ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ४६९
ध्वन्यालोकः तेषां वाचकत्वं लक्षणा वा कथञ्चिल्लक्ष्यते । शब्दादन्यत्रापि विषये व्य- ञ्जकत्वस्य दर्शनाद्वाचकत्वादिशब्दधर्मप्रकारत्वमयुक्तं वक्तुम् । यदि च वाचकत्वलक्षणादीनां शब्दप्रकाराणां प्रसिद्धप्रकारविलक्षणत्वेऽपि व्यञ्ज- कत्वं प्रकारत्वेन परिकल्प्यते तच्छब्दस्यैव प्रकारत्वेन कस्मान्न परिक- ल्प्यते । तदेवं शाब्दे व्यवहारे त्रयः प्रकाराः—वाचकत्वं गुणवृत्तिर्व्य- वाचकत्व अथवा लक्षणा किसी प्रकार नहीं लक्षित होती । शब्द के अतिरिक्त भी विषय में व्यञ्जकत्व के देखे जाने के कारण वाचकत्व आदि शब्द-धर्मों का प्रकार कहना ठीक नहीं । और यदि प्रसिद्ध प्रकारों से विलक्षण होने पर भी व्यञ्जकत्व को वाचकत्व और लक्षणा आदि शब्द-प्रकारों प्रकार (धर्म) बनाते हैं तो शब्द का ही प्रकार रूप से क्यों नहीं (उसे) बनाते हैं ? तो इस प्रकार शाब्द व्यवहार में तीन प्रकार हैं—वाचकत्व, गुणवृत्ति और लोचनम् तेषामिति । गीतादिशब्दानाम् । हेत्वन्तरमपि सूचयति—शब्दादन्यत्रेति । वाचकत्वगौणत्वाभ्यामन्यद् व्यञ्जकत्वं शब्दादन्यत्रापि वर्तमानत्वात्प्रमेयत्वा- दिवदिति हेतुः सूचितः । नन्वन्यत्रावाचके यद्व्यञ्जकत्वं तद्भवतु वाचकत्वा- देर्विलक्षणम्, वाचके तु यद् व्यञ्जकत्वं तद्विलक्षणमेवास्त्वित्याशङ्क्याह— यदीति । आदिपदेन गौणं गृह्यते । शब्दस्यैवेति । व्यञ्जकत्वं वाचकत्वमिति यदि पर्यायौ कल्प्येते तर्हि व्यञ्जकत्वं शब्द इत्यपि पर्यायता कस्मान्न कल्प्यते, इच्छाया अव्याहतत्वात् । व्यञ्जकत्वस्य तु विविक्तं स्वरूपं दर्शितं तद्विषया- न्तरे कथं विपर्यस्यताम् । एवं हि पर्वतगतो धूमोऽनग्निजोऽपि स्यादिति भावः । अधुनोपपादितं विभागमुपसंहरति—तदेवमिति । व्यवहारग्रहणेन समु- द्रघोषादीन् व्युदस्यति । हेतु भी सूचित करते हैं—शब्द के अतिरिक्त—। व्यञ्जकत्व वाचकत्व और गौणत्व से भिन्न है, क्योंकि शब्द के अतिरिक्त भी (स्थल में) वर्तमान रहता है, प्रमेयत्व आदि की भांति' यह हेतु सूचित किया । अन्यत्र अवाचक (गीतादि) स्थल में जो व्यञ्जकत्व है वह वाचकत्व आदि से विलक्षण हो, परन्तु जो वाचक में व्यञ्जकत्व है वह विलक्षण नहीं है, यह आशङ्का करके कहते हैं—और यदि—। 'आदि' पद से गौण को ग्रहण करते हैं । शब्द का ही—। व्यञ्जकत्व और वाचकत्व को यदि पर्याय बनाते हो तो व्यञ्जकत्व और शब्द को क्यों नहीं पर्याय बना लेते हैं, क्योंकि इच्छा तो अव्याहत होती है । व्यञ्जकत्व का तो अलग रूप दिखा चुके हैं वह विषयान्तर में कैसे विपर्यस्त होगा ? भाव यह कि इस प्रकार तो पर्वतगत धूम अनग्निज भी हो सकता है । अब उपपादित विभाग का उपसंहार करते हैं—तो इस प्रकार—। 'व्यवहार' के ग्रहण से समुद्र की आवाज आदि का निराकरण करते हैं ।