ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ४७५ ध्वन्यालोकः युक्त्यनुरोधी । तस्मादविवक्षितवाच्ये ध्वनौ द्वयोरपि प्रभेदयोर्व्यञ्ज- कत्वविशेषाविशिष्टा गुणवृत्तिर्न तु तदेकरूपा सहृदयहृदयाह्लादिनी प्रतीयमाना प्रतीतिहेतुत्वाद्धिषयान्तरे तद्रूपशून्याया दर्शनात् । एतच्च सर्वं प्राक्सूचितमपि स्फुटतरप्रतीतये पुनरुक्तम् । दोनों भेदों में भी समान व्यञ्जकत्व विशेष वाली गुणवृत्ति है, न कि उस (व्यञ्ज- कत्व) की प्रतीति का हेतु होने के कारण सहृदयों को आह्लादित करने वाली उस (व्यञ्जकत्व) के साथ एक रूप की होती है। क्योंकि दूसरे स्थल में उस (व्यञ्ज- कत्व) के रूप से शून्य देखी जाती है। ये सभी बातें पहले सूचित हो चुकी हैं तथापि स्पष्ट रूप से प्रतीत होने के लिए पुनः कही गई है। लोचनम् मारोपिते त्वसम्भवति प्रतीतिविश्रान्तिराशङ्कनीयापि न भवति । सत्यामपीति । व्यञ्जनव्यापारसम्पत्तये क्षणमात्रमवलम्बितायामिति भावः । तस्मादिति । व्यञ्जकत्वलक्षणो यो विशेषस्तेनाविशिष्टा अविद्यमानं विशिष्टं विशेषो भेदनं यस्याः व्यञ्जकत्वं न तस्या भेद इत्यर्थः । यदि वा व्यञ्जकत्वलक्षणेन व्यापार- विशेषेणाविशिष्टा न्यक्कृतस्वभावा आसमन्ताद्व्याप्ता । तदेकेति । तेन व्यञ्जक- त्वलक्षणेन सहैकं रूपं यस्याः सा तथाविधा न भवति । अविवक्षितवाच्ये व्यञ्जकत्वं गुणवृत्तेः पृथक्चारुप्रतीतिहेतुत्वात् विवक्षितवाच्यनिष्ठव्यञ्जकत्ववत् , न हि गुणवृत्तेश्चारुप्रतीतिहेतुत्वमस्तीति दर्शयति—विषयान्तर इति । अग्निर्बटु- रित्यादौ । प्रागिति प्रथमोद्योते । नियतस्वभावाच्च वाच्यवाचकत्वादौपाधिकत्वेनानियतं व्यञ्जकत्वं कथं न होता है, सम्भव न होते हुए आरोपित में प्रतीतिविश्रान्ति की आशङ्का भी नहीं की जा सकती । होने पर भी—। भाव यह कि व्यंजन व्यापार को सम्पन्न करने के लिए क्षण मात्र (गुणवृत्ति के) अवलम्बित होने पर भी इसलिए—। व्यंजकत्व रूप जो विशेष उससे अविशिष्ट अर्थात् जिसका विशिष्ट = विशेष = भेदन विद्यमान नहीं, अर्थात् व्यंजकत्व उस (गुणवृत्ति) का भेद (अवान्तर धर्म) नहीं। अथवा व्यंजकत्व रूप व्यापार विशेष से अविशिष्ट तिरस्कृत स्वभाव वाली, या आ समन्तात् व्याप्त। उस व्यंजकत्व रूप (व्यापार) के साथ एक रूप है जिसका, वह उस प्रकार की नहीं होगी। अविवक्षित वाच्य में व्यंजकत्व गुणवृत्ति के अलग से चारुप्रतीति का हेतु होने के कारण विवक्षित वाच्य में रहने वाले व्यंजकत्व की भाँति होता है, गुणवृत्ति चारु की प्रतीति का हेतु नहीं है यह दिखाते हैं—दूसरे स्थल में—। 'अग्निर्मााणवक:' इत्यादि में। पहले—। प्रथम उद्योत में। नियत स्वरूप वाच्य वाचक भाव से औपाधिक होने के कारण अनियत होने से