ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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ध्वन्यालोकः
ननु त्वत्पक्षेऽपि यदार्थो व्यङ्ग्यत्रयं प्रकाशयति तदा शब्दस्य कीदृशो व्यापारः। उच्यते—प्रकरणाद्यवच्छिन्नशब्दवशेनैवार्थस्य तथा- विधं व्यञ्जकत्वमिति शब्दस्य तत्रोपयोगः कथमपह्नूयते । विषयभेदोऽ- पि गुणवृत्तिव्यञ्जकत्वयोः स्पष्ट एव । यतो व्यञ्जकत्वस्य रसादयोऽल- ङ्कारविशेषा व्यङ्ग्यरूपावच्छिन्नं वस्तु चेति त्रयं विषयः । तत्र रसादि- प्रतीतिर्गुणवृत्तिरिति न केनचिदुच्यते न च शक्यते वक्तुम् । व्यङ्ग्या- लङ्कारप्रतीतिरपि तथैव । वस्तुचारुत्वप्रतीतये स्वशब्दानभिधेयत्वेन
तुम्हारे पक्ष में भी जब अर्थ तीनों व्यङ्ग्यों को प्रकाशित करता है तब शब्द का व्यापार किस प्रकार का होता है ? कहते हैं—प्रकरण आदि से सहकृत शब्द के वश से ही अर्थ का उस प्रकार का व्यञ्जकत्व है, इसलिए शब्द का वहां उपयोग कैसे छिपाया जा सकता है ! गुणवृत्ति और व्यञ्जकत्व में विषयभेद भी स्पष्ट ही है, क्योंकि रसादि, अलङ्कारविशेष और व्यङ्ग्यरूप से अवच्छिन्न वस्तु ये तीनों व्यञ्जकत्व के विषय हैं । उनमें, रसादि की प्रतीति को गुणवृत्ति नहीं कहता और न कह सकता है । व्यङ्ग्य अलङ्कार की प्रतीति भी उसी प्रकार है । वस्तु के चारुत्व की प्रतीति के
लोचनम्
समयानुपयोगात्पृथगाभासमानत्वाच्चेति त्रिभिः प्रकारैः प्रकाशकत्वस्यैत- द्विपरीतरूपत्रयायाश्च गुणवृत्तेः स्वरूपभेदं व्याख्याय विषयभेदमप्याह-विषयभेदो- ऽपीति । वस्तुमात्रं गुणवृत्तेरपि विषय इत्यभिप्रायेण विशेषयति-व्यङ्ग्यरूपाव- च्छिन्नमिति । व्यञ्जकत्वस्य यो विषयः स गुणवृत्तेर्न विषयः अन्यश्च तस्या विषयभेदो योज्यः । तत्र प्रथमं प्रकारमाह—तत्रेति । न च शक्यत इति । लक्षणासामग्र्यास्तत्राविद्यमानत्वादिति हि पूर्वमेवोक्तम् । तथैवेति । न तत्र गुणवृत्तिर्युक्तेत्यर्थः । वस्तुनो यत्पूर्वं विशेषणं कृतं तद्व्याचष्टे—चारुत्वप्रतीतय
होने के कारण, किसी प्रकार समय ( सङ्केत ) के उपयोग न होने के कारण और पृथक् आभासमान होने के कारण, इन तीनों प्रकारों से प्रकाशकत्व ( व्यञ्जकत्व ) का और इनके विपरीत तीन रूपों वाली गुणवृत्ति का स्वरूपभेद व्याख्यान करके विषयभेद को भी कहते हैं—विषयभेद भी—। वस्तु मात्र गुणवृत्ति का भी विषय है यह विशेषता बताते हैं—व्यङ्ग्य रूप से अवच्छिन्न—। जो व्यञ्जकत्व का विषय है वह गुणवृत्ति का विषय नहीं है, और अन्य उसका विषयभेद लगा लेना चाहिए । उनमें प्रथम प्रकार को कहते हैं—उनमें—। नहीं कह सकता है—। क्योंकि यह पहले ही कह चुके हैं कि लक्षणा की सामग्री वहां विद्यमान नहीं । उसी प्रकार है—। अर्थात् वहां गुणवृत्ति ठीक नहीं । वस्तु का जो पहले विशेषण किया है उसकी व्याख्या करते हैं—चारुत्व की