ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ४७३ ध्वन्यालोकः व्यवतिष्ठते। गुणवृत्तिस्तु वाच्यधर्माश्रयेणैव व्यङ्ग्यमात्राश्रयेण चाभे- दोपचाररूपा सम्भवति, यथा—तीक्ष्णत्वादग्निर्मााणवकः, आह्लाद- कत्वाच्चन्द्र एवास्या मुखमित्यादौ। यथा च 'प्रिये जने नास्ति पुन- रुक्तम्' इत्यादौ। यापि लक्षणरूप गुणवृत्तिः साप्युपलक्षणीयार्थसंब- न्धमात्राश्रयेण चारुरूपव्यङ्ग्यप्रतीतिं विनापि सम्भवत्येव, यथा— मञ्चाः क्रोशन्तीत्यादौ विषये। गुणवृत्ति वाच्यधर्म के आश्रय से ही और व्यङ्ग्यमात्र के आश्रय से अभेदोपचार रूप सम्भव होती है, जैसे 'तीक्ष्ण होने से माणवक अग्नि है'; आह्लादक होने से इस इसका मुख चन्द्र ही है' इत्यादि में। और जैसे 'प्रिय जन में पुनरुक्ति नहीं है' इत्यादि में। जो भी लक्षणारूप गुणवृत्ति है वह भी उपलक्षणीय अर्थ के साथ सम्बन्ध मात्र के आश्रय से चारुरूप व्यङ्ग्य की प्रतीति के बिना भी सम्भव होती है, जैसे—'मञ्च आक्रोश करते हैं' इत्यादि विषय में। लोचनम् न हि प्रयोजनशून्य उपचारः प्रयोजनांशनिवेशी च व्यञ्जनव्यापार इति भवद्भिरेवाभ्यधायीत्याशङ्क्याभिमतं व्यञ्जकत्वं विश्रान्तिस्थानरूपं तत्र नास्ती- त्याह-व्यञ्जकत्वं चेति। वाच्यधर्मेति। वाच्यविषयो यो धर्मोऽभिधाव्यापारस्त- स्याश्रयेण तदुद्बृंहणायेत्यर्थः। श्रुतार्थापत्ताविवार्थान्तरस्याभिधेयार्थोपपादन एव पर्यवसानादिति भावः। तत्र गौणस्योदाहरणमाह—यथेति। द्वितीयमपि प्रकारं व्यञ्जकत्वशून्यं निदर्शयितुमुपक्रमते—यापीति। चारुरूपं विश्रान्तिस्थानं, तदभावे स व्यञ्जकत्वव्यापारो नैवोन्मीलति, प्रत्यावृत्त्य वाच्य एव विश्रान्तेः, क्षणदृष्टनष्टदिव्यविभवप्राकृतपुरुषवत्। आप ही कह चुके हैं कि उपचार प्रयोजनशून्य नहीं होता और व्यंजन व्यापार प्रयोजन के अंश में रहता है, यह आशङ्का करके विश्रान्तिस्थान रूप अभिमत व्यंजकत्व वहाँ नहीं है—और व्यञ्जकत्व—। वाच्यधर्म—। अर्थात् वाच्यविषयक जो धर्म अभिधा व्यापार उसके आश्रय से उसके उपबृंहण के लिए। भाव यह कि क्योंकि श्रुतार्थापत्ति की भाँति अर्थान्तर का पर्यवसान अभिधेय अर्थ के उपपादन में ही होता है। उनमें, गौण का उदाहरण कहते हैं—जैसे—। व्यंजकत्वरहित दूसरे प्रकार को भी दिखाने के लिए उपक्रम करते हैं—जो भी—। चारु रूप अर्थात् विश्रान्ति का स्थान, उसके अभाव में वह व्यंजकत्व व्यापार उन्मीलित नहीं होता, क्योंकि लौट कर वाच्य में ही विश्रान्ति हो जाती है, उस दरिद्र पुरुष की भाँति जिसकी दिव्य सम्पत्ति क्षण में ही दिख जाने के बाद नष्ट हो जाती है।