भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 532

४७२ सलोचन-ध्वन्यालोकः

ध्वन्यालोकः
अविवक्षितवाच्यस्तु ध्वनिर्गणवृत्तेः कथं भिद्यते । तस्य
प्रभेदद्वये गुणवृत्तिप्रभेदद्वयरूपता लक्ष्यत एव यतः । अयमपि
न दोषः । यस्मादविवक्षितवाच्यो ध्वनिर्गणवृत्तिमार्गाश्रयोऽपि
भवति न तु गुणवृत्तिरूप एव । गुणवृत्तिर्हि व्यञ्जकत्वशून्यापि
दृश्यते । व्यञ्जकत्वं च यथोक्तचारुत्वहेतुं व्यङ्ग्यं विना न
परन्तु अविवक्षितवाच्य ध्वनि गुणवृत्ति से भिन्न कैसे होगा, जब कि उसके दोनों
प्रभेदों में गुणवृत्ति के दो प्रभेदों की रूपता लक्षित ही होती है ! यह भी दोष नहीं
है, क्योंकि अविवक्षितवाच्यध्वनि गुणवृत्ति के मार्ग पर आश्रित भी होता है, न कि
गुणवृत्तिरूप ही होता है । क्योंकि गुणवृत्ति व्यञ्जकत्व से रहित भी देखी जाती है ।
और व्यञ्जकत्व यथोक्त चारुत्व के हेतु व्यङ्ग्य के बिना व्यवस्थित नहीं होता । परन्तु
लोचनम्
एवमभ्युपगमं प्रदर्श्यक्षेपं दर्शयति—अविवक्षितेति । तुशब्दः पूर्वस्माद्विशेषं
द्योतयति । तस्येति । अविवक्षितवाच्यस्य यत्प्रभेदद्वयं तस्मिन् गौणलाक्षणि-
कत्वात्मकं प्रकारद्वयं लक्ष्यते निर्भास्यत इत्यर्थः । एतत्परिहरति—अयमपीति ।
गुणवृत्तेर्यो मार्गः प्रभेदद्वयं स आश्रयो निमित्ततया प्राक्कक्ष्यानिवेशी यस्ये-
त्यर्थः । एतच्च पूर्वमेव निर्णीतम् । ताद्रूप्याभावे हेतुमाह—गुणवृत्तिरिति ।
गौणलाक्षणिकरूपोभयी अपीत्यर्थः । ननु व्यञ्जकत्वेन कथं शून्या गुणवृत्ति-
र्भवति, यतः पूर्वमेवोक्तम्—
मुख्यां वृत्तिं परित्यज्य गुणवृत्त्यार्थदर्शनम् ।
यदुद्दिश्य फलं तत्र शब्दो नैव स्खलद्गतिः ॥ इति ।
इस प्रकार अभ्युपगम को दिखा कर आक्षेप दिखाते हैं—अविवक्षित—। ‘परन्तु’
शब्द पहले से विशेष को प्रकट करता है । उसके—। अविवक्षित वाच्य के जो दो प्रभेद
हैं उनमें गौण और लाक्षणिक रूप दो प्रकार लक्षित होते हैं, अर्थात् निर्भासित होते हैं ।
( इसका परिहार करते हैं—यह भी—। गुणवृत्ति का जो मार्ग प्रभेदद्वय है वह आश्रय
अर्थात् निमित्त रूप से पहली कक्ष्या में रहने वाला है जिसका । इसे पहले ही निर्णय कर
चुके हैं । ताद्रूप्य के अभाव का हेतु कहते हैं—गुणवृत्ति—। अर्थात् गौण और
लाक्षणिक रूप दोनों भी । गुणवृत्ति व्यंजकत्व से शून्य कैसे हो सकती है ? क्योंकि पहले
ही कहा है—
‘जिस फल को उद्देश्य करके, मुख्य वृत्ति को छोड़ कर गुण वृत्ति द्वारा अर्थ
का ज्ञान कराते हैं उसमें शब्दस्खलद्गति ( अर्थात् बाधित अर्थ वाला ) नहीं है ।’
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