ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished680 पृष्ठ
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४५२ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
मुदाहृतासु गाथासु । तथाविधे च विषये वाच्यव्यङ्ग्ययोरत्यन्त-
विलक्षणत्वायैव एकस्य प्रतीतिः सैवेतरस्येति न शक्यते वक्तुम् ।
शब्दशक्तिमूलानुरणनरूपव्यङ्ग्ये तु ध्वनौ—
गावो वः पावनानां परमपरिमितां प्रीतिमुत्पादयन्तु
इत्यादावर्थद्वयप्रतीतौ शाब्द्यामर्थद्वयस्योपमानोपमेयभावप्रतीति-
रूपमावाचकपदविरहे सत्यर्थसामर्थ्यादाक्षिप्येति, तत्रापि सुलक्षमभिधेय-
व्यङ्ग्यालङ्कारप्रतीत्योः पौर्वापर्यम् ।
पदप्रकाशशब्दशक्तिमूलानुरणनरूपव्यङ्ग्येऽपि ध्वनौ विशेषणपद-
स्योभयार्थसम्बन्धयोग्यस्य योजकं पदमन्तरेण योजनमशाब्दमप्यर्था-
प्रकार के विषय में वाच्य और व्यङ्ग्य के अत्यन्त विलक्षण होने के कारण जो ही एक
की प्रतीति है वही अन्य की है ऐसा नहीं कह सकते । किन्तु शब्दशक्तिमूल अनुरणन-
रूपव्यङ्ग्य ध्वनि में—
‘पावनों में श्रेष्ठ किरणें ( गायें ) आप लोगों की अपरिमित प्रीति उत्पन्न करें ।’
इत्यादि में, दो अर्थों की शाब्दी प्रतीति में उपमानोपमेयभाव की प्रतीति उपमा-
वाचक पद के अभाव में अर्थ की सामर्थ्य से आक्षिप्त है, इसलिए वहां भी अभिधेय
और व्यङ्ग्य अलङ्कार की प्रतीतियों का पौर्वापर्य स्पष्ट लक्षित हो जाता है ।
पदप्रकाश शब्दशक्तिमूल अनुरणनरूपव्यङ्ग्य ध्वनि में भी उभय अर्थ के साथ
सम्बन्ध के योग्य विशेषण पद को जोड़ने वाले पद के बिना जोड़ना अशाब्द हो जाता
लोचनम्
इति हि पूर्वं वर्णसङ्घटनादिकं नास्य व्यञ्जकत्वेनोक्तमिति भावः । गाथा-
स्विति । ‘भम धम्मिअ’ इत्यादिकासु । ताश्च तत्रैव व्याख्याताः । शाब्दामिति ।
शाब्दामपीत्यर्थः । उपमावाचकं यथेवादि । अर्थसामर्थ्यादिति । वाक्यार्थसाम-
र्थ्यादिति यावत् ।
एवं वाक्यप्रकाशाशब्दशक्तिमूलं विचार्य पदप्रकाशं विचारयति—पद-
प्रकाशेति । विशेषणपदस्येति । जड इत्यस्य । योजकमिति । कूप इति च
भाव यह कि इसमें पहले इस (ध्वनि) के व्यञ्जक रूप से वर्ण, सङ्घटना आदि
को नहीं कहा है । गाथाओं में—। ‘भम धम्मिअ’ इत्यादि में । वे वहीं पर व्याख्यात
हो चुकी हैं । शाब्दी (प्रतीति) में—। अर्थात् शाब्दी (प्रतीति) में भी । उपमावाचक
यथा, इव आदि । अर्थ की सामर्थ्य से—। वाक्यार्थ की सामर्थ्य से ।
इस प्रकार वाक्यप्रकाश शब्द शक्ति (ध्वनि) का विचार करके पदप्रकाश का
विचार करते हैं—पदप्रकाश—। विशेषण पद को—। ‘जड’ इसको ।—जोड़नेवाले—।