भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 518, कुल 680 में से

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पृष्ठ 518

४५८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः सम्बन्धी तदितरस्त्वभिधेयसामर्थ्याक्षिप्तः सम्बन्धिसम्बन्धी । यदि च स्वसम्बन्धित्वं साक्षात्तस्य स्यात्तदार्थान्तरत्वव्यवहार एव न स्यात् । तस्माद्विषयभेदस्तावत्तयोर्व्यापारयोः सुप्रसिद्धः । रूपभेदोऽपि प्रसिद्ध एव । न हि यैवाभिधानशक्तिः सैवावगमनशक्तिः । अवाचकस्यापि गीतशब्दादे रसादिलक्षणार्थावगमदर्शनात् । अशब्दस्यापि चेष्टादेरर्थ- विशेषप्रकाशनप्रसिद्धेः । तथाहि 'व्रीडायोगान्नतवदना' इत्यादिश्लोके चेष्टाविशेषः सुकविनार्थप्रकाशनहेतुः प्रदर्शित एव । तस्माद्भिन्नविषय- उससे इतर (व्यङ्ग्य अर्थ) अभिधेय की सामर्थ्य से आक्षिप्त होकर सम्बन्धी का सम्बन्धी है । यदि वह शब्द का साक्षात् सम्बन्धी होगा तब (उसमें) अर्थान्तरत्व का व्यवहार ही नहीं होगा । इसलिए उन दोनों व्यापारों का विषयभेद सुप्रसिद्ध है । रूपभेद भी प्रसिद्ध ही है, क्योंकि जो ही अभिधानशक्ति है वही अवगमनशक्ति नहीं है । क्योंकि अवाचक भी गीत शब्द आदि से रसादिरूप अर्थ का अवगम देखा जाता है अशब्द भी चेष्टा आदि से अर्थविशेष के प्रकाशन की प्रसिद्धि है । जैसा कि 'व्रीडा- योगान्नतवदना' इत्यादि श्लोक में सुकवि ने अर्थ प्रकाशन के हेतु चेष्टाविशेष को दिखाया ही है । इसलिए भिन्न विषय और भिन्नरूप होने के कारण शब्द का जो लोचनम् उक्तः । ननु भिन्नेऽपि विषये अक्षशब्दादेर्बह्वर्थस्य एक एवाभिधालक्षणो व्यापार इत्याशङ्क्य रूपभेदमुपपादयति—रूपभेदोऽपीति । प्रसिद्धमेव दर्शयति— न हीति । विप्रतिपन्नं प्रति हेतुमाह—अवाचकस्यापीति । यदेव वाचकत्वं तदेव- गमकत्वं यदि स्यादावाचकस्य गमकत्वमपि न स्यात्, गमकत्वे नैव वाचकत्व- मपि न स्यात् । न चैतदुभयमपि गीतशब्दे शब्दव्यतिरिक्ते चाधोवक्त्रत्वकु- चकम्पनबाष्पावेशादौ तस्यावाचकस्याप्यवगमकारित्वदर्शनादवगमकारिणोऽ- प्यवाचकत्वेन प्रसिद्धत्वादिति तात्पर्यम् । एतदुपसंहरति—तस्माद्विन्नेति । है, इसलिए विषयभेद कहा है । विषय भिन्न होने पर भी बह्वर्थ 'अक्ष' आदि शब्दों का एक ही अभिधारूप व्यापार होगा, यह आशङ्का करके रूपभेद का उपपादन करते हैं— रूपभेद भी—। प्रसिद्धि को ही दिखाते हैं—नहीं—। विप्रतिपन्न के प्रति हेतु कहते हैं—अवाचक का—। तात्पर्य यह कि यदि जो ही वाचकत्व है वही गमकत्व है तो अवाचक का भी गमकत्व न होगा, गमकत्व न होने पर वाचकत्व भी नहीं ही होगा । यह दोनों भी (वाचकत्व और गमकत्व) गीत शब्द में और शब्दव्यतिरिक्त नीच मुख होना, कुचकम्पन, बाष्पावेश आदि में नहीं हैं, क्योंकि वह अवाचक (गीत शब्द भी) अवगमकारी देखा जाता है और अवगमकारी भी अवाचक रूप से प्रसिद्ध होता है । इसका उपसंहार करते हैं—इसलिए भिन्न—। नहीं—। वाच्य अभिधा

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