भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 539

तृतीय उद्योतः ४७९ ध्वन्यालोकः प्रियाविरहदहनदह्यमानमानसैर्जनैरालोक्यमानानां सतां सन्तापकारित्वं प्रसिद्धमेव । तस्मात्पौरुषेयाणां वाक्यानां सत्यपि नैसर्गिकेऽर्थसम्बन्धे मिथ्यार्थत्वं समर्थयितुमिच्छता वाचकत्वव्यतिरिक्तं किञ्चिद्रूपमौपाधिकं व्यक्तमेवाभिधानीयम् । तच्च व्यञ्जकत्वादृते नान्यत् । व्यङ्ग्यप्रकाशनं हि व्यञ्जकत्वम् । पौरुषेयाणि च वाक्यानि प्राधान्येन पुरुषाभिप्राय- मेव प्रकाशयन्ति । स च व्यङ्ग्य एव न त्वभिधेयः, तेन सहाभिधान- स्य वाच्यवाचकभावलक्षणसम्बन्धाभावात् । नन्वेनेन न्यायेन सर्वेषा- मेव लौकिकानां वाक्यानां ध्वनिव्यवहारः प्रसक्तः । सर्वेषामप्यनेन न्यायेन व्यञ्जकत्वात् । सत्यमेतत्; किं तु वक्तृप्रायप्रकाशनेन यद्व्यञ्जकत्वं तत्सर्वेषामेव लौकिकानां वाक्यानामविशिष्टम् । तच्च चन्द्र प्रभृति प्रियतमा की विरहाग्नि से दह्यमान चित्त वाले लोगों को सन्तप्त करने वाले प्रसिद्ध ही हैं। इसलिए पौरुषेय वाक्यों का नैसर्गिक सम्बन्ध होने पर भी मिथ्यार्थता का समर्थन करना चाहते हुए ( मीमांसक ) को वाचकत्व से अतिरिक्त किञ्चिद्रूप औपाधिक स्पष्ट ही अभिधान करना चाहिए। और वह (औपाधिक) व्यञ्जकत्व के अतिरिक्त दूसरा कुछ नहीं। व्यङ्ग्य का प्रकाशन व्यञ्जकत्व है। और पौरुषेय वाक्य प्राधान्यतः पुरुष के अभिप्राय को ही प्रकाशित करते हैं। और वह (अभिप्राय) व्यङ्ग्य ही होता है, न कि अभिधेय, क्योंकि उसके साथ अभिधान का वाच्यवाचकभाव सम्बन्ध नहीं होता। (शङ्का) इस न्याय से सभी लौकिक वाक्यों में ध्वनि व्यवहार प्रसक्त होगा। क्योंकि इस न्याय से सभी व्यञ्जक हैं। (समाधान) यह ठीक है, किन्तु वक्ता के अभिप्राय के प्रकाशन से जो व्यञ्जकत्व है वह सभी लौकिक वाक्यों में अविशिष्ट है। परन्तु वह वाचकत्व से भिन्न नहीं है, लोचनम् ‘एवमयं पुरुषो वेदेति भवति प्रत्ययः न त्वेवमयमर्थ’ इति । तथा प्रमाणान्तर- दर्शनमत्र बाध्यते, न तु शाब्दोऽन्वय इत्यनेन पुरुषाभिप्रायस्यानुप्रवेशादेवाङ्गुल्य- ग्रवाक्यादौ मिथ्यार्थत्वमुक्तम् । तेन सहेति। अनियततया नैसर्गिकत्वाभावादिति है—। प्राधान्यतः—। क्योंकि कहा है—‘इस पुरुष ने इस प्रकार समझा’ यह प्रत्यय होता है, यह प्रत्यय नहीं होता कि यह अर्थ इस प्रकार है। इस प्रकार यहाँ प्रमा- णान्तर का दर्शन बाधित होता है न कि शाब्द अन्वय, इसलिए पुरुष के अभिप्राय के अनुप्रवेश के कारण ही ‘अङ्गुल्यग्रे करिवरशतम्’ इत्यादि वाक्य में मिथ्यार्थता कही गई है।—उसके साथ—। भाव यह कि अनियत होने से नैसर्गिकता के अभाव के