ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished680 पृष्ठ
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तृतीय उद्योतः ४५५
ध्वन्यालोकः
व्यङ्ग्यत्वं चार्थस्य व्यञ्जकसिद्ध्यधीनं व्यङ्ग्यत्वम्, व्यङ्ग्यापेक्षया च
व्यञ्जकत्वसिद्धिरित्यन्योन्यसंश्रयादव्यवस्थानम् । ननु वाच्यव्यति-
रिक्तस्य व्यङ्ग्यस्य सिद्धिः प्रागेव प्रतिपादिता तत्सिद्ध्यधीना च
व्यञ्जकसिद्धिरिति कः पर्यनुयोगावसरः । सत्यमेवैतत् ; प्रागुक्तयुक्ति-
भिर्वाच्यव्यतिरिक्तस्य वस्तुनः सिद्धिः कृता, स त्वर्थो व्यङ्ग्यतयैव
व्यञ्जकत्व और व्यङ्ग्यत्व इसलिए अव्यवस्थित है कि व्यङ्ग्यत्व की सिद्धि व्यञ्जक की
सिद्धि के अधीन है और व्यङ्ग्य की अपेक्षा से व्यञ्जकत्व की सिद्धि है यह अन्योन्या-
श्रय हो जाता है । ( समाधान ) वाच्य से व्यतिरिक्त व्यङ्ग्य की सिद्धि का प्रतिपादन
पहले ही कर चुके हैं, और उसके अधीन व्यञ्जक की सिद्धि है, फिर प्रश्न का अवसर
कैसा ? ( शङ्का ) यह ठीक ही है; पहले कही हुई युक्तियों द्वारा वाच्य से व्यतिरिक्त
वस्तु की सिद्धि की है, परन्तु उस अर्थ को व्यङ्ग्यरूप से ही क्यों व्यपदेश करते हैं ?
और जहां ( वह अर्थ ) प्राधान्यतः रहता है वहां उसे वाच्यरूप से ही व्यपदेश
लोचनम्
वक्ष्यमाणश्चोदकस्याभिप्रायः । प्रागेवेति । प्रथमोद्द्योते अभाववादनिराकरणे ।
अतश्च न व्यञ्जकसिद्ध्या तत्सिद्धियेनान्योन्याश्रयः शङ्क्येत, अपि तु हेत्वन्त-
रैस्तस्य साधितत्वादिति भावः । तदाह—तत्सिद्धीति । स त्विति । अस्त्वसौ
द्वितीयोऽर्थः, तस्य यदि व्यङ्ग्य इति नाम कृतम्, वाच्य इत्यपि कस्मान्न
क्रियते ? व्यङ्ग्य इति वा वाच्याभिमतस्यापि कस्मान्न क्रियते ? अवगम्य-
मानत्वेन हि शब्दार्थत्वं तदेव वाचकत्वम् । अभिधा हि यत्पर्यन्ता तत्रैवाभिधाय-
कत्वमुचितम्, तत्पर्यन्तता च प्रधानीभूते तस्मिन्नर्थ इति मूर्धाभिषिक्तं ध्वनेर्य-
तो इस प्रकार—। कोई—। मीमांसक आदि । क्या यह—। अर्थात् चोद्यवादी (दोषद्रष्टा)
का वक्ष्यमाण अभिप्राय । पहले ही—। प्रथम उद्योत में अभाववाद के निराकरण के
प्रसङ्ग में । भाव यह कि इसलिए व्यञ्जक की सिद्धि से उसकी सिद्धि नहीं होती है,
जिससे अन्योन्याश्रय की शङ्का की जाय, बल्कि अन्य हेतुओं से वह सिद्ध किया जाता
है । इसलिए कहते हैं—उसकी सिद्धि—। परन्तु उस—। माना कि वह दूसरा अर्थ है,
यदि उसका 'व्यङ्ग्य' नाम देते हैं तो 'वाच्य' भी नाम क्यों नहीं करते? अथवा वाच्य रूप
से अभिमत का भी 'व्यङ्ग्य' क्यों नहीं ( नाम ) करते है ? शब्द के द्वारा जो अवगम्य-
मानत्व है वही वाचकत्व है । जहाँ तक अभिधा है वहीं अभिधायकत्व उचित है और
उस ( अभिधा ) की पर्यन्तता प्रधानीभूत उस अर्थ में है, इस प्रकार जो ध्वनि का
मूर्धाभिषिक्त रूप निरूपण किया गया है, उसमें ही अभिधा व्यापार को होना ठीक है ।