ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ४५९ ध्वन्यालोकः त्वाद्भिन्नरूपत्वाच्च स्वार्थाभिधायित्वमर्थान्तरावगमहेतुत्वं च शब्दस्य यत्तयोः स्पष्ट एव भेदः । विशेषश्चेन्न तर्हीदानीमवगमनस्याभिधेयसा- मर्थ्याक्षिप्तस्यार्थान्तरस्य वाच्यत्वव्यपदेश्यता । शब्दव्यापारगोचरत्वं तु तस्यास्माभिरिष्यत एव, तत्तु व्यङ्ग्यत्वेनैव न वाच्यत्वेन । प्रसिद्धा- भिधानान्तरसम्बन्धयोग्यत्वेन च तस्यार्थान्तरस्य प्रतीतेः शब्दान्त- रेण स्वार्थाभिधायिना यद्विषयीकरणं तत्र प्रकाशनोक्तिरेव युक्ता । स्वार्थाभिधायित्व और अर्थान्तरावगमहेतुत्व है, उन दोनों का भेद स्पष्ट ही है। यदि भेद है तो फिर अब अवगमनरूप, अभिधेय की सामर्थ्य से आक्षिप्त अर्थान्तर को वाच्य नहीं कहा जा सकता । परन्तु वह शब्द व्यापार का गोचर है यह हम तो स्वीकार करते ही हैं, किन्तु उसे व्यङ्ग्यरूप से हां, न कि वाच्यरूप से । और प्रसिद्ध अभिधान से अतिरिक्त सम्बन्ध के योग्य रूप से उस अर्थान्तर की प्रतीति का जो स्वार्थ का अभिधान करने वाले शब्दान्तर के द्वारा विषयीकरण है वहां 'प्रकाशन' यह कथन ही ठीक है । लोचनम् न तर्हीति । वाच्यत्वं ह्यभिधाव्यापारविषयता न तु व्यापारमात्रविषयता, तथात्वे तु सिद्धसाधनमित्येतदाह—शब्दव्यापारेति । ननु गीतादौ मा भूद्वाचकत्वमिह त्वर्थान्तरेऽपि शब्दस्य वाचकत्वमेवोच्य- ते, किं हि तद्वाचकत्वं सङ्कोच्यत इत्याशङ्क्याह—प्रसिद्धेति । शब्दान्तरेण तस्या- र्थान्तरस्य यद्विषयीकरणं तत्र प्रकाशनोक्तिरेव युक्ता न वाचकत्वोक्तिः शब्दस्य, नापि वाच्यत्वोक्तिरर्थस्य तत्र युक्ता, वाचकत्वं हि समयवशादव्यवधानेन प्रति- पादकत्वं, यथा तस्यैव शब्दस्य स्वार्थे; तदाह-स्वार्थाभिधायिनेति । वाच्यत्वं हि समयबलेन निर्व्यवधानं प्रतिपाद्यत्वं यथा तस्यैवार्थस्य शब्दान्तरं प्रति- व्यापार का विषय होता है, न कि व्यापारमात्र का विषय होता है, ऐसा होने पर तो सिद्धसाधन होगा, यह कहते हैं—शब्द व्यापार—। गीत आदि में वाचकत्व मत हो, परन्तु यहाँ अर्थान्तर में भी शब्द का वाचकत्व ही कहा जायगा, उसके वाचकत्व को सङ्कुचित क्यों करते हैं ? यह आशङ्का करके कहते हैं—और प्रसिद्ध—। शब्दान्तर द्वारा उस अर्थान्तरे का जो विषयीकरण है वहां 'प्रकाशन' कथन ही ठीक हो न कि शब्द का 'वाचकत्व' कथन । और अर्थ का वहां वाच्यत्व कथन भी ठीक नहीं, क्योंकि समय ( सङ्केत ) के द्वारा बिना किसी व्यवधान के प्रतिपादकत्व 'वाचकत्व' है, जैसे उसी शब्द का अपने अर्थ में, उसे कहते हैं—स्वार्थ का अभिधान करने वाले—। समय ( सङ्केत ) के बल से बिना किसी व्यवधान के