ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished680 पृष्ठ
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तृतीय उद्योतः ४४९
ध्वन्यालोकः
रनुपयोगः, उपयोगे वा न सहभावः । येषामपि स्वरूपविशेषप्रतीति-
निमित्तं व्यञ्जकत्वं यथा गीतादिशब्दानां तेषामपि स्वरूपप्रतीतेर्व्यङ्ग्य-
प्रतीतेश्च नियमभावी क्रमः । तत्तु शब्दस्य क्रियापौर्वापर्यमनन्यसाध्य-
तत्फलघटनास्वाशुभाविनीषु वाच्येनाविरोधिन्यभिधेयान्तरविलक्षणे
रसादौ न प्रतीयते ।
नहीं है और यदि उपयोग है तो ( उन दोनों का ) सहभाव नहीं होगा । और
जिनका भी स्वरूपविशेष प्रतीतिमूलक व्यञ्जकत्व है, जैसे गीतादि शब्दों का, उनकी
भी स्वरूपप्रतीति और व्यङ्ग्यप्रतीति का नियमतः क्रम है । किन्तु वह शब्द की
क्रियाओं का पौर्वापर्य अनन्यसाध्य उस फल वाली आशुभाविनी घटनाओं में वाच्य से
विरोध न रखने वाले तथा अन्य वाच्य से विलक्षण रसादि में प्रतीत नहीं होता है ।
लोचनम्
भावितेति त्वयाप्यङ्गीकृतमित्याह—येषामिति । त्वद्दृष्टान्तेनैव वयं वाच्य-
प्रतीतेरपि पूर्वभावितां समर्थयिष्याम इति भावः । ननु संलक्ष्यक्रमः किं न लक्ष्यत
इत्याशङ्क्याह- तत्त्विति । क्रियापौर्वापर्यमित्यनेन क्रमस्य स्वरूपमाह—क्रियते
इति । क्रिये वाच्यव्यङ्ग्यप्रतीती यदि वाभिधाव्यापारो व्यञ्जनापर्यायो
ध्वननव्यापारश्चेति क्रिये तयोः पौर्वापर्यं न प्रतीयते । क्वत्याह—रसादौ विषये ।
कीदृशि ? अभिधेयान्तरात्तदभिधेयविशेषाद्विलक्षणे सर्वथैवानभिधेये अनेन
भवितव्यं तावत्क्रमेणोत्युक्तम् । तथा वाच्येनाविरोधिनि, विरोधिनि तु लक्ष्यत
एवेत्यर्थः । कुतो न लक्ष्यते इति निमित्तसप्तमीनिर्दिष्टं हेत्वन्तरगर्भं हेतुमाह—
आशुभाविनीष्विति । अनन्यसाध्यतत्फलघटनासु घटनाः पूर्वं माधुर्यादिलक्षणाः
उपकारी होता है वह पहले होता है, यह कहते हैं— जिनका—। भाव यह कि तुम्हारे
दृष्टान्त से ही हम वाच्य-प्रतीति का भी पूर्व में होना समर्थन करेंगे । तो यदि क्रम है
तो क्यों नहीं लक्षित होता, यह आशङ्का करके कहते हैं— किन्तु वह—। ‘क्रियाओं
का पौर्वापर्य’ इसके द्वारा क्रम का स्वरूप कहते हैं—क्रिया—। ‘जो की जांय’ वे क्रिया
हैं, यहां वाच्य और व्यङ्ग्य की प्रतीतियां ( क्रिया ) हैं, अथवा अभिधाव्यापार और
व्यञ्नाख्य ध्वनन व्यापार, ये क्रियायें हैं, उनका पौर्वापर्य प्रतीत नहीं होता । कहां ?
इस पर कहते हैं—रसादि विषय में । किस प्रकार के ? उस अभिधेय विशेष अभिधेया-
न्तर से विलक्षण, अर्थात् उसे सर्वथा ही अनभिधेय होना चाहिए इसलिए ‘क्रम से’ यह
कहा है । अर्थात् वह भी वाच्य से विरोध वाले ( रसादि में ), अविरोध वाले में तो
लक्षित ही हो जाता है । किस कारण लक्षित नहीं होता, इस ( प्रश्न के समाधान में )
निमित्तसप्तमी के द्वारा निर्देश करके दूसरा हेतु देते हुए हेतु कहते हैं—आशुभाविनी—।
‘अनन्यसाध्य उस फल वाली घटनाओं में’ पहले गुणनिरूपण के अवसर में प्रतिपादित
२६ ध्व०