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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 521

तृतीय उद्योतः ४६१ ध्वन्यालोकः दूरीभवेत्। न त्वेष वाच्यव्यङ्ग्ययोर्न्यायः, न हि व्यङ्ग्ये प्रतीयमाने वाच्यबुद्धिर्दूरीभवति, वाच्यावभासाविनाभावेन तस्य प्रकाशनात्। तस्माद् घटप्रदीपन्यायस्तयोः, यथैव हि प्रदीपद्वारेण घटप्रतीतावुत्पन्ना- यां न प्रदीपप्रकाशो निवर्तते तद्वद्व्यङ्ग्यप्रतीतौ वाच्यावभासः। यत्तु बुद्धि ही दूर हो जायगी। परन्तु यह न्याय वाच्य और व्यङ्ग्य में नहीं है, क्योंकि व्यङ्ग्य के प्रतीयमान होने पर वाच्य की बुद्धि दूर नहीं होती, उसका प्रकाशन वाच्य के साथ अविनाभाव से होता है। इसलिए उन दोनों में घट और प्रदीप का न्याय है, क्योंकि जैसे ही कि प्रदीप के द्वारा घट की प्रतीति उत्पन्न होने पर प्रदीप का प्रकाश निवृत्त नहीं होता उसी प्रकार व्यङ्ग्य की प्रतीति में वाच्य का अवभास। जो लोचनम् नां न सत्ता एकत्र क्षणक्षयित्वेन परत्र तिरोभूतत्वेन तथापि पृथक्तया नास्त्यु- पलम्भ इतीत्यंशे दृष्टान्तः। दूरीभवेदिति। अर्थैकत्वस्याभावादिति भावः। एवं पदार्थवाक्यार्थन्यायं तात्पर्यशक्तिसाधकं प्रकृते विषये निराकृत्याभिमतां प्रका- शशक्तिं साधयितुं तदुचितं प्रदीपघटन्यायं प्रकृते योजयन्नाह—तस्मादिति। यतोऽसौ पदार्थवाक्यार्थन्यायो नेह युक्तस्तस्मात्, प्रकृतं न्यायं व्याकरणपूर्वकं दार्ष्टान्तिके योजयति—यथैव हीति। ननु पूर्वमुक्तम्— यथा पदार्थद्वारेण वाक्यार्थः सम्प्रतीयते। वाक्यार्थपूर्विका तद्वत्प्रतिपत्तस्य वस्तुनः॥ इति तत्कथं स एव न्याय इह यत्नेन निराकृत इत्याशङ्क्याह-यत्त्विति। उपादातव्य घट के काल में उपादानों की सत्ता एक में (बौद्ध मत में) क्षण भर स्थायी होने के कारण और दूसरे में (सांख्य मत में) तिरोभूत होने के कारण नहीं होती तथापि अलग से उपलब्ध नहीं है इस अंश में दृष्टान्त है। दूर हो जायगी—। भाव यह कि एक अर्थ के न होने के कारण। इस प्रकार तात्पर्य शक्ति के साधक पदार्थ वाक्यार्थ न्याय को प्रकृत विषय में निराकरण करके अभिमत प्रकाश शक्ति को सिद्ध करने के लिए उसके उचित प्रदीप-घट न्याय को प्रकृत में लगाते हुए कहते हैं— इसलिए—। जिस लिए वह पदार्थ-वाक्यार्थ न्याय यहीं ठीक नहीं है, इसलिए, प्रकृत न्याय को विवरणपूर्वक दार्ष्टान्तिक में लगाते हैं—जैसे ही कि—। पहले कहा है— 'जैसे पदार्थ के द्वारा वाक्यार्थ प्रतीत होता है उसी प्रकार उस (व्यङ्ग्यरूप) वस्तु की प्रतिपत्ति वाक्यार्थ की प्रतीतिपूर्वक होती है।' तो कैसे उस न्याय को यहां यत्न से निराकरण किया है? यह आशङ्का करके