भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 511

तृतीय उद्योतः ४५१ ध्वन्यालोकः क्वचित्तु लक्ष्यत एव । यथानुरणनरूपव्यङ्ग्यप्रतीतिषु । तत्रापि कथमिति चेदुच्यते—अर्थशक्तिमूलानुरणनरूपव्यङ्ग्ये ध्वनौ तावद- भिधेयस्य तत्सामर्थ्याक्षिप्तस्य चार्थस्याभिधेयान्तरविलक्षणतयात्यन्त- विलक्षणे ये प्रतीती तयोरशक्यनिह्नवौ निमित्तनिमित्तिभाव इति स्फुटमेव तत्र पौर्वापर्यम् । यथा प्रथमोद्द्योते प्रतीयमानार्थसिद्धयर्थ- परन्तु कहीं पर प्रतीत होता ही है, जैसे अनुरणन रूप व्यङ्ग्य की प्रतीतियों में । यदि कहो कि वहां पर भी कैसे ? तो कहते हैं—अर्थशक्तिमूल अनुरणनरूपव्यङ्ग्य ध्वनि में अभिधेय की और उसकी सामर्थ्य से आक्षिप्त अर्थ की अन्य अभिधेय से विलक्षण रूप होने के कारण अत्यन्त विलक्षण जो प्रतीतियाँ हैं, उनके निमित्तनिमित्ति- भाव को छिपाया नहीं जा सकता, इसलिए स्पष्ट ही वहां पौर्वापर्य है । जैसे प्रथम उद्योत में प्रतीयमान अर्थ को सिद्ध करने के लिए उदाहृत गाथाओं में । और उस लोचनम् यदि तु वाच्याविरोधी रसो न स्यादुचिता च घटना न भवेत्तल्लक्ष्येतैव क्रम इति । चन्द्रिकाकारस्तु पठितमनुपठतीति न्यायेन गजनिमीलिकया व्याचचक्षे- तस्य शब्दस्य फलं तद्वा फलं वाच्यव्यङ्ग्यप्रतीत्यात्मकं तस्य घटना निष्पादना यतोऽनन्यसाध्या शब्दव्यापारैकजन्येति । न चात्रार्थसतत्त्वं व्याख्याने किञ्चि- दुत्पश्याम इत्यलं पूर्ववंश्यैः सह विवादेन बहुना । यत्र तु सङ्घटनाव्यङ्ग्यत्वं नास्ति तत्र लक्ष्यत एवेत्याह—क्वचिदिति । तुल्ये व्यङ्ग्यत्वे कुतो भेद इत्याशङ्कते—तत्रापीति । स्फुटमेवेति । अविवक्षितवाच्यस्य पदवाक्यप्रकाशता । तदन्यस्यानुरणनरूपव्यङ्ग्यस्य च ध्वनेः ॥ प्रकार यहां भी । किन्तु यदि रस वाच्य का अविरोधी न हो और घटना उचित हो तो क्रम लक्षित होगा ही । परन्तु 'चन्द्रिकाकार' ने 'पढ़े को ही पढ़ते हैं' इस न्याय के अनुसार गजनिमीलिका ( हाथी की भांति ऊंघते हुए ) व्याख्यान किया है—'उस शब्द का फल, अथवा वाच्य- व्यङ्ग्य प्रतीतात्मक वह फल, उसकी घटना अर्थात् निष्पादना जिस कारण अनन्य साध्य है, अर्थात् एकमात्र शब्द के व्यापार से जन्य है ।' इस व्याख्यान में कोई अर्थतत्त्व हम नहीं देखते । पूर्वजों के साथ बहुत विवाद अनावश्यक है ! किन्तु जहां सङ्घटना द्वारा व्यङ्ग्यत्व नहीं है वहां प्रतीत होता ही है, यह कहते हैं—परन्तु कहीं पर—। व्यङ्ग्यत्व के सदृश होने पर कैसे भेद है, यह आशङ्का करते हैं—वहां पर भी—। स्पष्ट ही—। अविवक्षितवाच्य और उससे इतर अनुरणनरूप व्यङ्ग्य ध्वनि पदप्रकाश्य और वाक्यप्रकाश्य होता है ।