ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ४५३ ध्वन्यालोकः दवस्थितमित्यत्रापि पूर्ववदभिधेयतत्सामर्थ्याक्षिप्तालङ्कारमात्रप्रतीत्योः सुस्थितमेव पौर्वापर्यम् । आर्थ्यपि च प्रतिपत्तिस्तथाविधे विषये उभयार्थसम्बन्धयोग्यशब्दसामर्थ्यप्रसावितेति शब्दशक्तिमूला कल्प्यते । अविवक्षितवाच्यस्य तु ध्वनेः प्रसिद्धस्वविषयवैमुख्यप्रतीतिपूर्वकमेवार्था- न्तरप्रकाशनमिति नियमभावी क्रमः । तत्राविवक्षितवाच्यत्वादेव वाच्येन सह व्यङ्ग्यस्य क्रमप्रतीतिविचारो न कृतः । है तथापि अर्थ से अवस्थित होता है, इसलिए यहां भी पहले की भांति अभिधेय की और उसकी सामर्थ्य से आक्षिप्त अलङ्कारमात्र की प्रतीति का पौर्वापर्य सुस्थित ही है । उस प्रकार के विषय में आर्थी भी प्रतीति को उभय अर्थ के साथ सम्बन्ध के के योग्य शब्द से उत्पन्न की जाने के कारण शब्दशक्तिमूल मानी जाती है । अवि- वक्षितवाच्य ध्वनि का तो प्रसिद्ध अपने विषय में वैमुख्य की प्रतीतिपूर्वक ही अर्थान्तर का प्रकाशन है, अतः क्रम नियमतः होगा । वहां अविवक्षितवाच्य होने के कारण ही वाच्य के साथ व्यङ्ग्य के क्रम की प्रतीति का विचार नहीं किया है । लोचनम् अहमिति चोभयसमानाधिकरणतया संवलनम् । अभिधेयं च तत्सामर्थ्याक्षिप्तं च तयोरलङ्कारमात्रयोः । ये प्रतीती तयोः पौर्वापर्यं क्रमः । सुस्थितं सुलक्षित- मित्यर्थः । मात्रग्रहणेन रसप्रतीतिस्तत्राप्यलक्ष्यक्रमैवेति दर्शयति । नन्वेवमार्थत्वं शब्दशक्तिमूलत्वं चेति विरुद्धमित्याशङ्क्याह—आर्थ्यपीति । नात्र विरोधः कश्चिदिति भावः । एतच्च वितत्य पूर्वमेव निर्णीतमिति न पुनरुच्यते । स्वविषयेति । अन्धशब्दादेरुपहतचक्षुष्कादिः स्वो विषयः, तत्र यद्वैमुख्यमनादर इत्यर्थः । विचारो न कृत इति । नामधेयनिरूपणद्वारेणेति शेषः । सहभावस्य शङ्कितुमप्ययुक्तत्वादिति भावः । एवं रसाद्यः कैशिक्यादीनामितिवृत्तभाग- ‘कूप’ और ‘मैं’ इन दोनों को समानाधिकरण रूप से सम्मिश्रण है । अभिधेय और उसकी सामर्थ्य से आक्षिप्त उन दो अलङ्कार मात्रों की । जो प्रतीतियाँ हैं उनका पौर्वापर्य अर्थात् क्रम । सुस्थित है अर्थात् सुलक्षित है । ‘मात्र’ ग्रहण से यह दिखाते हैं कि रस की प्रतीति वहाँ भी सुलक्ष ही है । तब तो इस प्रकार आर्थ होना और शब्दशक्तिमूल होना विरुद्ध है, यह आशङ्का करके कहते हैं—आर्थी भी-। भाव यह कि यहाँ कोई विरोध नहीं । इसे विस्तारपूर्वक पहले ही निर्णय कर चुके हैं, इसलिये फिर नहीं कहते हैं । अपने विषय में-। अर्थात् ‘अन्ध’ आदि शब्द का ‘उपहतचक्षुष्क’ (अंधी आँखों वाला आदमी) अपना विषय है, उसमें वैमुख्य अर्थात् अनादर । विचार नहीं किया है-। शेष यह है—‘नाम के निरुपण द्वारा’ । भाव यह कि यहाँ सहभाव की शङ्का भी ठीक नहीं । इस प्रकार इतिवृत्त के भाग रूप कैशिकी आदि