भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 508, कुल 680 में से

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पृष्ठ 508

४४८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः स तु क्रमो यदि लाघवान्न लक्ष्यते तत्किं क्रियते । यदि च वाच्यप्रतीतिमन्तरेणैव प्रकरणाद्यवच्छिन्नशब्दमात्रसाध्या रसादिप्रतीतिः स्यात्तदनवधारितप्रकरणानां वाच्यवाचकभावे च स्वयमव्युत्पन्नानां प्रतिपत्तॄणां काव्यमात्रश्रवणादेवासौ भवेत् । सहभावे च वाच्यप्रतीते- वह क्रम यदि लाघव के कारण लक्षित नहीं होता तो क्या किया जाय ? और यदि वाच्य-प्रतीति के बिना ही प्रकरणादि से सहकृत शब्दमात्र से साध्य रसादि की प्रतीति हो तो प्रकरण को नहीं समझे और स्वयं वाच्यवाचकभाव में व्युत्पत्तिरहित ज्ञाताओं को काव्यमात्र के सुनने से वह ( रसादि की प्रतीति ) होनी चाहिए । (वाच्य और व्यङ्ग्य की प्रतीति के) साथ होने पर वाच्य की प्रतीति का कोई उपयोग लोचनम् प्यनुपयोगिनी, यत्तु क्वचिच्छ्रुतेऽपि काव्ये रसप्रतीतिर्न भवति तत्रोचितः प्रक- रणावगमादिः सहकारी नास्तीत्याशङ्क्याह - यदि चेति । प्रकरणावगमो हि क उच्यते ? किं वाक्यान्तरसहायत्वम् ? अथ वाक्यान्तराणां सम्बन्धित्वाच्यम् । उभयपरिज्ञानेऽपि न भवति प्रकृतवाक्यार्थावेदने रसोदयः । स्वयमिति । प्रक- रणमात्रमेव परेण केनचिद्येषां व्याख्यातमिति भावः । न चान्वयव्यतिरेकवर्ती वाच्यप्रतीतिमपह्नुत्यादृष्टसद्भावाभावौ शरणत्वेनाश्रितौ मात्सर्यादधिकं किञ्चि- त्पुष्णीत इत्यभिप्रायः । नन्वस्तु वाच्यप्रतीतेरुपयोगः क्रमाश्रयेण किं प्रयोजनम् , सहभावमात्रमेव ह्युपयोग एकसामग्र्यधीनतालक्षणमित्याशङ्क्याह - सहेति । एवं ह्युपयोग इति अनुपकारके सञ्ज्ञाकरणमात्रं वस्तुशून्यं स्यादिति भावः । उपकारिणो हि पूर्व- शक्ति का कोई उपयोग नहीं, किन्तु जो कहा पर काव्य के सुनने पर भी रस की प्रतीति नहीं होती है वहां उचित प्रकरण-ज्ञान आदि सहकारी नहीं है, यह आशङ्का करके कहते हैं—और यदि—। प्रकरण-ज्ञान किसको कहते हैं ? सहकारी वाक्यान्तर क्या है ? यदि वाक्यान्तरों का वाच्य है तो दोनों के ( वाक्यान्तर और उसका वाच्य ) परिज्ञान से भी प्रकृत वाक्य के अर्थ का ज्ञान करने पर रस का उदय नहीं होता। स्वयं—। भाव यह कि किसी दूसरे ने किन्हीं ( ज्ञाताओं ) का प्रकरणमात्र ही व्याख्यान किया है । अभिप्राय यह कि यदि अन्वय-व्यतिरेक वाली वाच्यप्रतीति का अपह्नव करके प्रयोजक रूप से अदृष्ट के सद्भाव और अभाव को मानते हैं तो वे मात्सर्य से अधिक और की पुष्टि नहीं करते हैं । अच्छा, वाच्य की प्रतीति का उपयोग तो माना, पर क्रम के आश्रयण से क्या प्रयोजन है ? एक सामग्री की अधीनतारूप सहभावमात्र ही उपयोग है, यह आशङ्का करके कहते हैं—सहभाव—। भाव यह कि इस प्रकार यदि उपयोग है तो अनुपकारक का सिर्फ नामकरण वस्तुशून्य होगा । क्योंकि आपने भी अङ्गीकार किया है कि जो