ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४७८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः ययोर्वाक्ययोरर्थप्रतिपादने निर्विशेषत्वं स्यात्। तदभ्युपगमे तु पौरु- षेयाणांवाक्यानां पुरुषेच्छानुविधानसमारोपितौपाधिकव्यापारान्तराणां सत्यपि स्वाभिधेयसम्बन्धापरित्यागे मिथ्यार्थतापि भवेत्। दृश्यते हि भावानामनपरित्यक्तस्वस्वभावानामपि सामग्र्यन्तर- सम्पातसम्पादितौपाधिकव्यापारान्तराणां विरुद्धक्रियत्वम्। तथा हि- हिममयूखप्रभृतीनां निर्वापितसकलजीवलोकं शीतलत्वमुद्वहतामेव परन्तु उसके स्वीकार कर लेने पर पुरुष की इच्छा के अनुविधान से समारोपित औपाधिक व्यापारान्तर वाले पौरुषेय वाक्य अपने अभिधेय के सम्बन्ध का परित्याग होने पर भी मिथ्यार्थ भी होंगे। क्योंकि अन्य सामग्री के उपस्थित होने से सम्पादित औपाधिक व्यापारान्तर वाले, अपना स्वभाव न छोड़ने वाले भावों की भी विरुद्ध क्रिया देखी जाती है। जैसा कि समस्त जीवलोक का ताप दूर करने वाली ठंडक धारण करने वाले ही लोचनम् वा औत्पत्तिकशब्दो नित्यपर्यायः तेन नित्यं यः शब्दार्थयोः शक्तिलक्षणं संबन्धमिच्छति जैमिनेयस्तेनेत्यर्थः। निर्विशेषत्वमिति। ततश्च पुरुषदोषानुप्र- वेशस्याकिञ्चित्करत्वात्तन्निबन्धं पौरुषेयेषु वाक्येषु यदप्रामाण्यं तन्न सिद्ध्येत्। प्रतिपत्तुरेव हि यदि तथा प्रतिपत्तिस्तर्हि वाक्यस्य न कश्चिदपराध इति कथम- प्रामाण्यम्। अपौरुषेये वाक्येऽपि प्रतिपत्तृदौरात्म्यात्तथा स्यात्। ननु धर्मान्तराभ्युपगमेऽपि कथं मिथ्यार्थता, न हि प्रकाशकत्वलक्षणं स्वधर्मं जहाति शब्द इत्याशङ्क्याह—दृश्यत इति। प्राधान्येनेति। यदाह— है, अथवा विपरीत लक्षणा से ( औत्पत्तिक शब्द से ) 'अनुत्पत्ति' ( रूप अर्थ का ग्रहण होगा ), अथवा रूढ़ि से औत्पत्तिक शब्द नित्य का पर्याय ( माना जायगा— ), इसलिए जो नित्य शब्द-अर्थ का शक्ति रूप सम्बन्ध चाहता है उस जैमिनेय ( मीमांसक ) को । भेद ( निर्विशेषत्व )—। और उस कारण पुरुष के दोषों का अनुप्रवेश कुछ नहीं कर सकेगा, इसलिए पौरुषेय वाक्यों में तत्प्रयुक्त जो अप्रामाण्य है वह सिद्ध न होगा । यदि प्रतिपत्ता की ही उस प्रकार प्रतिपत्ति है तो वाक्य का कोई अपराध नहीं है, इसलिए अप्रामाण्य कैसे होगा ? ( यदि औपाधिक धर्म को स्वीकार नहीं करते हो तब ) अपौरु- षेय वाक्य में भी प्रतिपत्ता के दोष से उस प्रकार ( अयथार्थता की प्रतीति से अप्रा- माण्य ) होगा । धर्मान्तर को स्वीकार करने पर भी मिथ्यार्थता कैसे होगी, क्योंकि शब्द अपने प्रकाशकत्व रूप धर्म को नहीं छोड़ता है, यह आशङ्का करके कहते हैं—देखी जाती