणभावेन व्यवस्थानात्क्रमोऽवश्यम्भावी। स तु लाघवान्न प्रकाश्यते 'इत्यलक्ष्यक्रमा एव सन्तो व्यङ्ग्या रसादयः' इत्युक्तम्। ननु शब्द एव प्रकरणाद्यवच्छिन्नो वाच्यव्यङ्ग्ययोः सममेव प्रतीतिमुपजनयतीति किं तत्र क्रमकल्पनया। न हि शब्दस्य वाच्य- प्रतीतिपरामर्श एव व्यञ्जकत्वे निवन्धनम्। तथा हि गीतादिशब्देभ्यो- ऽपि रसाभिव्यक्तिरस्ति। न च तेषामन्तरा वाच्यपरामर्शः। अत्रापि प्रतीतियों में कार्यकारणभाव के होने से क्रम अवश्यम्भावी है, परन्तु वह लाघव के कारण प्रकाशित नहीं होता, इस लिए 'अलक्ष्यक्रम होते हुए ही रसादि व्यङ्ग्य होते हैं' यह कहा गया है। (शङ्का) शब्द ही प्रकरणादि से सहकृत होकर वाच्य और व्यङ्ग्य की साथ ही प्रतीति उत्पन्न करता है, वहाँ क्रम की कल्पना से क्या ? वाच्य की प्रतीति का परामर्श ही शब्द के व्यञ्जक होने में कारण तो है नहीं। जैसा कि गीत आदि शब्दों से भी रस की अभिव्यक्ति है, न कि बीच में उन (गीतादि शब्दों) के वाच्य का लोचनम् ननु भवन्तु वाच्यादतिरिक्ता रसाद्यस्तत्रापि क्रमो न लक्ष्यत इति ताव- त्त्वयैवोक्तम्। तत्कल्पने च प्रमाणं नास्ति। अन्वयव्यतिरेकाभ्यामर्थप्रतीति- मन्तरेण रसप्रतीत्युदयस्य पदविरहितस्वरालापगीतादौ शब्दमात्रोपयोगकृतस्य दर्शनात्। ततश्चैकयैव सामग्र्या सहैव वाच्यं व्यङ्ग्याभिमतं च रसादि भातीति वचनव्यञ्जनव्यापारद्वयेन न किञ्चिदिति तदाह—नन्विति। यत्रापि गीतशब्दानामर्थोऽस्ति तत्रापि तत्प्रतीतिरनुपयोगिनी ग्रामरागानुसारेणापहस्ति- तवाच्यानुसारतया रसोदयदर्शनात्। न चापि सा सर्वत्र भवन्ती दृश्यते, तदेतदाह—न चेति। तेषामिति गीतादिशब्दानाम्। आदिशब्देन वाद्यविल- मानते हैं कि रसादि वाच्य से अतिरिक्त हैं, उनमें भी क्रम लक्षित नहीं होता यह बात तुमने ही कही है। उस (क्रम) की कल्पना में प्रमाण नहीं है। क्योंकि अन्वय- व्यतिरेक से अर्थ की प्रतीति के बिना, पदविरहित स्वरालाप वाले गीतादि में शब्दमात्र के उपयोग से हुआ रस-प्रतीति का उदय देखा जाता है। तब एक ही सामग्री से साथ ही वाच्य और व्यङ्ग्य के रूप में अभिमत रसादि प्रतीत होता है, इस प्रकार दो वचन और व्यञ्जन व्यापार से कुछ नहीं होता, उसे कहते हैं—(शङ्का)—। जहां भी गीत के शब्दों का अर्थ है वहां भी उसकी प्रतीति का उपयोग नहीं, क्योंकि ग्राम्य, राग के अनुसार वाच्य का अनुसरण छोड़ देने से रस का उदय देखा जाता है। ऐसा नहीं कि वह (वाच्य की प्रतीति) सब जगह होती देखी जाती है, इसलिए यह कहते हैं—न कि—। 'उनका' गीतादि शब्दों का। 'आदि' शब्द से वाद्य शब्द, विलपित शब्द आदि
तृतीय उद्योतः ४४७ ध्वन्यालोकः ब्रूमः—प्रकरणाद्यवच्छेदेन व्यञ्जकत्वं शब्दानामित्यनुमतमेवैतदस्मा- कम् । किं तु तद्व्यञ्जकत्वं तेषां कदाचित्स्वरूपविशेषनिबन्धनं कदाचि- द्वाचकशक्तिनिबन्धनम् । तत्र येषां वाचकशक्तिनिबन्धनं तेषां यदि वाच्यप्रतीतिमन्तरेणैव स्वरूपप्रतीत्या निष्पन्नं तद्भवेन्न तर्हि वाचक- शक्तिनिबन्धनम् । अथ तन्निबन्धनं तन्नियमेनैव वाच्यवाचकभाव- प्रतीत्युत्तरकालत्वं व्यङ्ग्यप्रतीतेः प्राप्तमेव । परामर्श होता है । (समाधान) यहां भी हम कहते हैं—प्रकरण आदि के सहकार से शब्दों का व्यञ्जकत्व है यह हमें अनुमत ही है । किन्तु वह व्यञ्जकत्व उनका कभी स्वरूप विशेष के कारण और कभी वाचक शक्ति के कारण है। उनमें जिनका वाचक शक्ति के कारण है उनके यदि वाच्य की प्रतीति के बिना ही स्वरूप की प्रतीति से वह निष्पन्न हो तो वाचकशक्तिमूलक नहीं है और यदि वाचकशक्ति- मूलक है तो नियमतः ही व्यङ्ग्य की प्रतीति का वाच्यवाचकभाव की प्रतीति के उत्तरकाल में होना प्राप्त ही है। लोचनम् पितशब्दादयो निर्दिष्टाः । अनुमतमिति । ‘यत्रार्थः शब्दो वा’ इति ह्यवोचामेति भावः । न तर्हीति । ततश्च गीतवदेवार्थावगमं विनैव रसावभासः स्यात्काव्य- शब्देभ्यः, न चैवमिति वाचकशक्तिरपि तत्रापेक्षणीया; सा च वाच्यनिष्ठैवेति प्राग्वाच्ये प्रतिपत्तिरित्युपगन्तव्यम् । तदाह—अथेति । तदिति वाचकशक्तिः । वाच्यवाचकभावेति । सैव वाचकशक्तिरित्युच्यते । एतदुक्तं भवति—मा भूद्वाच्यं रसादिव्यञ्जकम्; अस्तु शब्दादेव तत्प्रतीति- स्तथापि तेन स्ववाचकशक्तिस्तस्यां कर्तव्यायां सहकारितयावश्यापेक्षणीये- त्यायातं वाच्यप्रतीतेः पूर्वभावित्वमिति । ननु गीतशब्दवदेव वाचकशक्तिरत्रा- निर्दिष्ट हैं । अनुमत—। भाव यह कि ‘जहां अर्थ अथवा शब्द’० यह हमने कहा है । तो वाचकशक्तिमूलक नहीं है—। तब तो गीत ही की भांति अर्थज्ञान के बिना ही काव्य-शब्दों से रस की प्रतीति होगी, पर ऐसा नहीं, इसलिए वहां वाचकशक्ति की अपेक्षा है; और वह वाच्यनिष्ठ ही है, अतः पहले वाक्य का ज्ञान मानना चाहिए । उसे कहते हैं—यदि—। ‘वह’ अर्थात् वाचकशक्ति । वाच्यवाचकभाव—। वही वाचकशक्ति कहलाता है । बात यह कही गई—वाच्य रसादि का व्यञ्जक मत हो; शब्द ही से उनकी प्रतीति हो, तथापि उसे (शब्द को) अपनी वाचकशक्ति की उसे (रसादि की प्रतीति को) उत्पन्न करने में अवश्य अपेक्षा करनी होगी, इस कारण वाच्य की प्रतीति का पहले उत्पन्न होने की बात आ जाती है । (शङ्का) गीत शब्दों की भांति ही यहां भी वाचक-
४४८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः स तु क्रमो यदि लाघवान्न लक्ष्यते तत्किं क्रियते । यदि च वाच्यप्रतीतिमन्तरेणैव प्रकरणाद्यवच्छिन्नशब्दमात्रसाध्या रसादिप्रतीतिः स्यात्तदनवधारितप्रकरणानां वाच्यवाचकभावे च स्वयमव्युत्पन्नानां प्रतिपत्तॄणां काव्यमात्रश्रवणादेवासौ भवेत् । सहभावे च वाच्यप्रतीते- वह क्रम यदि लाघव के कारण लक्षित नहीं होता तो क्या किया जाय ? और यदि वाच्य-प्रतीति के बिना ही प्रकरणादि से सहकृत शब्दमात्र से साध्य रसादि की प्रतीति हो तो प्रकरण को नहीं समझे और स्वयं वाच्यवाचकभाव में व्युत्पत्तिरहित ज्ञाताओं को काव्यमात्र के सुनने से वह ( रसादि की प्रतीति ) होनी चाहिए । (वाच्य और व्यङ्ग्य की प्रतीति के) साथ होने पर वाच्य की प्रतीति का कोई उपयोग लोचनम् प्यनुपयोगिनी, यत्तु क्वचिच्छ्रुतेऽपि काव्ये रसप्रतीतिर्न भवति तत्रोचितः प्रक- रणावगमादिः सहकारी नास्तीत्याशङ्क्याह - यदि चेति । प्रकरणावगमो हि क उच्यते ? किं वाक्यान्तरसहायत्वम् ? अथ वाक्यान्तराणां सम्बन्धित्वाच्यम् । उभयपरिज्ञानेऽपि न भवति प्रकृतवाक्यार्थावेदने रसोदयः । स्वयमिति । प्रक- रणमात्रमेव परेण केनचिद्येषां व्याख्यातमिति भावः । न चान्वयव्यतिरेकवर्ती वाच्यप्रतीतिमपह्नुत्यादृष्टसद्भावाभावौ शरणत्वेनाश्रितौ मात्सर्यादधिकं किञ्चि- त्पुष्णीत इत्यभिप्रायः । नन्वस्तु वाच्यप्रतीतेरुपयोगः क्रमाश्रयेण किं प्रयोजनम् , सहभावमात्रमेव ह्युपयोग एकसामग्र्यधीनतालक्षणमित्याशङ्क्याह - सहेति । एवं ह्युपयोग इति अनुपकारके सञ्ज्ञाकरणमात्रं वस्तुशून्यं स्यादिति भावः । उपकारिणो हि पूर्व- शक्ति का कोई उपयोग नहीं, किन्तु जो कहा पर काव्य के सुनने पर भी रस की प्रतीति नहीं होती है वहां उचित प्रकरण-ज्ञान आदि सहकारी नहीं है, यह आशङ्का करके कहते हैं—और यदि—। प्रकरण-ज्ञान किसको कहते हैं ? सहकारी वाक्यान्तर क्या है ? यदि वाक्यान्तरों का वाच्य है तो दोनों के ( वाक्यान्तर और उसका वाच्य ) परिज्ञान से भी प्रकृत वाक्य के अर्थ का ज्ञान करने पर रस का उदय नहीं होता। स्वयं—। भाव यह कि किसी दूसरे ने किन्हीं ( ज्ञाताओं ) का प्रकरणमात्र ही व्याख्यान किया है । अभिप्राय यह कि यदि अन्वय-व्यतिरेक वाली वाच्यप्रतीति का अपह्नव करके प्रयोजक रूप से अदृष्ट के सद्भाव और अभाव को मानते हैं तो वे मात्सर्य से अधिक और की पुष्टि नहीं करते हैं । अच्छा, वाच्य की प्रतीति का उपयोग तो माना, पर क्रम के आश्रयण से क्या प्रयोजन है ? एक सामग्री की अधीनतारूप सहभावमात्र ही उपयोग है, यह आशङ्का करके कहते हैं—सहभाव—। भाव यह कि इस प्रकार यदि उपयोग है तो अनुपकारक का सिर्फ नामकरण वस्तुशून्य होगा । क्योंकि आपने भी अङ्गीकार किया है कि जो
तृतीय उद्योतः ४४९
ध्वन्यालोकः
रनुपयोगः, उपयोगे वा न सहभावः । येषामपि स्वरूपविशेषप्रतीति-
निमित्तं व्यञ्जकत्वं यथा गीतादिशब्दानां तेषामपि स्वरूपप्रतीतेर्व्यङ्ग्य-
प्रतीतेश्च नियमभावी क्रमः । तत्तु शब्दस्य क्रियापौर्वापर्यमनन्यसाध्य-
तत्फलघटनास्वाशुभाविनीषु वाच्येनाविरोधिन्यभिधेयान्तरविलक्षणे
रसादौ न प्रतीयते ।
नहीं है और यदि उपयोग है तो ( उन दोनों का ) सहभाव नहीं होगा । और
जिनका भी स्वरूपविशेष प्रतीतिमूलक व्यञ्जकत्व है, जैसे गीतादि शब्दों का, उनकी
भी स्वरूपप्रतीति और व्यङ्ग्यप्रतीति का नियमतः क्रम है । किन्तु वह शब्द की
क्रियाओं का पौर्वापर्य अनन्यसाध्य उस फल वाली आशुभाविनी घटनाओं में वाच्य से
विरोध न रखने वाले तथा अन्य वाच्य से विलक्षण रसादि में प्रतीत नहीं होता है ।
लोचनम्
भावितेति त्वयाप्यङ्गीकृतमित्याह—येषामिति । त्वद्दृष्टान्तेनैव वयं वाच्य-
प्रतीतेरपि पूर्वभावितां समर्थयिष्याम इति भावः । ननु संलक्ष्यक्रमः किं न लक्ष्यत
इत्याशङ्क्याह- तत्त्विति । क्रियापौर्वापर्यमित्यनेन क्रमस्य स्वरूपमाह—क्रियते
इति । क्रिये वाच्यव्यङ्ग्यप्रतीती यदि वाभिधाव्यापारो व्यञ्जनापर्यायो
ध्वननव्यापारश्चेति क्रिये तयोः पौर्वापर्यं न प्रतीयते । क्वत्याह—रसादौ विषये ।
कीदृशि ? अभिधेयान्तरात्तदभिधेयविशेषाद्विलक्षणे सर्वथैवानभिधेये अनेन
भवितव्यं तावत्क्रमेणोत्युक्तम् । तथा वाच्येनाविरोधिनि, विरोधिनि तु लक्ष्यत
एवेत्यर्थः । कुतो न लक्ष्यते इति निमित्तसप्तमीनिर्दिष्टं हेत्वन्तरगर्भं हेतुमाह—
आशुभाविनीष्विति । अनन्यसाध्यतत्फलघटनासु घटनाः पूर्वं माधुर्यादिलक्षणाः
उपकारी होता है वह पहले होता है, यह कहते हैं— जिनका—। भाव यह कि तुम्हारे
दृष्टान्त से ही हम वाच्य-प्रतीति का भी पूर्व में होना समर्थन करेंगे । तो यदि क्रम है
तो क्यों नहीं लक्षित होता, यह आशङ्का करके कहते हैं— किन्तु वह—। ‘क्रियाओं
का पौर्वापर्य’ इसके द्वारा क्रम का स्वरूप कहते हैं—क्रिया—। ‘जो की जांय’ वे क्रिया
हैं, यहां वाच्य और व्यङ्ग्य की प्रतीतियां ( क्रिया ) हैं, अथवा अभिधाव्यापार और
व्यञ्नाख्य ध्वनन व्यापार, ये क्रियायें हैं, उनका पौर्वापर्य प्रतीत नहीं होता । कहां ?
इस पर कहते हैं—रसादि विषय में । किस प्रकार के ? उस अभिधेय विशेष अभिधेया-
न्तर से विलक्षण, अर्थात् उसे सर्वथा ही अनभिधेय होना चाहिए इसलिए ‘क्रम से’ यह
कहा है । अर्थात् वह भी वाच्य से विरोध वाले ( रसादि में ), अविरोध वाले में तो
लक्षित ही हो जाता है । किस कारण लक्षित नहीं होता, इस ( प्रश्न के समाधान में )
निमित्तसप्तमी के द्वारा निर्देश करके दूसरा हेतु देते हुए हेतु कहते हैं—आशुभाविनी—।
‘अनन्यसाध्य उस फल वाली घटनाओं में’ पहले गुणनिरूपण के अवसर में प्रतिपादित
२६ ध्व०
४५० सलोचन-ध्वन्यालोकः
लोचनम् प्रतिपादिता गुणनिरूपणावसरे ताश्च तत्फलाः रसादिप्रतीतिः फलं यासाम् , तथा अनन्यत्तदेव साध्यं यासाम्, न ह्योजोघटनायाः करुणादिप्रतीतिः साध्या । एतदुक्तं भवति—यतो गुणवति काव्येऽसंकीर्णविषयतया सङ्घटना प्रयुक्ता ततः क्रमो न लक्ष्यते । ननु भवत्वेवं सङ्घटनानां स्थितिः, क्रमस्तु किं न लक्ष्यते अत आह—आशुभाविनीषु । वाच्यप्रतीतिकालप्रतीक्षणेन विनैव झटित्येव ता रसादीन् भावयन्ति तदास्वादं विदधतीत्यर्थः । एतदुक्तं भवति— सङ्घटनाव्यङ्ग्यत्वाद्रसादीनामनुपयुक्तेऽप्यर्थविज्ञाने पूर्वमेवोचितसङ्घटनाश्रवण एव यत आसूत्रितो रसास्वादस्तेन वाच्यप्रतीत्युत्तरकालभवेन परिस्फुटास्वाद- युक्तोऽपि पश्चादुत्पन्नत्वेन न भाति । अभ्यस्ते हि विषयेऽविनाभावप्रतीतिक्रम इत्थमेव न लक्ष्यते । अभ्यासो ह्ययमेव यत्प्रणिधानादिनापि विनैव संस्कारस्य बलवत्त्वात्सदैव प्रबुभुत्सुतया अवस्थापनमित्येवं यत्र धूमस्तत्राग्निरिति हृदय- स्थितत्वाद्ध्याप्तेः पक्षधर्मज्ञानमात्रमेवोपयोगि भवतीति परामर्शस्थानमाक्रमति, झटित्युत्पन्ने हि धूमज्ञाने तद्व्याप्तिस्मृत्युपकृते तद्विजातीयप्रणिधानानुसरणादि- प्रतीत्यन्तरानुप्रवेशविरहादाशुभाविन्यामग्निप्रतीतौ क्रमो न लक्ष्यते तद्वदिहापि । माधुर्यादि लक्षण घटनाएं, रसादि की प्रतीति रूप फल है जिनका ऐसे वे (घटनाएं ), तथा नहीं अन्य (अर्थात् वही) है साध्य जिनका (ऐसी वे घटनाएं), ओज वाली घटना का साध्य करुण आदि की प्रतीति नहीं है । बात यह कही गई—जिस कारण गुणवान् काव्य में असङ्कीर्ण विषय के रूप में सङ्घटनाएं प्रयुक्त होती हैं, उस कारण क्रम लक्षित नहीं होता । इस प्रकार की सङ्घट- नाओं की स्थिति हो, किन्तु क्रम क्यों नहीं लक्षित होता है ? इसलिए कहते हैं— आशुभाविनी—। वाच्य की प्रतीतिकाल की प्रतीक्षा के बिना ही झट से वे रसादि का भावन करने लगती है, अर्थात् उनका आस्वाद कराने लगती हैं । बात यह कही गई— रसादि के सङ्घटना से व्यङ्ग्य होने के कारण अर्थज्ञान के अनुपयुक्त होने पर भी पहले ही उचित सङ्घटना के श्रवण में ही जिस कारण थोड़ा स्फुरित (आसूत्रित) रसास्वाद होता है, (वह) वाच्य की प्रतीति के उत्तरकाल में होने वाले उस कारण से परिस्फुट आस्वाद से युक्त होकर भी पश्चात् उत्पन्न रूप से प्रतीत नहीं होता, क्योंकि अभ्यस्त विषय में अविनाभाव (अर्थात् व्याप्ति) की प्रतीति का क्रम यों ही नहीं लक्षित होता । अभ्यास यही है जो कि प्रविधान आदि के बिना ही संस्कार के प्रबल होने के कारण हमेशा जानने के इच्छुक भाव से अवस्थापन है, इस प्रकार 'जहां धूम है वहां अग्नि है' इस व्याप्ति के हृदय में स्थित होने के कारण केवल (धूम आदि का पक्षधर्मता ज्ञान ही उपयोगी होता है, इस कारण परामर्श का स्थान ग्रहण कर लेता है, क्योंकि उस (वह्नि) की व्याप्ति की स्मृति से उपकृत धूमज्ञान के झटिति उत्पन्न होने पर उन (धूमज्ञान और व्याप्तिस्मृति) से विजातीय प्रणिधान का अनुसरण आदि अन्य प्रतीतियों का अनु- प्रवेश न होने से आशु होने वाली अग्नि की प्रतीति में क्रम लक्षित नहीं होता है, उस
तृतीय उद्योतः ४५१ ध्वन्यालोकः क्वचित्तु लक्ष्यत एव । यथानुरणनरूपव्यङ्ग्यप्रतीतिषु । तत्रापि कथमिति चेदुच्यते—अर्थशक्तिमूलानुरणनरूपव्यङ्ग्ये ध्वनौ तावद- भिधेयस्य तत्सामर्थ्याक्षिप्तस्य चार्थस्याभिधेयान्तरविलक्षणतयात्यन्त- विलक्षणे ये प्रतीती तयोरशक्यनिह्नवौ निमित्तनिमित्तिभाव इति स्फुटमेव तत्र पौर्वापर्यम् । यथा प्रथमोद्द्योते प्रतीयमानार्थसिद्धयर्थ- परन्तु कहीं पर प्रतीत होता ही है, जैसे अनुरणन रूप व्यङ्ग्य की प्रतीतियों में । यदि कहो कि वहां पर भी कैसे ? तो कहते हैं—अर्थशक्तिमूल अनुरणनरूपव्यङ्ग्य ध्वनि में अभिधेय की और उसकी सामर्थ्य से आक्षिप्त अर्थ की अन्य अभिधेय से विलक्षण रूप होने के कारण अत्यन्त विलक्षण जो प्रतीतियाँ हैं, उनके निमित्तनिमित्ति- भाव को छिपाया नहीं जा सकता, इसलिए स्पष्ट ही वहां पौर्वापर्य है । जैसे प्रथम उद्योत में प्रतीयमान अर्थ को सिद्ध करने के लिए उदाहृत गाथाओं में । और उस लोचनम् यदि तु वाच्याविरोधी रसो न स्यादुचिता च घटना न भवेत्तल्लक्ष्येतैव क्रम इति । चन्द्रिकाकारस्तु पठितमनुपठतीति न्यायेन गजनिमीलिकया व्याचचक्षे- तस्य शब्दस्य फलं तद्वा फलं वाच्यव्यङ्ग्यप्रतीत्यात्मकं तस्य घटना निष्पादना यतोऽनन्यसाध्या शब्दव्यापारैकजन्येति । न चात्रार्थसतत्त्वं व्याख्याने किञ्चि- दुत्पश्याम इत्यलं पूर्ववंश्यैः सह विवादेन बहुना । यत्र तु सङ्घटनाव्यङ्ग्यत्वं नास्ति तत्र लक्ष्यत एवेत्याह—क्वचिदिति । तुल्ये व्यङ्ग्यत्वे कुतो भेद इत्याशङ्कते—तत्रापीति । स्फुटमेवेति । अविवक्षितवाच्यस्य पदवाक्यप्रकाशता । तदन्यस्यानुरणनरूपव्यङ्ग्यस्य च ध्वनेः ॥ प्रकार यहां भी । किन्तु यदि रस वाच्य का अविरोधी न हो और घटना उचित हो तो क्रम लक्षित होगा ही । परन्तु 'चन्द्रिकाकार' ने 'पढ़े को ही पढ़ते हैं' इस न्याय के अनुसार गजनिमीलिका ( हाथी की भांति ऊंघते हुए ) व्याख्यान किया है—'उस शब्द का फल, अथवा वाच्य- व्यङ्ग्य प्रतीतात्मक वह फल, उसकी घटना अर्थात् निष्पादना जिस कारण अनन्य साध्य है, अर्थात् एकमात्र शब्द के व्यापार से जन्य है ।' इस व्याख्यान में कोई अर्थतत्त्व हम नहीं देखते । पूर्वजों के साथ बहुत विवाद अनावश्यक है ! किन्तु जहां सङ्घटना द्वारा व्यङ्ग्यत्व नहीं है वहां प्रतीत होता ही है, यह कहते हैं—परन्तु कहीं पर—। व्यङ्ग्यत्व के सदृश होने पर कैसे भेद है, यह आशङ्का करते हैं—वहां पर भी—। स्पष्ट ही—। अविवक्षितवाच्य और उससे इतर अनुरणनरूप व्यङ्ग्य ध्वनि पदप्रकाश्य और वाक्यप्रकाश्य होता है ।
४५२ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
मुदाहृतासु गाथासु । तथाविधे च विषये वाच्यव्यङ्ग्ययोरत्यन्त-
विलक्षणत्वायैव एकस्य प्रतीतिः सैवेतरस्येति न शक्यते वक्तुम् ।
शब्दशक्तिमूलानुरणनरूपव्यङ्ग्ये तु ध्वनौ—
गावो वः पावनानां परमपरिमितां प्रीतिमुत्पादयन्तु
इत्यादावर्थद्वयप्रतीतौ शाब्द्यामर्थद्वयस्योपमानोपमेयभावप्रतीति-
रूपमावाचकपदविरहे सत्यर्थसामर्थ्यादाक्षिप्येति, तत्रापि सुलक्षमभिधेय-
व्यङ्ग्यालङ्कारप्रतीत्योः पौर्वापर्यम् ।
पदप्रकाशशब्दशक्तिमूलानुरणनरूपव्यङ्ग्येऽपि ध्वनौ विशेषणपद-
स्योभयार्थसम्बन्धयोग्यस्य योजकं पदमन्तरेण योजनमशाब्दमप्यर्था-
प्रकार के विषय में वाच्य और व्यङ्ग्य के अत्यन्त विलक्षण होने के कारण जो ही एक
की प्रतीति है वही अन्य की है ऐसा नहीं कह सकते । किन्तु शब्दशक्तिमूल अनुरणन-
रूपव्यङ्ग्य ध्वनि में—
‘पावनों में श्रेष्ठ किरणें ( गायें ) आप लोगों की अपरिमित प्रीति उत्पन्न करें ।’
इत्यादि में, दो अर्थों की शाब्दी प्रतीति में उपमानोपमेयभाव की प्रतीति उपमा-
वाचक पद के अभाव में अर्थ की सामर्थ्य से आक्षिप्त है, इसलिए वहां भी अभिधेय
और व्यङ्ग्य अलङ्कार की प्रतीतियों का पौर्वापर्य स्पष्ट लक्षित हो जाता है ।
पदप्रकाश शब्दशक्तिमूल अनुरणनरूपव्यङ्ग्य ध्वनि में भी उभय अर्थ के साथ
सम्बन्ध के योग्य विशेषण पद को जोड़ने वाले पद के बिना जोड़ना अशाब्द हो जाता
लोचनम्
इति हि पूर्वं वर्णसङ्घटनादिकं नास्य व्यञ्जकत्वेनोक्तमिति भावः । गाथा-
स्विति । ‘भम धम्मिअ’ इत्यादिकासु । ताश्च तत्रैव व्याख्याताः । शाब्दामिति ।
शाब्दामपीत्यर्थः । उपमावाचकं यथेवादि । अर्थसामर्थ्यादिति । वाक्यार्थसाम-
र्थ्यादिति यावत् ।
एवं वाक्यप्रकाशाशब्दशक्तिमूलं विचार्य पदप्रकाशं विचारयति—पद-
प्रकाशेति । विशेषणपदस्येति । जड इत्यस्य । योजकमिति । कूप इति च
भाव यह कि इसमें पहले इस (ध्वनि) के व्यञ्जक रूप से वर्ण, सङ्घटना आदि
को नहीं कहा है । गाथाओं में—। ‘भम धम्मिअ’ इत्यादि में । वे वहीं पर व्याख्यात
हो चुकी हैं । शाब्दी (प्रतीति) में—। अर्थात् शाब्दी (प्रतीति) में भी । उपमावाचक
यथा, इव आदि । अर्थ की सामर्थ्य से—। वाक्यार्थ की सामर्थ्य से ।
इस प्रकार वाक्यप्रकाश शब्द शक्ति (ध्वनि) का विचार करके पदप्रकाश का
विचार करते हैं—पदप्रकाश—। विशेषण पद को—। ‘जड’ इसको ।—जोड़नेवाले—।
तृतीय उद्योतः ४५३ ध्वन्यालोकः दवस्थितमित्यत्रापि पूर्ववदभिधेयतत्सामर्थ्याक्षिप्तालङ्कारमात्रप्रतीत्योः सुस्थितमेव पौर्वापर्यम् । आर्थ्यपि च प्रतिपत्तिस्तथाविधे विषये उभयार्थसम्बन्धयोग्यशब्दसामर्थ्यप्रसावितेति शब्दशक्तिमूला कल्प्यते । अविवक्षितवाच्यस्य तु ध्वनेः प्रसिद्धस्वविषयवैमुख्यप्रतीतिपूर्वकमेवार्था- न्तरप्रकाशनमिति नियमभावी क्रमः । तत्राविवक्षितवाच्यत्वादेव वाच्येन सह व्यङ्ग्यस्य क्रमप्रतीतिविचारो न कृतः । है तथापि अर्थ से अवस्थित होता है, इसलिए यहां भी पहले की भांति अभिधेय की और उसकी सामर्थ्य से आक्षिप्त अलङ्कारमात्र की प्रतीति का पौर्वापर्य सुस्थित ही है । उस प्रकार के विषय में आर्थी भी प्रतीति को उभय अर्थ के साथ सम्बन्ध के के योग्य शब्द से उत्पन्न की जाने के कारण शब्दशक्तिमूल मानी जाती है । अवि- वक्षितवाच्य ध्वनि का तो प्रसिद्ध अपने विषय में वैमुख्य की प्रतीतिपूर्वक ही अर्थान्तर का प्रकाशन है, अतः क्रम नियमतः होगा । वहां अविवक्षितवाच्य होने के कारण ही वाच्य के साथ व्यङ्ग्य के क्रम की प्रतीति का विचार नहीं किया है । लोचनम् अहमिति चोभयसमानाधिकरणतया संवलनम् । अभिधेयं च तत्सामर्थ्याक्षिप्तं च तयोरलङ्कारमात्रयोः । ये प्रतीती तयोः पौर्वापर्यं क्रमः । सुस्थितं सुलक्षित- मित्यर्थः । मात्रग्रहणेन रसप्रतीतिस्तत्राप्यलक्ष्यक्रमैवेति दर्शयति । नन्वेवमार्थत्वं शब्दशक्तिमूलत्वं चेति विरुद्धमित्याशङ्क्याह—आर्थ्यपीति । नात्र विरोधः कश्चिदिति भावः । एतच्च वितत्य पूर्वमेव निर्णीतमिति न पुनरुच्यते । स्वविषयेति । अन्धशब्दादेरुपहतचक्षुष्कादिः स्वो विषयः, तत्र यद्वैमुख्यमनादर इत्यर्थः । विचारो न कृत इति । नामधेयनिरूपणद्वारेणेति शेषः । सहभावस्य शङ्कितुमप्ययुक्तत्वादिति भावः । एवं रसाद्यः कैशिक्यादीनामितिवृत्तभाग- ‘कूप’ और ‘मैं’ इन दोनों को समानाधिकरण रूप से सम्मिश्रण है । अभिधेय और उसकी सामर्थ्य से आक्षिप्त उन दो अलङ्कार मात्रों की । जो प्रतीतियाँ हैं उनका पौर्वापर्य अर्थात् क्रम । सुस्थित है अर्थात् सुलक्षित है । ‘मात्र’ ग्रहण से यह दिखाते हैं कि रस की प्रतीति वहाँ भी सुलक्ष ही है । तब तो इस प्रकार आर्थ होना और शब्दशक्तिमूल होना विरुद्ध है, यह आशङ्का करके कहते हैं—आर्थी भी-। भाव यह कि यहाँ कोई विरोध नहीं । इसे विस्तारपूर्वक पहले ही निर्णय कर चुके हैं, इसलिये फिर नहीं कहते हैं । अपने विषय में-। अर्थात् ‘अन्ध’ आदि शब्द का ‘उपहतचक्षुष्क’ (अंधी आँखों वाला आदमी) अपना विषय है, उसमें वैमुख्य अर्थात् अनादर । विचार नहीं किया है-। शेष यह है—‘नाम के निरुपण द्वारा’ । भाव यह कि यहाँ सहभाव की शङ्का भी ठीक नहीं । इस प्रकार इतिवृत्त के भाग रूप कैशिकी आदि
४५४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तस्मादभिधानाभिधेयप्रतीत्योरिव वाच्यव्यङ्ग्यप्रतीत्योर्निमित्तनि- मित्तिभावान्नियमभावी क्रमः । स तूक्तयुक्त्या क्वचिल्लक्ष्यते क्वचिन्न लक्ष्यते । तदेवं व्यञ्जकमुखेन ध्वनिप्रकारेषु निरूपितेषु कश्चिद् ब्रूयात्— किमिदं व्यञ्जकत्वं नाम व्यङ्ग्यार्थप्रकाशनम् , न हि व्यञ्जकत्वं इसलिए अभिधान और अभिधेय की प्रतीति की भांति ही वाच्य और व्यङ्ग्य की प्रतीति का निमित्तनैमित्तिभाव के कारण क्रम नियमभावी है । किन्तु वह उक्त युक्ति के अनुसार कहीं पर लक्षित होता है, कहीं पर नहीं लक्षित होता है । ( शङ्का ) तो इस प्रकार व्यञ्जक के द्वारा ध्वनि के प्रकारों का निरूपण होने पर यदि कोई कहे—क्या यह व्यञ्जकत्व व्यङ्ग्य अर्थ का प्रकाशन ( रूप ) है ? अर्थ का लोचनम् रूपाणां वृत्तीनां जीवितमुपनागरिकाद्यानां च सर्वस्यास्योभयस्यापि वृत्तिव्यव- हारस्य रसादिनियमितविषयत्वादिति यत्प्रस्तुतं तत्प्रसङ्गेन रसादीनां वाच्या- तिरिक्तत्वं समर्थयितुं क्रमो विचारित इत्येतदुपसंहरति—तस्मादिति । अभिधा- नस्य शब्दरूपस्य पूर्वं प्रतीतिस्ततोऽभिधेयस्य । यदाह तत्र भवान्— ‘विषयत्वमनापन्नैः शब्दैरर्थः प्रकाश्यते’ इत्यादि । अतोऽनिर्ज्ञातरूपत्वात्किमाहेत्यभिधीयते’ इत्यत्रापि चाविनाभाववत्सम- यस्याभ्यस्तत्वात्क्रमो न लक्ष्येतापि । उद्द्योतारम्भे यदुक्तं व्यञ्जनमुखेन ध्वनेः स्वरूपं प्रतिपाद्यत इति तदिदानी- मुपसंहरन्व्यञ्जकभावं प्रथमोद्द्योते समर्थितमपि शिष्याणामेकप्रघट्टकेन हृदि निवेशयितुं पूर्वपक्षमाह—तदेवमिति । कश्चिदिति । मीमांसकादिः । किमिदमिति । और उपनागरिका आदि वृत्तियों के जीवित हैं, क्योंकि यह समस्त वृत्तिव्यवहार का विषय रसादि से नियन्त्रित होता है, यह जो प्रस्तुत था उसके प्रसंग से रसादि का वाच्याति- रिक्तत्व समर्थन करने के लिए क्रम विचार किया है । अब इसे उपसंहार करते हैं— इसलिए। पहले शब्दरूप अभिधान की प्रतीति तब अभिधेय की । क्योंकि महानुभाव का कहते हैं— ‘स्वयं ज्ञात न हुए शब्दों से अर्थ प्रकाशित नहीं होता है’ इत्यादि । इसलिए रूप के ज्ञात न होने के कारण ‘क्या कहते हैं ?’ ‘यह कहते हैं’ यहाँ पर भी ( अर्थात् अभिधान और अभिधेय की प्रतीतियों में भी ) अविनाभाव की भाँति समय ( अर्थात् सङ्केत ) के अभ्यस्त होने के कारण क्रम लक्षित न भी होगा । उद्योत के आरम्भ में जो कहा है कि व्यञ्जक के द्वारा ध्वनि का स्वरूप प्रतिपादन करते हैं, उसका अब उपसंहार करते हुए व्यञ्जकत्व का प्रथम उद्योत में समर्थन हो जाने पर भी एक प्रकरण के द्वारा शिष्यों के हृदय में निविष्ट करने के लिए पूर्वपक्ष कहते हैं—
तृतीय उद्योतः ४५५
ध्वन्यालोकः
व्यङ्ग्यत्वं चार्थस्य व्यञ्जकसिद्ध्यधीनं व्यङ्ग्यत्वम्, व्यङ्ग्यापेक्षया च
व्यञ्जकत्वसिद्धिरित्यन्योन्यसंश्रयादव्यवस्थानम् । ननु वाच्यव्यति-
रिक्तस्य व्यङ्ग्यस्य सिद्धिः प्रागेव प्रतिपादिता तत्सिद्ध्यधीना च
व्यञ्जकसिद्धिरिति कः पर्यनुयोगावसरः । सत्यमेवैतत् ; प्रागुक्तयुक्ति-
भिर्वाच्यव्यतिरिक्तस्य वस्तुनः सिद्धिः कृता, स त्वर्थो व्यङ्ग्यतयैव
व्यञ्जकत्व और व्यङ्ग्यत्व इसलिए अव्यवस्थित है कि व्यङ्ग्यत्व की सिद्धि व्यञ्जक की
सिद्धि के अधीन है और व्यङ्ग्य की अपेक्षा से व्यञ्जकत्व की सिद्धि है यह अन्योन्या-
श्रय हो जाता है । ( समाधान ) वाच्य से व्यतिरिक्त व्यङ्ग्य की सिद्धि का प्रतिपादन
पहले ही कर चुके हैं, और उसके अधीन व्यञ्जक की सिद्धि है, फिर प्रश्न का अवसर
कैसा ? ( शङ्का ) यह ठीक ही है; पहले कही हुई युक्तियों द्वारा वाच्य से व्यतिरिक्त
वस्तु की सिद्धि की है, परन्तु उस अर्थ को व्यङ्ग्यरूप से ही क्यों व्यपदेश करते हैं ?
और जहां ( वह अर्थ ) प्राधान्यतः रहता है वहां उसे वाच्यरूप से ही व्यपदेश
लोचनम्
वक्ष्यमाणश्चोदकस्याभिप्रायः । प्रागेवेति । प्रथमोद्द्योते अभाववादनिराकरणे ।
अतश्च न व्यञ्जकसिद्ध्या तत्सिद्धियेनान्योन्याश्रयः शङ्क्येत, अपि तु हेत्वन्त-
रैस्तस्य साधितत्वादिति भावः । तदाह—तत्सिद्धीति । स त्विति । अस्त्वसौ
द्वितीयोऽर्थः, तस्य यदि व्यङ्ग्य इति नाम कृतम्, वाच्य इत्यपि कस्मान्न
क्रियते ? व्यङ्ग्य इति वा वाच्याभिमतस्यापि कस्मान्न क्रियते ? अवगम्य-
मानत्वेन हि शब्दार्थत्वं तदेव वाचकत्वम् । अभिधा हि यत्पर्यन्ता तत्रैवाभिधाय-
कत्वमुचितम्, तत्पर्यन्तता च प्रधानीभूते तस्मिन्नर्थ इति मूर्धाभिषिक्तं ध्वनेर्य-
तो इस प्रकार—। कोई—। मीमांसक आदि । क्या यह—। अर्थात् चोद्यवादी (दोषद्रष्टा)
का वक्ष्यमाण अभिप्राय । पहले ही—। प्रथम उद्योत में अभाववाद के निराकरण के
प्रसङ्ग में । भाव यह कि इसलिए व्यञ्जक की सिद्धि से उसकी सिद्धि नहीं होती है,
जिससे अन्योन्याश्रय की शङ्का की जाय, बल्कि अन्य हेतुओं से वह सिद्ध किया जाता
है । इसलिए कहते हैं—उसकी सिद्धि—। परन्तु उस—। माना कि वह दूसरा अर्थ है,
यदि उसका 'व्यङ्ग्य' नाम देते हैं तो 'वाच्य' भी नाम क्यों नहीं करते? अथवा वाच्य रूप
से अभिमत का भी 'व्यङ्ग्य' क्यों नहीं ( नाम ) करते है ? शब्द के द्वारा जो अवगम्य-
मानत्व है वही वाचकत्व है । जहाँ तक अभिधा है वहीं अभिधायकत्व उचित है और
उस ( अभिधा ) की पर्यन्तता प्रधानीभूत उस अर्थ में है, इस प्रकार जो ध्वनि का
मूर्धाभिषिक्त रूप निरूपण किया गया है, उसमें ही अभिधा व्यापार को होना ठीक है ।
कस्माद्व्यपदिश्यते यत्र च प्राधान्येनानवस्थानं तत्र वाच्यतयैवासौ व्यपदेष्टुं युक्तः, तत्परत्वाद्वाक्यस्य । अतश्च तत्प्रकाशिनो वाक्यस्य वाचकत्वमेव व्यापारः । किं तस्य व्यापारान्तरकल्पनया ? तस्मा- त्तात्पर्यविषयो योऽर्थः स तावन्मुख्यतया वाच्यः । या त्वन्तरा तथाविधे विषये वाच्यान्तरप्रतीतिः सा तत्प्रतीतेरुपायमात्रं पदार्थप्रती- तिरिव वाक्यार्थप्रतीतेः । करना ठीक है, क्योंकि वाक्य का तात्पर्य उसी में है । और इसलिए उस ( अर्थ ) के प्रकाशक वाक्य का वाचकत्व ही व्यापार है । उसके अन्य व्यापार की कल्पना से क्या लाभ ? इसलिए जो अर्थ तात्पर्य का विषय है वह मुख्यरूप से वाच्य है । किन्तु जो उस प्रकार के विषय में बीच में वाच्यान्तर की प्रतीति है वह उस उस प्रतीति का वाक्यार्थप्रतीति का पदार्थप्रतीति की भांति उपायमात्र है ।
द्रूपं निरूपितं तत्रैवाभिधाव्यापारेण भवितुं युक्तम् । तदाह—यत्र चेति । तत्प्रकाशिन इति । तद्व्यङ्ग्याभिमतं प्रकाशयत्यवश्यं यद्वाक्यं तस्येति । उपायमात्रमित्यनेन साधारण्योक्त्या भाट्टं प्राभाकरं वैयाकरणं च पूर्वपक्षं सूचयति । भाट्टमते हि— वाक्यार्थमितये तेषां प्रवृत्तौ नान्तरीयकम् । पाके ज्वालेव काष्ठानां पदार्थप्रतिपादनम् ॥ इति शब्दावगतैः पदार्थैस्तात्पर्येण योऽर्थ उत्थाप्यते स एव वाक्यार्थः, स एव च वाच्य इति । प्राभाकरदर्शनेऽपि दीर्घदीर्घो व्यापारो निमित्तिनि वाक्यार्थे, पदार्थानां तु निमित्तभावः पारमार्थिक एव । वैयाकरणानां तु सोऽपारमार्थिक इसलिए कहते हैं—और जहाँ— । उसके प्रकाशक— । उस व्यङ्ग्य रूप अभिमत को जो वाक्य अवश्य प्रकाशिक करता है उसका । ‘उपाय मात्र’ इस साधारण कथन से भाट्ट, प्राभाकर और वैयाकरण पूर्वपक्ष को सूचित करते हैं । क्योंकि भाट्टमत में वाक्यार्थ के ज्ञान के लिए उन ( पदों ) की प्रवृत्ति में पदार्थ का प्रतिपादन पाक कार्य में काष्ठों की ज्वाला की भाँति नान्तरीयक ( उपाय मात्र ) है । इसलिए शब्दों से अवगत पदार्थों द्वारा तात्पर्य रूप से जो अर्थ उठाया जाता है वही वाक्यार्थ है और वही वाच्य है । प्राभाकरदर्शन में भी दीर्घदीर्घ व्यापार नैमित्तिक कार्यरूप-वाक्यार्थ में ( होता है ), किन्तु पदार्थों का निमित्तभाव पारमार्थिक ही होता है । ( वैयाकरणों की दृष्टि में ) वह अपारमार्थिक है यह विशेष है । इसे हमने प्रथम
तृतीय उद्योतः ४५७ ध्वन्यालोकः अत्रोच्यते—यत्र शब्दः स्वार्थमभिदधानोऽर्थान्तरमवगमयति तत्र यत्तस्य स्वार्थाभिधायित्वं यच्च तदर्थान्तरावगमहेतुत्वं तयोरविशेषो विशेषो वा। न तावदविशेषः; यस्मात्तौ द्वौ व्यापारौ भिन्नविषयौ भिन्नरूपौ च प्रतीयेते एव। तथाहि वाचकत्वलक्षणो व्यापारः शब्दस्य स्वार्थविषयः गमकत्वलक्षणस्त्वर्थान्तरविषयः । न च स्वपरव्यवहारो वाच्यव्यङ्ग्ययोरपह्रोतुं शक्यः, एकस्य सम्बन्धित्वेन प्रतीतेरपरस्य सम्बन्धिसम्बन्धित्वेन । वाच्यो ह्यर्थः साक्षाच्छब्दस्य यहां कहते हैं—जहां शब्द अपने अर्थ का अभिधान करता हुआ अर्थान्तर का अवगमन कराता है वहां जो उसका उसका स्वार्थाभिधायित्व और जो उसके अर्थान्तर का अवगमहेतुत्व है उन दोनों में अविशेष है अथवा विशेष ? अविशेष तो नहीं है, क्योंकि वे दोनों व्यापार भिन्न विषय और भिन्नरूप प्रतीत होते ही हैं। जैसा कि शब्द का वाचकत्वरूप व्यापार अपने अर्थ को विषय करता है, किन्तु गमकत्वरूप (व्यापार) अर्थान्तर को विषय करता है। वाच्य और व्यङ्ग्य के स्व-पर व्यवहार का अपह्नव नहीं किया जा सकता, क्योंकि एक सम्बन्धीरूप से प्रतीत होता है दूसरा सम्बन्धी के सम्बन्धी रूप से। वाच्य अर्थ शब्द का साक्षात् सम्बन्धी है, किन्तु लोचनम् इति विशेषः । एतच्चास्माभिः प्रथमोद्द्योत एव वितत्य निर्णीतमिति न पुनरा- यस्यते ग्रन्थयोजनैव तु क्रियते। तदेतन्मतत्रयं पूर्वपक्षे योज्यम्। अत्रेति पूर्वपक्षे । उच्यत इति सिद्धान्तः । वाचकत्वं गमकत्वं चेति स्वरूपतो भेदः स्वार्थेऽर्थान्तरे च क्रमेणेति विषयतः । ननु तस्माच्चेदसौ गम्यते- ऽर्थः कथं तर्ह्युच्यतेऽर्थान्तरमिति । नो चेत्स तस्य न कश्चिदिति को विषयर्थ इत्याशङ्क्याह-न चेति । न स्यादिति । एवकारो भिन्नक्रमः, नैव स्यादित्यर्थः । यावता न साक्षात्सम्बन्धित्वं तेन युक्त एवार्थान्तरव्यवहार इति विषयभेद उद्योत में ही विस्तार करके निर्णय किया है, इसलिए पुनः श्रम नहीं करते, किन्तु ग्रन्थ की योजना है कर देते हैं। इन तीनों मतों को पूर्वपक्ष में लगाना चाहिए। यहां अर्थात् पूर्वपक्ष में। कहते हैं सिद्धान्त। वाचकत्व और गमकत्व यह स्वरूपतः भेद है और क्रम से स्वार्थ में और अर्थान्तर में विषयतः (भेद) है। यदि उस (शब्द) से वह अर्थ (व्यङ्ग्य अर्थ) अवगत होता है तो क्यों अर्थान्तर कहते हैं? यदि नहीं, तो उसका (वह) कोई नहीं, फिर 'विषय' का अर्थ क्या? यह आशङ्का करके कहते हैं—स्व-पर व्यवहार—। नहीं होगा—। 'ही' भिन्नक्रम है, अर्थात् नहीं ही होगा। जिस कारण साक्षात् सम्बन्धित्व नहीं है उस कारण अर्थान्तर व्यवहार ठीक ही
४५८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः सम्बन्धी तदितरस्त्वभिधेयसामर्थ्याक्षिप्तः सम्बन्धिसम्बन्धी । यदि च स्वसम्बन्धित्वं साक्षात्तस्य स्यात्तदार्थान्तरत्वव्यवहार एव न स्यात् । तस्माद्विषयभेदस्तावत्तयोर्व्यापारयोः सुप्रसिद्धः । रूपभेदोऽपि प्रसिद्ध एव । न हि यैवाभिधानशक्तिः सैवावगमनशक्तिः । अवाचकस्यापि गीतशब्दादे रसादिलक्षणार्थावगमदर्शनात् । अशब्दस्यापि चेष्टादेरर्थ- विशेषप्रकाशनप्रसिद्धेः । तथाहि 'व्रीडायोगान्नतवदना' इत्यादिश्लोके चेष्टाविशेषः सुकविनार्थप्रकाशनहेतुः प्रदर्शित एव । तस्माद्भिन्नविषय- उससे इतर (व्यङ्ग्य अर्थ) अभिधेय की सामर्थ्य से आक्षिप्त होकर सम्बन्धी का सम्बन्धी है । यदि वह शब्द का साक्षात् सम्बन्धी होगा तब (उसमें) अर्थान्तरत्व का व्यवहार ही नहीं होगा । इसलिए उन दोनों व्यापारों का विषयभेद सुप्रसिद्ध है । रूपभेद भी प्रसिद्ध ही है, क्योंकि जो ही अभिधानशक्ति है वही अवगमनशक्ति नहीं है । क्योंकि अवाचक भी गीत शब्द आदि से रसादिरूप अर्थ का अवगम देखा जाता है अशब्द भी चेष्टा आदि से अर्थविशेष के प्रकाशन की प्रसिद्धि है । जैसा कि 'व्रीडा- योगान्नतवदना' इत्यादि श्लोक में सुकवि ने अर्थ प्रकाशन के हेतु चेष्टाविशेष को दिखाया ही है । इसलिए भिन्न विषय और भिन्नरूप होने के कारण शब्द का जो लोचनम् उक्तः । ननु भिन्नेऽपि विषये अक्षशब्दादेर्बह्वर्थस्य एक एवाभिधालक्षणो व्यापार इत्याशङ्क्य रूपभेदमुपपादयति—रूपभेदोऽपीति । प्रसिद्धमेव दर्शयति— न हीति । विप्रतिपन्नं प्रति हेतुमाह—अवाचकस्यापीति । यदेव वाचकत्वं तदेव- गमकत्वं यदि स्यादावाचकस्य गमकत्वमपि न स्यात्, गमकत्वे नैव वाचकत्व- मपि न स्यात् । न चैतदुभयमपि गीतशब्दे शब्दव्यतिरिक्ते चाधोवक्त्रत्वकु- चकम्पनबाष्पावेशादौ तस्यावाचकस्याप्यवगमकारित्वदर्शनादवगमकारिणोऽ- प्यवाचकत्वेन प्रसिद्धत्वादिति तात्पर्यम् । एतदुपसंहरति—तस्माद्विन्नेति । है, इसलिए विषयभेद कहा है । विषय भिन्न होने पर भी बह्वर्थ 'अक्ष' आदि शब्दों का एक ही अभिधारूप व्यापार होगा, यह आशङ्का करके रूपभेद का उपपादन करते हैं— रूपभेद भी—। प्रसिद्धि को ही दिखाते हैं—नहीं—। विप्रतिपन्न के प्रति हेतु कहते हैं—अवाचक का—। तात्पर्य यह कि यदि जो ही वाचकत्व है वही गमकत्व है तो अवाचक का भी गमकत्व न होगा, गमकत्व न होने पर वाचकत्व भी नहीं ही होगा । यह दोनों भी (वाचकत्व और गमकत्व) गीत शब्द में और शब्दव्यतिरिक्त नीच मुख होना, कुचकम्पन, बाष्पावेश आदि में नहीं हैं, क्योंकि वह अवाचक (गीत शब्द भी) अवगमकारी देखा जाता है और अवगमकारी भी अवाचक रूप से प्रसिद्ध होता है । इसका उपसंहार करते हैं—इसलिए भिन्न—। नहीं—। वाच्य अभिधा
तृतीय उद्योतः ४५९ ध्वन्यालोकः त्वाद्भिन्नरूपत्वाच्च स्वार्थाभिधायित्वमर्थान्तरावगमहेतुत्वं च शब्दस्य यत्तयोः स्पष्ट एव भेदः । विशेषश्चेन्न तर्हीदानीमवगमनस्याभिधेयसा- मर्थ्याक्षिप्तस्यार्थान्तरस्य वाच्यत्वव्यपदेश्यता । शब्दव्यापारगोचरत्वं तु तस्यास्माभिरिष्यत एव, तत्तु व्यङ्ग्यत्वेनैव न वाच्यत्वेन । प्रसिद्धा- भिधानान्तरसम्बन्धयोग्यत्वेन च तस्यार्थान्तरस्य प्रतीतेः शब्दान्त- रेण स्वार्थाभिधायिना यद्विषयीकरणं तत्र प्रकाशनोक्तिरेव युक्ता । स्वार्थाभिधायित्व और अर्थान्तरावगमहेतुत्व है, उन दोनों का भेद स्पष्ट ही है। यदि भेद है तो फिर अब अवगमनरूप, अभिधेय की सामर्थ्य से आक्षिप्त अर्थान्तर को वाच्य नहीं कहा जा सकता । परन्तु वह शब्द व्यापार का गोचर है यह हम तो स्वीकार करते ही हैं, किन्तु उसे व्यङ्ग्यरूप से हां, न कि वाच्यरूप से । और प्रसिद्ध अभिधान से अतिरिक्त सम्बन्ध के योग्य रूप से उस अर्थान्तर की प्रतीति का जो स्वार्थ का अभिधान करने वाले शब्दान्तर के द्वारा विषयीकरण है वहां 'प्रकाशन' यह कथन ही ठीक है । लोचनम् न तर्हीति । वाच्यत्वं ह्यभिधाव्यापारविषयता न तु व्यापारमात्रविषयता, तथात्वे तु सिद्धसाधनमित्येतदाह—शब्दव्यापारेति । ननु गीतादौ मा भूद्वाचकत्वमिह त्वर्थान्तरेऽपि शब्दस्य वाचकत्वमेवोच्य- ते, किं हि तद्वाचकत्वं सङ्कोच्यत इत्याशङ्क्याह—प्रसिद्धेति । शब्दान्तरेण तस्या- र्थान्तरस्य यद्विषयीकरणं तत्र प्रकाशनोक्तिरेव युक्ता न वाचकत्वोक्तिः शब्दस्य, नापि वाच्यत्वोक्तिरर्थस्य तत्र युक्ता, वाचकत्वं हि समयवशादव्यवधानेन प्रति- पादकत्वं, यथा तस्यैव शब्दस्य स्वार्थे; तदाह-स्वार्थाभिधायिनेति । वाच्यत्वं हि समयबलेन निर्व्यवधानं प्रतिपाद्यत्वं यथा तस्यैवार्थस्य शब्दान्तरं प्रति- व्यापार का विषय होता है, न कि व्यापारमात्र का विषय होता है, ऐसा होने पर तो सिद्धसाधन होगा, यह कहते हैं—शब्द व्यापार—। गीत आदि में वाचकत्व मत हो, परन्तु यहाँ अर्थान्तर में भी शब्द का वाचकत्व ही कहा जायगा, उसके वाचकत्व को सङ्कुचित क्यों करते हैं ? यह आशङ्का करके कहते हैं—और प्रसिद्ध—। शब्दान्तर द्वारा उस अर्थान्तरे का जो विषयीकरण है वहां 'प्रकाशन' कथन ही ठीक हो न कि शब्द का 'वाचकत्व' कथन । और अर्थ का वहां वाच्यत्व कथन भी ठीक नहीं, क्योंकि समय ( सङ्केत ) के द्वारा बिना किसी व्यवधान के प्रतिपादकत्व 'वाचकत्व' है, जैसे उसी शब्द का अपने अर्थ में, उसे कहते हैं—स्वार्थ का अभिधान करने वाले—। समय ( सङ्केत ) के बल से बिना किसी व्यवधान के
४६० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः न च पदार्थवाक्यार्थन्यायो वाच्यव्यङ्ग्ययोः । यतः पदार्थप्रती- तिरसत्यैवेति कैश्चिद्विद्वद्भिःस्थितम् । यैरप्यसत्यत्वमस्या नाभ्युपेयते तैर्वाक्यार्थपदार्थयोर्घटतदुपादानकारणन्यायोऽभ्युपगन्तव्यः । यथा हि घटे निष्पन्ने तदुपादानकारणानां न पृथगुपलम्भस्तथैव वाक्ये तदर्थे वा प्रतीते पदतदर्थानां तेषां तदा विभक्ततयोपलम्भे वाक्यार्थबुद्धिरेव वाच्य और व्यङ्ग्य में पदार्थ और वाक्यार्थ का न्याय नहीं चलेगा, क्योंकि कुछ विद्वानों का निश्चय है कि पदार्थ की प्रतीति असत्य ही है । जो इसे असत्य नहीं स्वीकार करते उन्हें पदार्थ और वाक्यार्थ में घट और उसके उपादानकारणों का न्याय स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि जैसे घट के निष्पन्न होने पर उसके उपादान कारणों का अलग से उपलम्भ नहीं होता, उसी प्रकार वाक्य अथवा उसके अर्थ के प्रतीत होने पर पदों का अथवा उनके अर्थों का तब अलग से उपलम्भ होने पर वाक्यार्थ- लोचनम् तदाह—प्रसिद्धेति । प्रसिद्धेन वाचकतयाभिधानान्तरेण यः सम्बन्धो वाच्यत्वं तदेव तत्र वा यद्योग्यत्वं तेनोपलक्षितस्य । न चैवविधं वाचकत्वमर्थं प्रति शब्द- स्येहास्ति, नापि तं शब्दं प्रति तस्यार्थस्योक्तरूपं वाच्यत्वम् । यदि नास्ति तर्हि कथं तस्य विषयीकरणमुक्तमित्याशङ्कयाह-प्रतीतेरिति । अथ च प्रतीयते सोऽर्थो न च वाच्यवाचकत्वव्यापारेणेति विलक्षण एवासौ व्यापार इति यावत् । नन्वेवं मा भूद्वाचकशक्तिस्तथापि तात्पर्यशक्तिर्भविष्यतीत्याशङ्कयाह—न चेति । कैश्चिदिति वैयाकरणैः । यैरपीति भट्टप्रभृतिभिः । तमेव न्यायँ व्याचष्टे- यथाहीति । तदुपादानकारणानामिति । समवायिकारणानि कपालानि अनयो- क्त्या निरूपितानि । सौगतकापिलमते तु यद्यप्युपादातव्यघटकाले उपादाना- प्रतिपाद्यत्व वाच्यत्व है, उसी अर्थ का शब्दान्तर के प्रति, उसे कहते हैं—प्रसिद्ध—। वाचक रूप से प्रसिद्ध अभिधानान्तर के साथ जो सम्बन्ध वाच्यत्व है वही अथवा वहां जो योग्यत्व है उससे उपलक्षित । इस प्रकार का वाचकत्व अर्थ के प्रति शब्द का यहां नहीं है और उस शब्द के प्रति उस उक्तरूप अर्थ का वाच्यत्व भी नहीं है । यदि नहीं है, तो कैसे उसका विषयीकरण कहा है, यह आशङ्का करके कहते हैं—प्रतीति का—। वह अर्थ प्रतीत होता है, न कि वाच्यवाचकत्व व्यापार द्वारा ( प्रतीत होता है ), इस- लिए वह व्यापार विलक्षण ही है । इस प्रकार वाचक शक्तिमत हे, तथापि तात्पर्य शक्ति होगी, यह आशङ्का करके कहते हैं—वाच्य और—। कुछ अर्थात् वैयाकरण लोग । जो भट्ट प्रभृति । उसी न्याय की व्याख्या करते हैं—क्योंकि जैसे—। उसके उपादानकारणों का—। इस कथन से समवायी कारण कपाल निरूपित होते हैं । परन्तु बौद्ध और साङ्ख्य के मत में यद्यपि
तृतीय उद्योतः ४६१ ध्वन्यालोकः दूरीभवेत्। न त्वेष वाच्यव्यङ्ग्ययोर्न्यायः, न हि व्यङ्ग्ये प्रतीयमाने वाच्यबुद्धिर्दूरीभवति, वाच्यावभासाविनाभावेन तस्य प्रकाशनात्। तस्माद् घटप्रदीपन्यायस्तयोः, यथैव हि प्रदीपद्वारेण घटप्रतीतावुत्पन्ना- यां न प्रदीपप्रकाशो निवर्तते तद्वद्व्यङ्ग्यप्रतीतौ वाच्यावभासः। यत्तु बुद्धि ही दूर हो जायगी। परन्तु यह न्याय वाच्य और व्यङ्ग्य में नहीं है, क्योंकि व्यङ्ग्य के प्रतीयमान होने पर वाच्य की बुद्धि दूर नहीं होती, उसका प्रकाशन वाच्य के साथ अविनाभाव से होता है। इसलिए उन दोनों में घट और प्रदीप का न्याय है, क्योंकि जैसे ही कि प्रदीप के द्वारा घट की प्रतीति उत्पन्न होने पर प्रदीप का प्रकाश निवृत्त नहीं होता उसी प्रकार व्यङ्ग्य की प्रतीति में वाच्य का अवभास। जो लोचनम् नां न सत्ता एकत्र क्षणक्षयित्वेन परत्र तिरोभूतत्वेन तथापि पृथक्तया नास्त्यु- पलम्भ इतीत्यंशे दृष्टान्तः। दूरीभवेदिति। अर्थैकत्वस्याभावादिति भावः। एवं पदार्थवाक्यार्थन्यायं तात्पर्यशक्तिसाधकं प्रकृते विषये निराकृत्याभिमतां प्रका- शशक्तिं साधयितुं तदुचितं प्रदीपघटन्यायं प्रकृते योजयन्नाह—तस्मादिति। यतोऽसौ पदार्थवाक्यार्थन्यायो नेह युक्तस्तस्मात्, प्रकृतं न्यायं व्याकरणपूर्वकं दार्ष्टान्तिके योजयति—यथैव हीति। ननु पूर्वमुक्तम्— यथा पदार्थद्वारेण वाक्यार्थः सम्प्रतीयते। वाक्यार्थपूर्विका तद्वत्प्रतिपत्तस्य वस्तुनः॥ इति तत्कथं स एव न्याय इह यत्नेन निराकृत इत्याशङ्क्याह-यत्त्विति। उपादातव्य घट के काल में उपादानों की सत्ता एक में (बौद्ध मत में) क्षण भर स्थायी होने के कारण और दूसरे में (सांख्य मत में) तिरोभूत होने के कारण नहीं होती तथापि अलग से उपलब्ध नहीं है इस अंश में दृष्टान्त है। दूर हो जायगी—। भाव यह कि एक अर्थ के न होने के कारण। इस प्रकार तात्पर्य शक्ति के साधक पदार्थ वाक्यार्थ न्याय को प्रकृत विषय में निराकरण करके अभिमत प्रकाश शक्ति को सिद्ध करने के लिए उसके उचित प्रदीप-घट न्याय को प्रकृत में लगाते हुए कहते हैं— इसलिए—। जिस लिए वह पदार्थ-वाक्यार्थ न्याय यहीं ठीक नहीं है, इसलिए, प्रकृत न्याय को विवरणपूर्वक दार्ष्टान्तिक में लगाते हैं—जैसे ही कि—। पहले कहा है— 'जैसे पदार्थ के द्वारा वाक्यार्थ प्रतीत होता है उसी प्रकार उस (व्यङ्ग्यरूप) वस्तु की प्रतिपत्ति वाक्यार्थ की प्रतीतिपूर्वक होती है।' तो कैसे उस न्याय को यहां यत्न से निराकरण किया है? यह आशङ्का करके
४६२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः प्रथमोद्द्योते 'यथा पदार्थद्वारेण' इत्याद्युक्तं तदुपायत्वमात्रात्साम्य- विवक्षया । नन्वेवं युगपदर्थद्वययोगित्वं वाक्यस्य प्राप्तं तद्भावे च तस्य वा- क्यतैव विघटते, तस्या ऐकार्थ्यलक्षणत्वात्; नैष दोषः; गुणप्रधानभा- वेन तयोर्व्यवस्थानात् । व्यङ्ग्यस्य हि क्वचित्प्राधान्यं वाच्यस्योपस- र्जनभावः क्वचिद्वाच्यस्य प्राधान्यमपरस्य गुणभावः । तत्र व्यङ्ग्यप्रा- धान्ये ध्वनिरित्युक्तमेव; वाच्यप्राधान्ये तु प्रकारान्तरं निर्देक्ष्यते । कि 'प्रथम उद्योत' में 'यथा पदार्थद्वारेण' इत्यादि कहा है वह उपायमात्र के अंश में साम्य की विवक्षा से । तब तो इस प्रकार एक काल में वाक्य दो अर्थों से युक्त होगा, ऐसा होने पर उसकी वाक्यता ही विघटित होगी, क्योंकि 'एकार्थत्व उसका लक्षण है' ! ( उत्तर ) यह दोष नहीं; क्योंकि उन दोनों का गुण-प्रधानरूप से व्यवस्थान है । कहीं पर व्यङ्ग्य का प्राधान्य है, वाच्य का उपसर्जनभाव और कहीं पर वाच्य का प्राधान्य है, अपर का गुणभाव । उनमें, व्यङ्ग्य के प्राधान्य में ध्वनि है यह कहा जा चुका है, किन्तु वाच्य के प्राधान्य में प्रकारान्तर का निर्देश करेंगे । इसलिए यह निश्चित लोचनम् तदिति । न तु सर्वथा साम्येनेत्यर्थः । एवमिति । प्रदीपघटवद्युगपदुभयाव- भासप्रकारेणेत्यर्थः । तस्या इति वाक्यतायाः । ऐकार्थ्यलक्षणमर्थैकत्वाद्ध वाक्यमेकमित्युक्तम् । सकृत् श्रुतो हि शब्दो यत्रैव समयस्मृतिं करोति स चेदने- नैवावगमितः तद्विरम्यव्यापाराभावात्समयस्मरणानां बहूनां युगपद्योगात्कोऽ- र्थभेदस्यावसरः । पुनः श्रुतस्तु स्मृतो वापि नासाविति भावः । तयोरिति वाच्य- व्यङ्ग्ययोः । तत्रेति । उभयोः प्रकारयोर्मध्याद्यदा प्रथमः प्रकार इत्यर्थः । प्रका- रान्तरमिति । गुणीभूतव्यङ्ग्यसञ्ज्ञितम् । व्यङ्ग्यत्वमेवेति प्रकाश्यत्वमेवेत्यर्थः । कहते हैं—जो कि—। वह—। अर्थात् न कि सर्वथा साम्यपूर्वक । इस प्रकार—। अर्थात् प्रदीप-घट की भांति एक काल में दोनों के अवभास के प्रकार से । उसका वाक्यता का । 'अर्थ एक होने से एकार्थत्व रूप एक वाक्य होता है' यह कहा है । भाव यह कि एक बार श्रुत शब्द जहां पर हो समय (सङ्केत) की स्मृति करता है वह यदि इसी से (एक बार श्रुत शब्द ही से) विदित हो गया तो विरत होने पर व्यापार नहीं होता इसलिए बहुत से सङ्केत के स्मरणों एक समय में न होने के कारण अर्थभेद का अवसर ही कहां ? वह (शब्द) फिर से न श्रुत है अथवा न स्मृत है । उन दोनों का वाच्य और व्यङ्ग्य का । उनमें—। अर्थात् दोनों प्रकारों के बीच से जब प्रथम प्रकार होगा । प्रकारान्तर—। गुणीभूतव्यङ्ग्यसंज्ञक । व्यङ्ग्यत्व ही अर्थात् प्रकाश्यत्व ही ।