भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 507, कुल 680 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 507

तृतीय उद्योतः ४४७ ध्वन्यालोकः ब्रूमः—प्रकरणाद्यवच्छेदेन व्यञ्जकत्वं शब्दानामित्यनुमतमेवैतदस्मा- कम् । किं तु तद्व्यञ्जकत्वं तेषां कदाचित्स्वरूपविशेषनिबन्धनं कदाचि- द्वाचकशक्तिनिबन्धनम् । तत्र येषां वाचकशक्तिनिबन्धनं तेषां यदि वाच्यप्रतीतिमन्तरेणैव स्वरूपप्रतीत्या निष्पन्नं तद्भवेन्न तर्हि वाचक- शक्तिनिबन्धनम् । अथ तन्निबन्धनं तन्नियमेनैव वाच्यवाचकभाव- प्रतीत्युत्तरकालत्वं व्यङ्ग्यप्रतीतेः प्राप्तमेव । परामर्श होता है । (समाधान) यहां भी हम कहते हैं—प्रकरण आदि के सहकार से शब्दों का व्यञ्जकत्व है यह हमें अनुमत ही है । किन्तु वह व्यञ्जकत्व उनका कभी स्वरूप विशेष के कारण और कभी वाचक शक्ति के कारण है। उनमें जिनका वाचक शक्ति के कारण है उनके यदि वाच्य की प्रतीति के बिना ही स्वरूप की प्रतीति से वह निष्पन्न हो तो वाचकशक्तिमूलक नहीं है और यदि वाचकशक्ति- मूलक है तो नियमतः ही व्यङ्ग्य की प्रतीति का वाच्यवाचकभाव की प्रतीति के उत्तरकाल में होना प्राप्त ही है। लोचनम् पितशब्दादयो निर्दिष्टाः । अनुमतमिति । ‘यत्रार्थः शब्दो वा’ इति ह्यवोचामेति भावः । न तर्हीति । ततश्च गीतवदेवार्थावगमं विनैव रसावभासः स्यात्काव्य- शब्देभ्यः, न चैवमिति वाचकशक्तिरपि तत्रापेक्षणीया; सा च वाच्यनिष्ठैवेति प्राग्वाच्ये प्रतिपत्तिरित्युपगन्तव्यम् । तदाह—अथेति । तदिति वाचकशक्तिः । वाच्यवाचकभावेति । सैव वाचकशक्तिरित्युच्यते । एतदुक्तं भवति—मा भूद्वाच्यं रसादिव्यञ्जकम्; अस्तु शब्दादेव तत्प्रतीति- स्तथापि तेन स्ववाचकशक्तिस्तस्यां कर्तव्यायां सहकारितयावश्यापेक्षणीये- त्यायातं वाच्यप्रतीतेः पूर्वभावित्वमिति । ननु गीतशब्दवदेव वाचकशक्तिरत्रा- निर्दिष्ट हैं । अनुमत—। भाव यह कि ‘जहां अर्थ अथवा शब्द’० यह हमने कहा है । तो वाचकशक्तिमूलक नहीं है—। तब तो गीत ही की भांति अर्थज्ञान के बिना ही काव्य-शब्दों से रस की प्रतीति होगी, पर ऐसा नहीं, इसलिए वहां वाचकशक्ति की अपेक्षा है; और वह वाच्यनिष्ठ ही है, अतः पहले वाक्य का ज्ञान मानना चाहिए । उसे कहते हैं—यदि—। ‘वह’ अर्थात् वाचकशक्ति । वाच्यवाचकभाव—। वही वाचकशक्ति कहलाता है । बात यह कही गई—वाच्य रसादि का व्यञ्जक मत हो; शब्द ही से उनकी प्रतीति हो, तथापि उसे (शब्द को) अपनी वाचकशक्ति की उसे (रसादि की प्रतीति को) उत्पन्न करने में अवश्य अपेक्षा करनी होगी, इस कारण वाच्य की प्रतीति का पहले उत्पन्न होने की बात आ जाती है । (शङ्का) गीत शब्दों की भांति ही यहां भी वाचक-