ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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ध्वन्यालोकः
अपि च व्यञ्जकत्वलक्षणो यः शब्दार्थयोर्धर्मः स प्रसिद्धसम्ब- न्धानुरोधीति न कस्यचिद्विमतिविषयतामर्हति । शब्दार्थयोर्हि प्रसिद्धो यः सम्बन्धो वाच्यवाचकभावाख्यस्तमनुरुन्धान एव व्यञ्जकत्वलक्षणो व्यापारः सामग्र्यन्तरसम्बन्धादौपाधिकः प्रवर्तते । अत एव वाचक- त्वात्तस्य विशेषः । वाचकत्वं हि शब्दविशेषस्य नियत आत्मा व्यु- त्पत्तिकालादारभ्य तदविनाभावेन तस्य प्रसिद्धत्वात् । स त्वनियत:, औपाधिकत्वात् । प्रकरणाद्यवच्छेदेन तस्य प्रतीतेरितरथा त्वप्रतीतेः । ननु यद्यनियतस्तत्किं तस्य स्वरूपपरीक्षया । नैष दोषः ; यतः शब्दात्मनि तस्यानियतत्वम् , न तु स्वे विषये व्यङ्ग्यलक्षणे । लिङ्ग-
और भी, व्यञ्जकत्व रूप जो शब्द और अर्थ का धर्म है वह प्रसिद्ध सम्बन्ध की अपेक्षा करता है इसमें किसी को विवाद नहीं । शब्द और अर्थ का प्रसिद्ध जो वाच्यवाचकभाव नामक सम्बन्ध है उसे अपेक्षा करता हुआ ही व्यञ्जकत्व रूप व्यापार दूसरी सामग्री के सम्बन्ध से औपाधिक रूप से प्रवृत्त होता है । इसी लिए वाचकत्व से उसका भेद है । वाचकत्व शब्दविशेष का नियत आत्मा है, क्योंकि व्युत्पत्तिकाल से लेकर वह उसके ( शब्द के ) अविनाभाव से प्रसिद्ध है । परन्तु वह ( व्यञ्जकत्व ) औपाधिक होने के कारण अनियत है । क्योंकि प्रकरण आदि के सहयोग से उसकी प्रतीति होती है, अन्यथा प्रतीति नहीं होती । ( शङ्का ) यदि अनियत है तो उसके स्वरूप की परीक्षा से क्या लाभ ? ( समाधान ) यह दोष नहीं है, क्योंकि शब्द रूप में वह अनियत है, न कि व्यङ्ग्य रूप अपने विषय में । और
लोचनम्
भिन्ननिमित्तमिति दर्शयति—अपि चेति । औपाधिक इति । व्यञ्जकत्ववैचित्र्यं यत्पूर्वमुक्तं तत्कृत इत्यर्थः । अत एव समयनियमितादभिधाव्यापाराद्विलक्षण इति यावत् । एतदेव स्फुटयति—अत एवेति । औपाधिकत्वं दर्शयति—प्रकर- णादीति । किं तस्येति । अनियतत्वाद्यथारुचि कल्प्येत पारमार्थिकं रूपं नास्तीति; न चावस्तुनः परीक्षोपपद्यत इति भावः । शब्दात्मनीति । सङ्केतास्पदे
व्यंजकत्व कैसे भिन्न निमित्त वाला नहीं है ? यह दिखाते हैं—और भी—। औपाधिक—। अर्थात् व्यंजकत्व का वैचित्र्य जो पहले कहा है तत्कृत ( औपाधिक ) । इसीलिए सङ्केत में नियमित अभिधा व्यापार से विलक्षण है । इसे ही स्पष्ट करते हैं—इसी लिए—। औपाधिकत्व को दिखाते हैं—प्रकरण आदि—। उसके स्वरूप की—। भाव यह कि अनियत होने के कारण जो चाहे कल्पित हो सकता है, ( उसका ) पारमार्थिक रूप नहीं है, और अवस्तु की परीक्षा उपपन्न नहीं । शब्द