भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 534

४७४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः यत्र तु सा चारुरूपव्यङ्ग्यप्रतीतिहेतुस्तत्रापि व्यञ्जकत्वानुप्रवेशे- नैव वाचकत्ववत् । असम्भविना चार्थेन यत्र व्यवहारः, यथा— ‘सुवर्णपुष्पां पृथिवीम्’ इत्यादौ तत्र चारुरूपव्यङ्ग्यप्रतीतिरेव प्रयोजि- केति तथाविधेऽपि विषये गुणवृत्तौ सत्यामपि ध्वनिव्यवहार एव परन्तु जहाँ वह (गुणवृत्ति) चारुरूप व्यङ्ग्य की प्रतीति का कारण है वहाँ भी वाचकत्व की भाँति व्यञ्जकत्व के अनुप्रवेश से ही और असम्भवी अर्थ के साथ जहाँ व्यवहार है, जैसे, ‘सुवर्णपुष्पां पृथिवीं’ इत्यादि में, वहाँ चारुरूप व्यङ्ग्य की प्रतीति ही प्रयोजिका है, इसलिए उस प्रकार के भी विषय में गुणवृत्ति के होने पर भी ध्वनिव्यवहार ही युक्ति के अनुकूल है। इसलिए अविवक्षित वाच्यध्वनि में लोचनम् ननु यत्र व्यङ्ग्येऽर्थे विश्रान्तिस्तत्र किं कर्तव्यमित्याशङ्क्याह—यत्र त्विति। अस्ति तत्रापरो व्यञ्जनव्यापारः परिस्फुट एवेत्यर्थः। दृष्टान्तं पराङ्गीकृतमेवाह— वाचकत्ववदिति। वाचकत्वे हि त्वयैवाङ्गीकृतो व्यञ्जनव्यापारः प्रथमं ध्वनिप्रभेद- मप्रत्याचक्षाणेनेति भावः। किञ्च वस्त्वन्तरे मुख्ये सम्भवति सम्भवदेव वस्त्व- न्तरं मुख्यमेवारोप्यते विषयान्तरमात्रतस्त्वारोपव्यवहार इति जीवितमुपचारस्य, सुवर्णपुष्पाणां तु मूलत एवासम्भवात्तदुच्चयनस्य तत्र क आरोपव्यवहारः, ‘सुव- र्णपुष्पां पृथिवीम्’ इति हि स्यादारोपः, तस्मादत्र व्यञ्जनव्यापार एव प्रधान- भूतो नारोपव्यवहारः, स परं व्यञ्जनव्यापारानुरोधितयोत्तिष्ठति। तदाह— असम्भविनेति। प्रयोजिकेति। व्यङ्ग्यमेव हि प्रयोजनरूपं प्रतीतिविश्रामस्थान- जहाँ व्यङ्ग्य अर्थ में विश्रान्ति हो जाती है वहाँ क्या करना चाहिए ? यह आशङ्का करके कहते हैं—परन्तु जहाँ—। अर्थात् वहाँ दूसरा व्यंजन व्यापार स्पष्ट ही है। दूसरे द्वारा अङ्गीकृत ही दृष्टान्त को कहते हैं—वाचकत्व की भाँति—। भाव यह कि वाचकत्व में प्रथम ध्वनि प्रभेद का प्रत्याख्यान न करते हुए तुमने ही व्यंजन व्यापार को स्वीकार कर लिया है। और भी, मुख्य सम्भव वस्त्वन्तर में सम्भव होता हुआ ही मुख्य वस्त्वन्तर आरोपित होता है, और आरोप का व्यवहार विषयान्तर होने के कारण होता है, यह उपचार (आरोप) का जीवित है, परन्तु सुवर्णपुष्प तो मूलतः ही सम्भव नहीं, फिर उनके चुनने का आरोप व्यवहार कैसा ? ‘सुवर्णपुष्पां पृथिवीं’ यह आरोप होगा, इस लिए व्यंजन व्यापार ही यहाँ प्रधानभूत है न कि आरोप व्यवहार। वह (आरोप व्यवहार) केवल व्यंजन व्यापार के अनुरोध से उठता है। उसे कहते हैं—असम्भवी—। प्रयोजिका—। प्रयोजन रूप व्यङ्ग्य ही प्रतीति का विश्रामस्थान