भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 522

४६२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः प्रथमोद्द्योते 'यथा पदार्थद्वारेण' इत्याद्युक्तं तदुपायत्वमात्रात्साम्य- विवक्षया । नन्वेवं युगपदर्थद्वययोगित्वं वाक्यस्य प्राप्तं तद्भावे च तस्य वा- क्यतैव विघटते, तस्या ऐकार्थ्यलक्षणत्वात्; नैष दोषः; गुणप्रधानभा- वेन तयोर्व्यवस्थानात् । व्यङ्ग्यस्य हि क्वचित्प्राधान्यं वाच्यस्योपस- र्जनभावः क्वचिद्वाच्यस्य प्राधान्यमपरस्य गुणभावः । तत्र व्यङ्ग्यप्रा- धान्ये ध्वनिरित्युक्तमेव; वाच्यप्राधान्ये तु प्रकारान्तरं निर्देक्ष्यते । कि 'प्रथम उद्योत' में 'यथा पदार्थद्वारेण' इत्यादि कहा है वह उपायमात्र के अंश में साम्य की विवक्षा से । तब तो इस प्रकार एक काल में वाक्य दो अर्थों से युक्त होगा, ऐसा होने पर उसकी वाक्यता ही विघटित होगी, क्योंकि 'एकार्थत्व उसका लक्षण है' ! ( उत्तर ) यह दोष नहीं; क्योंकि उन दोनों का गुण-प्रधानरूप से व्यवस्थान है । कहीं पर व्यङ्ग्य का प्राधान्य है, वाच्य का उपसर्जनभाव और कहीं पर वाच्य का प्राधान्य है, अपर का गुणभाव । उनमें, व्यङ्ग्य के प्राधान्य में ध्वनि है यह कहा जा चुका है, किन्तु वाच्य के प्राधान्य में प्रकारान्तर का निर्देश करेंगे । इसलिए यह निश्चित लोचनम् तदिति । न तु सर्वथा साम्येनेत्यर्थः । एवमिति । प्रदीपघटवद्युगपदुभयाव- भासप्रकारेणेत्यर्थः । तस्या इति वाक्यतायाः । ऐकार्थ्यलक्षणमर्थैकत्वाद्ध वाक्यमेकमित्युक्तम् । सकृत् श्रुतो हि शब्दो यत्रैव समयस्मृतिं करोति स चेदने- नैवावगमितः तद्विरम्यव्यापाराभावात्समयस्मरणानां बहूनां युगपद्योगात्कोऽ- र्थभेदस्यावसरः । पुनः श्रुतस्तु स्मृतो वापि नासाविति भावः । तयोरिति वाच्य- व्यङ्ग्ययोः । तत्रेति । उभयोः प्रकारयोर्मध्याद्यदा प्रथमः प्रकार इत्यर्थः । प्रका- रान्तरमिति । गुणीभूतव्यङ्ग्यसञ्ज्ञितम् । व्यङ्ग्यत्वमेवेति प्रकाश्यत्वमेवेत्यर्थः । कहते हैं—जो कि—। वह—। अर्थात् न कि सर्वथा साम्यपूर्वक । इस प्रकार—। अर्थात् प्रदीप-घट की भांति एक काल में दोनों के अवभास के प्रकार से । उसका वाक्यता का । 'अर्थ एक होने से एकार्थत्व रूप एक वाक्य होता है' यह कहा है । भाव यह कि एक बार श्रुत शब्द जहां पर हो समय (सङ्केत) की स्मृति करता है वह यदि इसी से (एक बार श्रुत शब्द ही से) विदित हो गया तो विरत होने पर व्यापार नहीं होता इसलिए बहुत से सङ्केत के स्मरणों एक समय में न होने के कारण अर्थभेद का अवसर ही कहां ? वह (शब्द) फिर से न श्रुत है अथवा न स्मृत है । उन दोनों का वाच्य और व्यङ्ग्य का । उनमें—। अर्थात् दोनों प्रकारों के बीच से जब प्रथम प्रकार होगा । प्रकारान्तर—। गुणीभूतव्यङ्ग्यसंज्ञक । व्यङ्ग्यत्व ही अर्थात् प्रकाश्यत्व ही ।