भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 516, कुल 680 में से

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पृष्ठ 516

कस्माद्व्यपदिश्यते यत्र च प्राधान्येनानवस्थानं तत्र वाच्यतयैवासौ व्यपदेष्टुं युक्तः, तत्परत्वाद्वाक्यस्य । अतश्च तत्प्रकाशिनो वाक्यस्य वाचकत्वमेव व्यापारः । किं तस्य व्यापारान्तरकल्पनया ? तस्मा- त्तात्पर्यविषयो योऽर्थः स तावन्मुख्यतया वाच्यः । या त्वन्तरा तथाविधे विषये वाच्यान्तरप्रतीतिः सा तत्प्रतीतेरुपायमात्रं पदार्थप्रती- तिरिव वाक्यार्थप्रतीतेः । करना ठीक है, क्योंकि वाक्य का तात्पर्य उसी में है । और इसलिए उस ( अर्थ ) के प्रकाशक वाक्य का वाचकत्व ही व्यापार है । उसके अन्य व्यापार की कल्पना से क्या लाभ ? इसलिए जो अर्थ तात्पर्य का विषय है वह मुख्यरूप से वाच्य है । किन्तु जो उस प्रकार के विषय में बीच में वाच्यान्तर की प्रतीति है वह उस उस प्रतीति का वाक्यार्थप्रतीति का पदार्थप्रतीति की भांति उपायमात्र है ।

द्रूपं निरूपितं तत्रैवाभिधाव्यापारेण भवितुं युक्तम् । तदाह—यत्र चेति । तत्प्रकाशिन इति । तद्व्यङ्ग्याभिमतं प्रकाशयत्यवश्यं यद्वाक्यं तस्येति । उपायमात्रमित्यनेन साधारण्योक्त्या भाट्टं प्राभाकरं वैयाकरणं च पूर्वपक्षं सूचयति । भाट्टमते हि— वाक्यार्थमितये तेषां प्रवृत्तौ नान्तरीयकम् । पाके ज्वालेव काष्ठानां पदार्थप्रतिपादनम् ॥ इति शब्दावगतैः पदार्थैस्तात्पर्येण योऽर्थ उत्थाप्यते स एव वाक्यार्थः, स एव च वाच्य इति । प्राभाकरदर्शनेऽपि दीर्घदीर्घो व्यापारो निमित्तिनि वाक्यार्थे, पदार्थानां तु निमित्तभावः पारमार्थिक एव । वैयाकरणानां तु सोऽपारमार्थिक इसलिए कहते हैं—और जहाँ— । उसके प्रकाशक— । उस व्यङ्ग्य रूप अभिमत को जो वाक्य अवश्य प्रकाशिक करता है उसका । ‘उपाय मात्र’ इस साधारण कथन से भाट्ट, प्राभाकर और वैयाकरण पूर्वपक्ष को सूचित करते हैं । क्योंकि भाट्टमत में वाक्यार्थ के ज्ञान के लिए उन ( पदों ) की प्रवृत्ति में पदार्थ का प्रतिपादन पाक कार्य में काष्ठों की ज्वाला की भाँति नान्तरीयक ( उपाय मात्र ) है । इसलिए शब्दों से अवगत पदार्थों द्वारा तात्पर्य रूप से जो अर्थ उठाया जाता है वही वाक्यार्थ है और वही वाच्य है । प्राभाकरदर्शन में भी दीर्घदीर्घ व्यापार नैमित्तिक कार्यरूप-वाक्यार्थ में ( होता है ), किन्तु पदार्थों का निमित्तभाव पारमार्थिक ही होता है । ( वैयाकरणों की दृष्टि में ) वह अपारमार्थिक है यह विशेष है । इसे हमने प्रथम