भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 523, कुल 680 में से

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पृष्ठ 523

तृतीय उद्योतः ४६३ ध्वन्यालोकः तस्मात्-स्थितमेतत् — व्यङ्ग्यपरत्वेऽपि काव्यस्य न व्यङ्ग्यस्याभिधे- यत्वमपि तु व्यङ्ग्यत्वमेव । किं च व्यङ्ग्यस्य प्राधान्येनाविवक्षायां वाच्यत्वं तावद्भवद्भिर्ना- भ्युपगन्तव्यमतत्परत्वाच्छब्दस्य । तदस्ति तावद्व्यङ्ग्यः शब्दानां कश्चि- द्विषय इति । यत्रापि तस्य प्राधान्यं तत्रापि किमिति तस्य स्वरूपम- पह्नूयते । एवं तावद्वाचकत्वादन्यदेव व्यञ्जकत्वम्; इतश्च वाचकत्वा- व्यञ्जकत्वस्यान्यत्वं यद्वाचकत्वं शब्दैकाश्रयमितरत्तु शब्दाश्रयमर्थाश्रयं च शब्दार्थयोर्द्वयोरपि व्यञ्जकत्वस्य प्रतिपादितत्वात् । हुआ—काव्य का व्यङ्ग्य में तात्पर्य होने पर भी व्यङ्ग्य का अभिधेयत्व नहीं, अपितु व्यङ्ग्यत्व ही है । और भी, प्राधान्य से व्यङ्ग्य की विवक्षा न होने पर शब्द के तत्पर न होने के कारण आप वाच्यत्व को नहीं मानेंगे । इसलिए शब्दों का कोई विषय व्यङ्ग्य है । जहां भी उसका प्राधान्य है वहां उसके स्वरूप का अपह्नव क्यों करते हैं ? इस प्रकार व्यञ्जकत्व वाचकत्व से अन्य ही है । और इस कारण भी व्यञ्जकत्व वाचकत्व से अन्य है कि वाचकत्व एकमात्र शब्द के आश्रित है, परन्तु दूसरा शब्द के और अर्थ के आश्रित है, क्योंकि शब्द और अर्थ दोनों के भी व्यञ्जकत्व का प्रतिपादन कर चुके हैं । लोचनम् ननु यत्परः शब्दः स शब्दार्थ इति व्यङ्ग्यस्य प्राधान्ये वाच्यत्वमेव न्याय्यम्, तर्ह्यप्राधान्ये किं युक्तं व्यङ्ग्यत्वमिति चेत्सिद्धो नः पक्षः, एतदाह— किञ्चेति । ननु प्राधान्ये मा भूद्व्यङ्ग्यत्वमित्याशङ्कयाह—यत्रापीति । अर्थान्त- रत्वं सम्बन्धिसम्बन्धित्वमनुपयुक्तसमयत्वमिति व्यङ्ग्यतायां निबन्धनं, तच्च प्राधान्येऽपि विद्यत इति स्वरूपमहेयमेवेति भावः । एतदुपसंहरति—एवमिति । विषयभेदेन स्वरूपभेदेन चेत्यर्थः । तावदिति वक्तव्यान्तरमासूत्रयति । तदे- चाह—इतश्चेति । अनेन सामग्रीभेदात्कारणभेदोऽप्यस्तीति दर्शयति । एतच्च 'शब्द जिसमें तात्पर्य रखता हो वह शब्दार्थ है' इसके अनुसार व्यङ्ग्य के प्राधान्य में वाच्यत्व ही उचित है, तो अप्राधान्य में क्या व्यङ्ग्यत्व ठीक है ? तब तो हमारा पक्ष सिद्ध हो गया, इसे कहते हैं—और भी—। प्राधान्य में व्यङ्ग्यत्व मत हो, यह आशङ्का करके कहते हैं—जहां भी—। अर्थान्तर होना, सम्बन्धी का सम्बन्धी होना, अनुपयुक्त समय ( सङ्केत ) का होना, यह व्यङ्ग्य होने में कारण हैं, और यह प्राधान्य में भी विद्यमान हैं, इस प्रकार स्वरूप अत्याज्य ही है, यह भाव है । इसका उपसंहार करते हैं—इस प्रकार—। अर्थात् विषयभेद से और स्वरूपभेद से । दूसरा वक्तव्य प्रस्तुत करते हैं। उसे ही कहते हैं—और इस कारण भी—। 'सामग्रीभेद से कारणभेद