भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 527, कुल 680 में से

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पृष्ठ 527

तृतीय उद्योतः ४६७ ध्वन्यालोकः यत्प्रतिपिपादयितुमिष्यते तद्व्यङ्ग्यम् । तच्च न सर्वं गुणवृत्तेर्विषयः प्रसिद्धयनुरोधाभ्यामपि गौणानां शब्दानां प्रयोगदर्शनात् । तथोक्तं प्राक् । यदपि च गुणवृत्तेर्विषयस्तदपि च व्यञ्जकत्वानुप्रवेशेन । तस्मा- द्गुणवृत्तेरपि व्यञ्जकत्वस्यात्यन्तविलक्षणत्वम् । वाचकत्वगुणवृत्तिवि- लक्षणस्यापि च तस्य तदुभयाश्रयत्वेन व्यवस्थानाम् । लिए स्वशब्द द्वारा अनभिधेय रूप से जिसे प्रतिपादन करना चाहते हैं वह व्यङ्ग्य है। वह सब नहीं गुणवृत्ति का विषय है, क्योंकि प्रसिद्धि और अनुरोध से भी गौण शब्दों का प्रयोग देखा जाता है। जैसा कि पहले कह चुके हैं। और जो भी गुणवृत्ति का विषय होगा वह भी व्यञ्जकत्व के सम्बन्ध से होगा। इसलिए गुणवृत्ति से भी व्यञ्जकत्व अत्यन्त विलक्षण है। वाचकत्व और गुणवृत्ति से विलक्षण भी वह (व्यञ्ज- कत्व) दोनों के आश्रित रूप से रहता है। लोचनम् इति । न सर्वमिति । किंचित्तु भवति । यथा—‘निःश्वासान्ध इवादर्शः' इति । यदुक्तम्—'कस्यचिद् ध्वनिभेदस्य सा तु स्यादुपलक्षणम्' इति । प्रसिद्धितो लावण्यादयः शब्दाः, वृत्तानुरोधव्यवहारानुरोधादेः 'वदति बिसिनीपत्रशयन- म्' इत्येवमादयः । प्रागिति । प्रथमोद्द्योते 'रूढा ये विषयेऽन्यत्र' इत्यत्रान्तरे । न सर्वमिति यथास्माभिर्व्याख्यातं तथा स्फुटयति—यदपि चेति । गुणवृत्तेरिति पञ्चमी । अधुनेतररूपोपजीवकत्वेन तदितरस्मात्तदितररूपोपजीवकत्वेन च तदितरस्मादित्यनेन पर्यायेण वाचकत्वाद् गुणवृत्तेश्च द्वितयादपि भिन्नं व्यञ्जक- त्वमित्युपपादयति—वाचकत्वेति । चोऽवधारणे भिन्नक्रमः, अपिशब्दोऽपि । न केवलं पूर्वोक्तो हेतुकलापो यावत्तदुभयाश्रयत्वेन मुख्योपचाराश्रयत्वेन यद्व्य- प्रतीति के लिए—। सब नहीं—। कुछ तो होता है, जैसे 'निःश्वासान्ध इवादर्शः'। क्योंकि कहा है—'किसी ध्वनि के भेद का वह उपलक्षण हो सकती है'। प्रसिद्धि से 'लावण्य' आदि शब्द। वृत्तानुरोध और व्यवहारानुरोध आदि से 'वदति बिसिनीपत्र- शयनम्' इत्यादि । पहले—। प्रथम उद्योत में 'रूढा ये विषयेऽन्यत्र' इसके बीच । 'सब नहीं' को जिस प्रकार हमने व्याख्यान किया है उस प्रकार स्पष्ट करते हैं—और जो कि—। 'गुणवृत्ति' यहां पञ्चमी विभक्ति है। अब (व्यञ्जकत्व) इतर रूप (गुणवृत्ति) के उपजीवक (आश्रय) रूप के कारण इतर रूप (वाचकत्व) से (भिन्न होता है) और इतर रूप (वाचकत्व) के उपजीवक रूप से उससे इतररूप (गुणवृत्ति) से (भिन्न होता है); इस प्रकार क्रम से वाचकत्व और गुणवृत्ति इन दोनों से भी व्यञ्जकत्व भिन्न होता है यह उपपादन करते हैं—वाचकत्व—। 'और' शब्द अवधारणार्थक और भिन्न क्रम है। 'भी' शब्द भी भिन्नक्रम है। न केवल पूर्वोक्त हेतुसमूह बल्कि दोनों के आश्रित