भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 514

४५४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तस्मादभिधानाभिधेयप्रतीत्योरिव वाच्यव्यङ्ग्यप्रतीत्योर्निमित्तनि- मित्तिभावान्नियमभावी क्रमः । स तूक्तयुक्त्या क्वचिल्लक्ष्यते क्वचिन्न लक्ष्यते । तदेवं व्यञ्जकमुखेन ध्वनिप्रकारेषु निरूपितेषु कश्चिद् ब्रूयात्— किमिदं व्यञ्जकत्वं नाम व्यङ्ग्यार्थप्रकाशनम् , न हि व्यञ्जकत्वं इसलिए अभिधान और अभिधेय की प्रतीति की भांति ही वाच्य और व्यङ्ग्य की प्रतीति का निमित्तनैमित्तिभाव के कारण क्रम नियमभावी है । किन्तु वह उक्त युक्ति के अनुसार कहीं पर लक्षित होता है, कहीं पर नहीं लक्षित होता है । ( शङ्का ) तो इस प्रकार व्यञ्जक के द्वारा ध्वनि के प्रकारों का निरूपण होने पर यदि कोई कहे—क्या यह व्यञ्जकत्व व्यङ्ग्य अर्थ का प्रकाशन ( रूप ) है ? अर्थ का लोचनम् रूपाणां वृत्तीनां जीवितमुपनागरिकाद्यानां च सर्वस्यास्योभयस्यापि वृत्तिव्यव- हारस्य रसादिनियमितविषयत्वादिति यत्प्रस्तुतं तत्प्रसङ्गेन रसादीनां वाच्या- तिरिक्तत्वं समर्थयितुं क्रमो विचारित इत्येतदुपसंहरति—तस्मादिति । अभिधा- नस्य शब्दरूपस्य पूर्वं प्रतीतिस्ततोऽभिधेयस्य । यदाह तत्र भवान्— ‘विषयत्वमनापन्नैः शब्दैरर्थः प्रकाश्यते’ इत्यादि । अतोऽनिर्ज्ञातरूपत्वात्किमाहेत्यभिधीयते’ इत्यत्रापि चाविनाभाववत्सम- यस्याभ्यस्तत्वात्क्रमो न लक्ष्येतापि । उद्द्योतारम्भे यदुक्तं व्यञ्जनमुखेन ध्वनेः स्वरूपं प्रतिपाद्यत इति तदिदानी- मुपसंहरन्व्यञ्जकभावं प्रथमोद्द्योते समर्थितमपि शिष्याणामेकप्रघट्टकेन हृदि निवेशयितुं पूर्वपक्षमाह—तदेवमिति । कश्चिदिति । मीमांसकादिः । किमिदमिति । और उपनागरिका आदि वृत्तियों के जीवित हैं, क्योंकि यह समस्त वृत्तिव्यवहार का विषय रसादि से नियन्त्रित होता है, यह जो प्रस्तुत था उसके प्रसंग से रसादि का वाच्याति- रिक्तत्व समर्थन करने के लिए क्रम विचार किया है । अब इसे उपसंहार करते हैं— इसलिए। पहले शब्दरूप अभिधान की प्रतीति तब अभिधेय की । क्योंकि महानुभाव का कहते हैं— ‘स्वयं ज्ञात न हुए शब्दों से अर्थ प्रकाशित नहीं होता है’ इत्यादि । इसलिए रूप के ज्ञात न होने के कारण ‘क्या कहते हैं ?’ ‘यह कहते हैं’ यहाँ पर भी ( अर्थात् अभिधान और अभिधेय की प्रतीतियों में भी ) अविनाभाव की भाँति समय ( अर्थात् सङ्केत ) के अभ्यस्त होने के कारण क्रम लक्षित न भी होगा । उद्योत के आरम्भ में जो कहा है कि व्यञ्जक के द्वारा ध्वनि का स्वरूप प्रतिपादन करते हैं, उसका अब उपसंहार करते हुए व्यञ्जकत्व का प्रथम उद्योत में समर्थन हो जाने पर भी एक प्रकरण के द्वारा शिष्यों के हृदय में निविष्ट करने के लिए पूर्वपक्ष कहते हैं—