भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 537, कुल 680 में से

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पृष्ठ 537

त्वन्यायश्चास्य व्यञ्जकभावस्य लक्ष्यते, यथा लिङ्गत्वमाश्रयेष्वनियता- वभासम्, इच्छाधीनत्वात् ; स्वविषयाव्यभिचारि च । तथैवेदं यथा दर्शितं व्यञ्जकत्वम् । शब्दात्मन्यनियतत्वादेव च तस्य वाचकत्वप्र- कारता न शक्या कल्पयितुम् । यदि हि वाचकत्वप्रकारता तस्य भवेत्तच्छब्दात्मनि नियततापि स्याद्वाचकत्ववत् । स च तथाविध औपाधिको धर्मः शब्दानामौत्पत्तिकशब्दार्थसम्बन्धवादिना वाक्यतत्त्व- विदा पौरुषापौरुषेयोर्वाक्ययोर्विशेषमभिदधता नियमेनाभ्युपगन्तव्यः, तदनभ्युपगमे हि तस्य शब्दार्थसम्बन्धनित्यत्वे सत्यप्यपौरुषेयपौरुषे- इस व्यञ्जकत्व का लिङ्गत्वसाम्य मालूम पड़ता है, जैसे लिङ्गत्व आश्रयों में अनियत रूप से मालूम पड़ता है, क्योंकि (वह) इच्छा के अधीन होता है और अपने विषय में अव्यभिचारी होता है । उसी प्रकार यह व्यञ्जकत्व है, जैसा कि दिखा चुके हैं । और शब्द रूप में अनियत होने के कारण ही उसे वाचकत्व का प्रकार नहीं बनाया जा सकता । यदि वह वाचकत्व का प्रकार होगा तो शब्द-रूप में नियतता भी वाचकत्व की भाँति होगी । और शब्द और अर्थ का औत्पत्तिक सम्बन्ध मानने वाले, पौरुषेय और अपौरुषेय वाक्यों का भेद कहने वाले वाक्यतत्त्ववेत्ता (मीमां- सक) को शब्दों का उस प्रकार का वह औपाधिक धर्म नियमतः स्वीकार-करना चाहिए, क्योंकि उसके स्वीकार न करने पर शब्द और अर्थ के सम्बन्ध के नित्य होने पर अपौरुषेय और पौरुषेय वाक्यों के अर्थ के प्रतिपादन में कोई भेद न होगा । लोचनम् पदस्वरूपमात्र इत्यर्थः । आश्रयेष्विति । न हि धूमे वह्निगमकत्वं सदातनम् , अन्यगमकत्वस्य वह्न्यगमकत्वस्य च दर्शनात् । इच्छाधीनत्वादिति । इच्छात्र पक्षधर्मत्वजिज्ञासाव्याप्तिसुस्मूर्षाप्रभृतिः । स्वविषयेति । स्वस्मिन्विषये च गृहीते त्रैरूप्यादौ न व्यभिचरति । न कस्यचिद्विमतिमेतीति यदुक्तं तत्स्फुट- यति—स चेति । व्यञ्जकत्वलक्षण इत्यर्थः । औत्पत्तिकेति । जन्मना द्वितीयो भावविकारः सत्तारूपः सामीप्याल्लक्ष्यते विपरीतलक्षणातो वानुत्पत्तिः, रूढ्या रूप—। अर्थात् सङ्केत के आस्पद पदस्वरूप मात्र । आश्रयों में—। धूम का वह्निबोधक भाव सदातन नहीं है, क्योंकि वह अन्य का बोधक और वह्नि का अबोधक भी देखा गया है क्योंकि इच्छा के अधीन होता है—। यहाँ इच्छा पक्षधर्मता (व्याप्य धूम की पक्ष पर्वत में स्थिति) की जिज्ञासा और व्याप्ति के स्मरण की इच्छा प्रभृति । अपने विषय के गृहीत होने पर त्रैरूप्य (पक्षसत्व, सपक्ष- सत्व और विपक्षासत्व) आदि में व्यभिचरित नहीं होता । ‘किसी को विवाद नहीं’ यह जो कहा है उसे स्पष्ट करते हैं—वह औपाधिक—। अर्थात् व्यंजकत्व रूप । औत्पत्तिक—। जन्म (उत्पत्ति) से दूसरा सत्तारूप भावविकार सामीप्य से लक्षित होता

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