ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ४६५ ध्वन्यालोकः प्रतिपादितम् । अयं चापरो रूपभेदो यद्गुणवृत्तौ यदार्थोऽर्थान्तरमुपल- क्षयति तदोपलक्षणीयार्थात्मना परिणत एवासौ सम्पद्यते । यथा 'गङ्गा- यां घोषः' इत्यादौ । व्यञ्जकत्वमार्गे तु यदार्थोऽर्थान्तरं द्योतयति तदा स्वरूपं प्रकाशयन्नेवासावन्यस्य प्रकाशकः प्रतीयते प्रदीपवत् । यथा— 'लीलाकमलपत्राणि गणयामास पार्वती' इत्यादौ । यदि च यत्राति- रस्कृतस्वप्रतीतिरर्थोऽर्थान्तरं लक्षयति तत्र लक्षणाव्यवहारः क्रियते, त- देवं सति लक्षणैव मुख्यः शब्दव्यापार इति प्राप्तम् । यस्मात्प्रायेण वाक्यानां वाच्यव्यतिरिक्ततात्पर्यविषयार्थावभासित्वम् । हैं। और यह अन्य रूपभेद है कि जब गुणवृत्ति में अर्थ अर्थान्तर का उपलक्षित करता है तब उपलक्षणीय अर्थ के रूप से परिणत ही वह होता है। जैसे—'गङ्गायां घोषः' इत्यादि में। परन्तु व्यञ्जकत्व मार्ग में जब अर्थ अर्थान्तर को द्योतित करता है तब प्रदीप की भांति स्वरूप को प्रकाशित करता हुआ ही वह अन्य का प्रकाशक प्रतीत होता है। जैसे—पार्वती लीलाकमल के पत्ते गिनने लग गई' इत्यादि में। और यदि जहां अर्थ अपनी प्रतीति को तिरस्कृत करता हुआ अर्थान्तर को लक्षित करता है वहां लक्षणाव्यवहार किया जाता है, तो इस प्रकार होने पर लक्षणा ही मुख्य शब्द का व्यापार है, यह प्राप्त होता है। जिस कारण प्रायः करके वाक्य वाच्य से व्यतिरिक्त तात्पर्य विषयक अर्थ के अवभासक होते हैं। लोचनम् प्रतिपादितमिति । इदानीमेव । परिणत इति । स्वेन रूपेणानिर्भासमान इत्यर्थः । कीदृश इति मुख्यो वा न वा प्रकारान्तराभावात् । मुख्यत्वे वाचकत्वम- न्यथा गुणवृत्तिः, गुणो निमित्तं सादृश्यादि तद्द्वारिका वृत्तिः शब्दस्य व्यापारो गुणवृत्तिरिति भावः । मुख्य एवासौ व्यापारः सामग्रीभेदाच्च वाचकत्वाद्व्यति- रिच्यत इत्यभिप्रायेणाह--उच्यत इति । एवमस्खलद्गतित्वात् कथञ्चिदपि तीनों व्यङ्ग्य—। वस्तु, अलङ्कार और रस रूप । प्रतिपादन कर चुके हैं—अभी ही । परिणत—। अर्थात् अपने रूप से प्रतीत न होता हुआ । किस प्रकार का मुख्य अथवा नहीं ( अर्थात् अमुख्य ), क्योंकि तीसरा प्रकार नहीं है । मुख्य होने पर वाचकत्व ( व्यापार ) होगा, अन्यथा गुणवृत्ति ( व्यापार ) होगी । भाव यह कि गुण अर्थात् सादृश्य आदि निमित्त, उसके द्वारा वृत्ति अर्थात् शब्द का व्यापार 'गुणवृत्ति' है। वह व्यापार है मुख्य ही है और सामग्री के भेद से वाचकत्व से अलग हो जाता है, इस अभिप्राय से कहते हैं—कहते हैं—। इस प्रकार स्खलद्गति न ३० ध्व०