ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished680 पृष्ठ
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४७० सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
ञ्जकत्वं च । तत्र व्यञ्जकत्वे यदा व्यङ्ग्यप्राधान्यं तदा ध्वनिः, तस्य
चाविवक्षितवाच्यो विवक्षितान्यपरवाच्यश्चेति द्वौ प्रभेदावनुकान्तौ
प्रथमतंरं तौ सविस्तरं निर्णितौ ।
अन्यो ब्रूयात्—ननु विवक्षितान्यपरवाच्ये ध्वनौ गुणवृत्तिता
नास्तीति यदुच्यते तद्युक्तम् । यस्माद्वाच्यवाचकप्रतीतिपूर्विका यत्रार्था-
न्तरप्रतिपत्तिस्तत्र कथं गुणवृत्तिव्यवहारः, न हि गुणवृत्तौ यदा निमि-
त्तेन केनचिद्विषयान्तरे शब्द आरोप्यते अत्यन्ततिरस्कृतस्वार्थः यथा-
व्यञ्जकत्व । उनमें से व्यञ्जकत्व में जब व्यङ्ग्य का प्राधान्य होता है तब ध्वनि होती
है, और उसके अविवक्षितवाच्य और विवक्षितान्यपरवाच्य ये दो प्रभेद क्रम-प्राप्त होते
हैं, उन्हें पहले ही विस्तारपूर्वक निर्णय कर चुके हैं ।
अन्य कोई कह सकता है—विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि में गुणवृत्ति व्यवहार
नहीं है यह जो कहते हैं सो ठीक है, क्योंकि वाच्य-वाचक की प्रतीतिपूर्वक जहां
अर्थान्तर की प्रतीति होती है वहां गुणवृत्तिव्यवहार कैसे हो सकता है ? गुणवृत्ति में
जब किसी निमित्त से अत्यन्त तिरस्कृत स्वार्थ शब्द को विषयान्तर में आरोप करते
लोचनम्
ननु वाचकत्वरूपोपजीवकत्वाद् गुणवृत्त्यनुजीवकत्वादिति च हेतुद्वयं
यदुक्तं तदविवक्षितवाच्यभागे सिद्धं न भवति तस्य लक्षणैकशरीरत्वादित्य-
भिपायेणोपक्रमते-अन्यो ब्रूयादिति । यद्यपि च तस्य तदुभयाश्रयत्वेन व्यव-
स्थानादिति ब्रुवता निर्णीतचरमेवैतत्, तथापि गुणवृत्तेरविवक्षितवाच्यस्य च
दुर्निरूपं वैलक्षण्यं यः पश्यति तं प्रत्याशङ्कानिवारणार्थोऽयमुपक्रमः । अत एवा-
द्यभेदस्याङ्गीकरणपूर्वकमयं द्वितीयभेदाक्षेपः । विवक्षितान्यपरवाच्य इत्यादिना
पराभ्युपगमस्य स्वाङ्गीकारो दर्श्यते । गुणवृत्तिव्यवहाराभावे हेतुं दर्शयितुं
तस्या एव गुणवृत्तेस्तावद् वृत्तान्तं दर्शयति—न हीति । गुणतया वृत्तिर्व्यापारो
जो कि वाचकत्व रूप उपजीवकत्व और गुणवृत्ति रूप अनुजीवकत्व ये दो हेतु कहे
हैं वह अविवक्षितवाच्य के अंश में सिद्ध नहीं होते, क्योंकि उसका एकमात्र शरीर
लक्षणा है, इस अभिप्राय से उपक्रम करते हैं—अन्य कोई कह सकता है—। 'वह उन
दोनों के आश्रय से व्यवस्थित होता है' यह यद्यपि कथन करते हुए निर्णय कर ही चुके
हैं तथापि जो व्यक्ति गुणवृत्ति और अविवक्षितवाच्य का वैलक्षण्य दुर्निरूप देखता है
उसकी आशङ्का के निवारणार्थ यह उपक्रम है । इसी लिए यह प्रथम भेद का अङ्गीकार-
पूर्वक दूसरे भेद का आक्षेप है । 'विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि में' इत्यादि द्वारा अन्य
किसी के मन्तव्य की स्वीकृति दिखाते हैं । गुणवृत्ति व्यवहार के न होने का कारण
दिखाने के लिए उसी गुणवृत्ति का वृत्तान्त दिखाते हैं—गुणवृत्ति में—। गुण रूप