भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 524, कुल 680 में से

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पृष्ठ 524

४६४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः गुणवृत्तिस्तूपचारेण लक्षणया चोभयाश्रयापि भवति । किन्तु ततोऽपि व्यञ्जकत्वं स्वरूपतो विषयतश्च भिद्यते । रूपभेदस्तावदयम्- यदमुख्यतया व्यापारो गुणवृत्तिः प्रसिद्धा । व्यञ्जकत्वं तु मुख्यतयैव शब्दस्य व्यापारः । न ह्यर्थाद्व्यङ्ग्यत्रयप्रतीतिर्या तस्या अमुख्यत्वं मनागपि लक्ष्यते । अयं चान्यः स्वरूपभेदः—यदगुणवृत्तिरमुख्यत्वेन व्यवस्थितं वाच- कत्वमेवोच्यते । व्यञ्जकत्वं तु वाचकत्वादत्यन्तं विविक्तमेव । एतच्च गुणवृत्ति तो उपचार और लक्षणा से शब्द और अर्थ दोनों के भी आश्रित होती है । किन्तु उससे भी व्यञ्जकत्व स्वरूप से और विषय से भिन्न हो जाता है । रूपभेद यह है कि गुणवृत्ति अमुख्यरूप से व्यापार प्रसिद्ध है, परन्तु व्यञ्जकत्व मुख्यरूप से ही शब्द का व्यापार है । अर्थ से तीनों व्यङ्ग्यों की जो प्रतीति है उसका अमुख्यत्व थोड़ा भी नहीं दिखाई देता । और यह दूसरा स्वरूप भेद है कि अमुख्यरूप से व्यवस्थित वाचकत्व को ही गुणवृत्ति कहते हैं । परन्तु व्यञ्जकत्व अत्यन्त विभिन्न ही है । इसे प्रतिपादन कर चुके लोचनम् वितत्य ध्वनिलक्षणे 'यत्रार्थः शब्दो वा' इति वाग्रहणं 'व्यङ्क्तः' इति द्विवचनं च व्याचक्षाणैरस्माभिः प्रथमोद्द्योत एव दर्शितमिति पुनर्न विस्तार्यते । एवं विषयभेदात्स्वरूपभेदात्कारणभेदाच्च वाचकत्वान्मुख्यात्प्रकाशक- त्वस्य भेदं प्रतिपाद्योभयाश्रयत्वाविशेषात्तर्हि व्यञ्जकत्वगौणत्वयोः को भेद इत्याशङ्क्यामुख्यादपि प्रतिपादयितुमाह—गुणवृत्तिरिति । उभयाश्रयापीति शब्दार्थाश्रया । उपचारलक्षणयोः प्रथमोद्द्योत एव विभज्य निर्णीतं स्वरूपमिति न पुनर्लिख्यते । मुख्यतयैवेति । अस्खलद्गतित्वेनेत्यर्थः । भी है' यह इससे दिखाते हैं । इसे विस्तार करके 'ध्वनि' लक्षण में 'यत्रार्थः शब्दो वा' यहां 'वा' ग्रहण और 'व्यङ्क्तः' इसमें द्विवचन का व्याख्यान करते हुए हमने प्रथम उद्योत में ही दिखा दिया है इसलिए फिर विस्तार नहीं करते हैं । इस प्रकार विषयभेद, स्वरूपभेद और कारणभेद द्वारा मुख्य वाचकत्व से प्रकाश- कत्व के भेद का प्रतिपादन करके ( शब्द और अर्थ रूप ) उभय के आश्रित होने के अविशेष होने से, व्यञ्जकत्व और गौणत्व का क्या भेद है ? यह आशङ्का करके अमुख्य से भी ( भेद ) प्रतिपादनार्थ कहते हैं—गुणवृत्ति— । उभय के आश्रित अर्थात् शब्द और अर्थ के आश्रित । उपचार और लक्षणा का स्वरूप प्रथम उद्योत में ही निर्णीत हो चुका है इसलिए फिर नहीं लिखते हैं । मुख्यरूप से ही— । अर्थात् अस्खलद्गतिरूप से ही ।