भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 517

तृतीय उद्योतः ४५७ ध्वन्यालोकः अत्रोच्यते—यत्र शब्दः स्वार्थमभिदधानोऽर्थान्तरमवगमयति तत्र यत्तस्य स्वार्थाभिधायित्वं यच्च तदर्थान्तरावगमहेतुत्वं तयोरविशेषो विशेषो वा। न तावदविशेषः; यस्मात्तौ द्वौ व्यापारौ भिन्नविषयौ भिन्नरूपौ च प्रतीयेते एव। तथाहि वाचकत्वलक्षणो व्यापारः शब्दस्य स्वार्थविषयः गमकत्वलक्षणस्त्वर्थान्तरविषयः । न च स्वपरव्यवहारो वाच्यव्यङ्ग्ययोरपह्रोतुं शक्यः, एकस्य सम्बन्धित्वेन प्रतीतेरपरस्य सम्बन्धिसम्बन्धित्वेन । वाच्यो ह्यर्थः साक्षाच्छब्दस्य यहां कहते हैं—जहां शब्द अपने अर्थ का अभिधान करता हुआ अर्थान्तर का अवगमन कराता है वहां जो उसका उसका स्वार्थाभिधायित्व और जो उसके अर्थान्तर का अवगमहेतुत्व है उन दोनों में अविशेष है अथवा विशेष ? अविशेष तो नहीं है, क्योंकि वे दोनों व्यापार भिन्न विषय और भिन्नरूप प्रतीत होते ही हैं। जैसा कि शब्द का वाचकत्वरूप व्यापार अपने अर्थ को विषय करता है, किन्तु गमकत्वरूप (व्यापार) अर्थान्तर को विषय करता है। वाच्य और व्यङ्ग्य के स्व-पर व्यवहार का अपह्नव नहीं किया जा सकता, क्योंकि एक सम्बन्धीरूप से प्रतीत होता है दूसरा सम्बन्धी के सम्बन्धी रूप से। वाच्य अर्थ शब्द का साक्षात् सम्बन्धी है, किन्तु लोचनम् इति विशेषः । एतच्चास्माभिः प्रथमोद्द्योत एव वितत्य निर्णीतमिति न पुनरा- यस्यते ग्रन्थयोजनैव तु क्रियते। तदेतन्मतत्रयं पूर्वपक्षे योज्यम्। अत्रेति पूर्वपक्षे । उच्यत इति सिद्धान्तः । वाचकत्वं गमकत्वं चेति स्वरूपतो भेदः स्वार्थेऽर्थान्तरे च क्रमेणेति विषयतः । ननु तस्माच्चेदसौ गम्यते- ऽर्थः कथं तर्ह्युच्यतेऽर्थान्तरमिति । नो चेत्स तस्य न कश्चिदिति को विषयर्थ इत्याशङ्क्याह-न चेति । न स्यादिति । एवकारो भिन्नक्रमः, नैव स्यादित्यर्थः । यावता न साक्षात्सम्बन्धित्वं तेन युक्त एवार्थान्तरव्यवहार इति विषयभेद उद्योत में ही विस्तार करके निर्णय किया है, इसलिए पुनः श्रम नहीं करते, किन्तु ग्रन्थ की योजना है कर देते हैं। इन तीनों मतों को पूर्वपक्ष में लगाना चाहिए। यहां अर्थात् पूर्वपक्ष में। कहते हैं सिद्धान्त। वाचकत्व और गमकत्व यह स्वरूपतः भेद है और क्रम से स्वार्थ में और अर्थान्तर में विषयतः (भेद) है। यदि उस (शब्द) से वह अर्थ (व्यङ्ग्य अर्थ) अवगत होता है तो क्यों अर्थान्तर कहते हैं? यदि नहीं, तो उसका (वह) कोई नहीं, फिर 'विषय' का अर्थ क्या? यह आशङ्का करके कहते हैं—स्व-पर व्यवहार—। नहीं होगा—। 'ही' भिन्नक्रम है, अर्थात् नहीं ही होगा। जिस कारण साक्षात् सम्बन्धित्व नहीं है उस कारण अर्थान्तर व्यवहार ठीक ही