ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ४७१ ध्वन्यालोकः 'अग्निर्माणवकः' इत्यादौ, यदा वा स्वार्थमंशेनापरित्यजंस्तत्सम्बन्धद्वा- रेण विषयान्तरमाक्रामति, यथा- 'गङ्गायां घोषः' इत्यादौ । तदावि- वक्षितवाच्यत्वमुपपद्यते । अत एव च विवक्षितान्यपरवाच्ये ध्वनौ वा- च्यवाचकयोर्द्वयोरपि स्वरूपप्रतीतिरर्थावगमनं च दृश्यत इति व्यञ्ज- कत्वव्यवहारो युक्त्यनुरोधी । स्वरूपं प्रकाशयन्नेव परावभासको व्य- ञ्जक इत्युच्यते, तथाविधे विषये वाचकत्वस्यैव व्यञ्जकत्वमिति गुण- वृत्तिव्यवहारो नियमेनैव न शक्यते कर्तुम् । हैं, जैसे 'माणवक अग्नि है' इत्यादि में; अथवा जब (शब्द) स्वार्थ को अंशतः नहीं छोड़ता हुआ विषयान्तर पर पहुंच जाता है, जैसे 'गङ्गा में घोष' इत्यादि में, विवक्षित- वाच्यत्व नहीं बनता। और इसीलिए विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि में वाच्य और वाचक दोनों की भी स्वरूपप्रतीति और अर्थ का ज्ञान देखा जाता है इस लिए व्यञ्ज- कत्वव्यवहार युक्त्यनुकूल है । स्वरूप को प्रकाशित करता हुआ भी अन्य को अवभा- सित कराने वाला 'व्यञ्जक' कहलाता है, उस प्रकार के विषय में वाचकत्व का ही व्यञ्जकत्व है, इसलिए गुणवृत्ति-व्यवहार नियमतः ही नहीं किया जा सकता । लोचनम् गुणवृत्तिः । गुणेन निमित्तेन सादृश्यादिना वृत्तिः अर्थान्तरविषयेऽपि शब्दस्य सामानाधिकरण्यमिति गौणं दर्शयति । यदा वा स्वार्थमिति लक्षणां दर्शयति । अनेन भेदद्वयेन च स्वीकृतमविवक्षितवाच्यभेदद्वयात्मकमिति सूचयति । अत एव अत्यन्ततिरस्कृतस्वार्थशब्देन विषयान्तरमाक्रामति चेत्यनेन शब्देन तदेव भेदद्वयं दर्शयति-अत एव चेति । यत एव न तत्रोक्तहेतुबलाद् गुणवृत्ति- व्यवहारो न्याय्यस्तत इत्यर्थः । युक्तिं लोकप्रसिद्धिरूपामबाधितां दर्शयति- स्वरूपमिति । उच्यत इति प्रदीपादिः, इन्द्रियादेस्तु करणत्वान्न व्यञ्जकत्वं प्रतीत्युत्पत्तौ । (अप्रधान रूप) से वृत्ति अर्थात् व्यापार गुणवृत्ति है । सादृश्य आदि गुण के निमित्त से वृत्ति अर्थात् अर्थान्तर के विषय में शब्द का सामानाधिकरण्य ('गुणवृत्ति') है, इससे गौण भेद दिखाते हैं। 'अथवा जब स्वार्थ को' इससे लक्षणा को दिखाते हैं। इन दोनों भेदों से अविवक्षितवाच्य का स्वीकृत भेदद्वयात्मक है' यह सूचित करते हैं । इसी लिए और 'अत्यन्ततिरस्कृत स्वार्थ' शब्द से और 'विषयान्तर पर पहुँच जाता है' इस शब्द से उन्हीं दोनों भेदों को दिखाते हैं-और इसीलिए-। अर्थात् जिस कारण ही वहां उक्त हेतु के बल से गुणवृत्ति व्यवहार ठीक नहीं है उस कारण । लोकप्रसिद्धिरूप अबा- धित युक्ति दिखाते हैं-स्वरूप की-। कहलाता है प्रदीप आदि, किन्तु इन्द्रियादिकरण होते हैं अतः प्रतीति की उत्पत्ति में व्यञ्जक नहीं कहलाते ।