ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४५० सलोचन-ध्वन्यालोकः
लोचनम् प्रतिपादिता गुणनिरूपणावसरे ताश्च तत्फलाः रसादिप्रतीतिः फलं यासाम् , तथा अनन्यत्तदेव साध्यं यासाम्, न ह्योजोघटनायाः करुणादिप्रतीतिः साध्या । एतदुक्तं भवति—यतो गुणवति काव्येऽसंकीर्णविषयतया सङ्घटना प्रयुक्ता ततः क्रमो न लक्ष्यते । ननु भवत्वेवं सङ्घटनानां स्थितिः, क्रमस्तु किं न लक्ष्यते अत आह—आशुभाविनीषु । वाच्यप्रतीतिकालप्रतीक्षणेन विनैव झटित्येव ता रसादीन् भावयन्ति तदास्वादं विदधतीत्यर्थः । एतदुक्तं भवति— सङ्घटनाव्यङ्ग्यत्वाद्रसादीनामनुपयुक्तेऽप्यर्थविज्ञाने पूर्वमेवोचितसङ्घटनाश्रवण एव यत आसूत्रितो रसास्वादस्तेन वाच्यप्रतीत्युत्तरकालभवेन परिस्फुटास्वाद- युक्तोऽपि पश्चादुत्पन्नत्वेन न भाति । अभ्यस्ते हि विषयेऽविनाभावप्रतीतिक्रम इत्थमेव न लक्ष्यते । अभ्यासो ह्ययमेव यत्प्रणिधानादिनापि विनैव संस्कारस्य बलवत्त्वात्सदैव प्रबुभुत्सुतया अवस्थापनमित्येवं यत्र धूमस्तत्राग्निरिति हृदय- स्थितत्वाद्ध्याप्तेः पक्षधर्मज्ञानमात्रमेवोपयोगि भवतीति परामर्शस्थानमाक्रमति, झटित्युत्पन्ने हि धूमज्ञाने तद्व्याप्तिस्मृत्युपकृते तद्विजातीयप्रणिधानानुसरणादि- प्रतीत्यन्तरानुप्रवेशविरहादाशुभाविन्यामग्निप्रतीतौ क्रमो न लक्ष्यते तद्वदिहापि । माधुर्यादि लक्षण घटनाएं, रसादि की प्रतीति रूप फल है जिनका ऐसे वे (घटनाएं ), तथा नहीं अन्य (अर्थात् वही) है साध्य जिनका (ऐसी वे घटनाएं), ओज वाली घटना का साध्य करुण आदि की प्रतीति नहीं है । बात यह कही गई—जिस कारण गुणवान् काव्य में असङ्कीर्ण विषय के रूप में सङ्घटनाएं प्रयुक्त होती हैं, उस कारण क्रम लक्षित नहीं होता । इस प्रकार की सङ्घट- नाओं की स्थिति हो, किन्तु क्रम क्यों नहीं लक्षित होता है ? इसलिए कहते हैं— आशुभाविनी—। वाच्य की प्रतीतिकाल की प्रतीक्षा के बिना ही झट से वे रसादि का भावन करने लगती है, अर्थात् उनका आस्वाद कराने लगती हैं । बात यह कही गई— रसादि के सङ्घटना से व्यङ्ग्य होने के कारण अर्थज्ञान के अनुपयुक्त होने पर भी पहले ही उचित सङ्घटना के श्रवण में ही जिस कारण थोड़ा स्फुरित (आसूत्रित) रसास्वाद होता है, (वह) वाच्य की प्रतीति के उत्तरकाल में होने वाले उस कारण से परिस्फुट आस्वाद से युक्त होकर भी पश्चात् उत्पन्न रूप से प्रतीत नहीं होता, क्योंकि अभ्यस्त विषय में अविनाभाव (अर्थात् व्याप्ति) की प्रतीति का क्रम यों ही नहीं लक्षित होता । अभ्यास यही है जो कि प्रविधान आदि के बिना ही संस्कार के प्रबल होने के कारण हमेशा जानने के इच्छुक भाव से अवस्थापन है, इस प्रकार 'जहां धूम है वहां अग्नि है' इस व्याप्ति के हृदय में स्थित होने के कारण केवल (धूम आदि का पक्षधर्मता ज्ञान ही उपयोगी होता है, इस कारण परामर्श का स्थान ग्रहण कर लेता है, क्योंकि उस (वह्नि) की व्याप्ति की स्मृति से उपकृत धूमज्ञान के झटिति उत्पन्न होने पर उन (धूमज्ञान और व्याप्तिस्मृति) से विजातीय प्रणिधान का अनुसरण आदि अन्य प्रतीतियों का अनु- प्रवेश न होने से आशु होने वाली अग्नि की प्रतीति में क्रम लक्षित नहीं होता है, उस