भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 528, कुल 680 में से

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पृष्ठ 528

४६८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः व्यञ्जकत्वं हि क्वचिद्वाचकत्वाश्रयेण व्यवतिष्ठते, यथा विवक्षिता- न्यपरवाच्ये ध्वनौ। क्वचित्तु गुणवृत्त्याश्रयेण यथा अविवक्षितवाच्ये ध्वनौ। तदुभयाश्रयत्वप्रतिपादनायैव च ध्वनेः प्रथमतरां द्वौ प्रभेदावुप- न्यस्तौ। तदुभयाश्रितत्वाच्च तदेकरूपत्वं तस्य न शक्यते वक्तुम्। यस्मान्न तद्वाचकत्वैकरूपमेव, क्वचिल्लक्षणाश्रयेण वृत्तेः। न च लक्षणै- करूपमेवान्यत्र वाचकत्वाश्रयेण व्यवस्थानात्। न चोभयधर्मत्वेनैव तदेकैकरूपं न भवति। यावद्वाचकत्वलक्षणादिरूपरहितशब्दधर्मत्वेना- पि। तथाहि गीतध्वनीनामपि व्यञ्जकत्वमस्ति रसादिविषयम्। न च व्यञ्जकत्व कहीं पर वाचकत्व के आश्रय से व्यवस्थित होता है, जैसे विवक्षितान्य- परवाच्य ध्वनि में, परन्तु कहीं पर गुणवृत्ति के आश्रय से, जैसे अविवक्षितवाच्य ध्वनि में। और उन दोनों (वाचकत्व और गुणवृत्ति) के आश्रयत्व के प्रतिपादनार्थ ही ध्वनि के पहले-पहल दो प्रभेद उपन्यस्त हैं। और उन दोनों पर आश्रित होने के कारण वह (व्यञ्जकत्व) उनके साथ एक रूप नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह वाचकत्व के साथ एक रूप ही नहीं है, क्योंकि कहीं पर लक्षणा के आश्रय से भी रहता है। और लक्षणा के साथ एक रूप ही नहीं है, अन्यत्र वाचकत्व के आश्रय से भी व्यवस्थित होता है। और न केवल उभयधर्म रूप से ही वह एक-एकरूप का नहीं होता है, अपि तु वाचकत्व, लक्षणा आदि रूप से रहित शब्द के धर्म रूप से भी। जैसा कि गीत ध्वनियों का भी रसादिविषयक व्यञ्जकत्व है। किन्तु उनका लोचनम् वस्थानं तदपि वाचकगुणवृत्तिविलक्षणस्यैवेति व्याप्तिघटनम्। तेनायं तात्प- र्यार्थः—तदुभयाश्रयत्वेन व्यवस्थानात्तदुभयवैलक्षण्यमिति। एतदेव विभजते—व्यञ्जकत्वं हीति। प्रथमतरामिति। प्रथमोद्द्योते 'स च' इत्यादिना ग्रन्थेन। हेत्वन्तरमपि सूचयति—न चेति। वाचकत्वगौणत्वोभय- वृत्तान्तवैलक्षण्यादिति सूचितो हेतुः। तमेव प्रकाशयति—तथाहीत्यादिना। होकर मुख्य और उपचार के आश्रित रूप से जो व्यवस्थान है वह भी वाचक और गुणवृत्ति से विलक्षण उस व्यञ्जक की व्याप्ति बनी है। इससे यह तात्पर्यार्थ है—उन दोनों के आश्रित रूप से रहने के कारण उन दोनों से वैलक्षण्य है। इसी का विभाग करते हैं—व्यञ्जकत्व—। पहले-पहल—। प्रथम उद्योत में 'और वह' इत्यादि ग्रन्थ द्वारा। दूसरा हेतु सूचित करते हैं—और लक्षणा—। 'वाचकत्व और गौणत्व इन दोनों वृत्तान्तों से वैलक्षण्य के कारण' यह हेतु सूचित किया है। उसे ही प्रकाशित करते हैं—जैसा कि—। इत्यादि द्वारा। उनका गीतादि शब्दों का। दूसरा

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