भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 520, कुल 680 में से

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पृष्ठ 520

४६० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः न च पदार्थवाक्यार्थन्यायो वाच्यव्यङ्ग्ययोः । यतः पदार्थप्रती- तिरसत्यैवेति कैश्चिद्विद्वद्भिःस्थितम् । यैरप्यसत्यत्वमस्या नाभ्युपेयते तैर्वाक्यार्थपदार्थयोर्घटतदुपादानकारणन्यायोऽभ्युपगन्तव्यः । यथा हि घटे निष्पन्ने तदुपादानकारणानां न पृथगुपलम्भस्तथैव वाक्ये तदर्थे वा प्रतीते पदतदर्थानां तेषां तदा विभक्ततयोपलम्भे वाक्यार्थबुद्धिरेव वाच्य और व्यङ्ग्य में पदार्थ और वाक्यार्थ का न्याय नहीं चलेगा, क्योंकि कुछ विद्वानों का निश्चय है कि पदार्थ की प्रतीति असत्य ही है । जो इसे असत्य नहीं स्वीकार करते उन्हें पदार्थ और वाक्यार्थ में घट और उसके उपादानकारणों का न्याय स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि जैसे घट के निष्पन्न होने पर उसके उपादान कारणों का अलग से उपलम्भ नहीं होता, उसी प्रकार वाक्य अथवा उसके अर्थ के प्रतीत होने पर पदों का अथवा उनके अर्थों का तब अलग से उपलम्भ होने पर वाक्यार्थ- लोचनम् तदाह—प्रसिद्धेति । प्रसिद्धेन वाचकतयाभिधानान्तरेण यः सम्बन्धो वाच्यत्वं तदेव तत्र वा यद्योग्यत्वं तेनोपलक्षितस्य । न चैवविधं वाचकत्वमर्थं प्रति शब्द- स्येहास्ति, नापि तं शब्दं प्रति तस्यार्थस्योक्तरूपं वाच्यत्वम् । यदि नास्ति तर्हि कथं तस्य विषयीकरणमुक्तमित्याशङ्कयाह-प्रतीतेरिति । अथ च प्रतीयते सोऽर्थो न च वाच्यवाचकत्वव्यापारेणेति विलक्षण एवासौ व्यापार इति यावत् । नन्वेवं मा भूद्वाचकशक्तिस्तथापि तात्पर्यशक्तिर्भविष्यतीत्याशङ्कयाह—न चेति । कैश्चिदिति वैयाकरणैः । यैरपीति भट्टप्रभृतिभिः । तमेव न्यायँ व्याचष्टे- यथाहीति । तदुपादानकारणानामिति । समवायिकारणानि कपालानि अनयो- क्त्या निरूपितानि । सौगतकापिलमते तु यद्यप्युपादातव्यघटकाले उपादाना- प्रतिपाद्यत्व वाच्यत्व है, उसी अर्थ का शब्दान्तर के प्रति, उसे कहते हैं—प्रसिद्ध—। वाचक रूप से प्रसिद्ध अभिधानान्तर के साथ जो सम्बन्ध वाच्यत्व है वही अथवा वहां जो योग्यत्व है उससे उपलक्षित । इस प्रकार का वाचकत्व अर्थ के प्रति शब्द का यहां नहीं है और उस शब्द के प्रति उस उक्तरूप अर्थ का वाच्यत्व भी नहीं है । यदि नहीं है, तो कैसे उसका विषयीकरण कहा है, यह आशङ्का करके कहते हैं—प्रतीति का—। वह अर्थ प्रतीत होता है, न कि वाच्यवाचकत्व व्यापार द्वारा ( प्रतीत होता है ), इस- लिए वह व्यापार विलक्षण ही है । इस प्रकार वाचक शक्तिमत हे, तथापि तात्पर्य शक्ति होगी, यह आशङ्का करके कहते हैं—वाच्य और—। कुछ अर्थात् वैयाकरण लोग । जो भट्ट प्रभृति । उसी न्याय की व्याख्या करते हैं—क्योंकि जैसे—। उसके उपादानकारणों का—। इस कथन से समवायी कारण कपाल निरूपित होते हैं । परन्तु बौद्ध और साङ्ख्य के मत में यद्यपि