भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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४८० | सलोचन-ध्वन्यालोकः

ध्वन्यालोकः

वाचकत्वान्न भिद्यते व्यङ्ग्यं हि तत्र नान्तरीयकत्या व्यवस्थितम् । न तु विवक्षितत्वेन । यस्य तु विवक्षितत्वेन व्यङ्ग्यस्य स्थितिः तद्व्यञ्जकत्वं ध्वनिव्यवहारस्य प्रयोजकम् । यत्त्वभिप्रायविशेषरूपं व्यङ्ग्यं शब्दार्थाभ्यां प्रकाशते तद्भवति विवक्षितं तात्पर्येण प्रकाश्यमानं सत् । किन्तु तदेव केवलमपरिमितवि- षयस्य ध्वनिव्यवहारस्य न प्रयोजकमव्यापकत्वात् । तथा दर्शितभेद- त्रयरूपं तात्पर्येण द्योत्यमानमभिप्रायरूपमनभिप्रायरूपं च सर्वमेव व्यङ्ग्य वहाँ नान्तरीयक रूप से रहता है न कि विवक्षित रूप से । परन्तु जो व्यंग्य विवक्षित रूप से रहता है वह ध्वनि व्यवहार का प्रयोजक है । जो कि अभिप्राय विशेष रूप व्यङ्ग्य शब्द-अर्थ से प्रकाशित होता है वह तात्पर्ये से प्रकाश्यमान होकर विवक्षित होता है । किन्तु वही केवल अपरिमित विषय वाले ध्वनि व्यवहार का अव्यापक होने के कारण प्रयोजक नहीं होता है । इस प्रकार दिखाए जा चुके तीन भेदों वाला, तात्पर्ये से द्योत्यमान अभिप्रायरूप और अनभि-

लोचनम्

भावः । नान्तरीयकत्येति । गामानयेति श्रुतेऽप्यभिप्राये व्यक्ते तदभिप्रायविशि- ष्टोऽर्थ एवाभिप्रेतानयनादिक्रियायोग्यो न त्वभिप्रायमात्रेण किंचित्कृत्यमिति भावः । विवक्षितत्वेनेति । प्राधान्येनेत्यर्थः । यस्य त्विति । ध्वन्युदाहरणेष्विति भावः । काव्यवाक्येभ्यो हि न नयनानयनाद्युपयोगिनी प्रतीतिरभ्यर्थ्यते, अपि तु प्रतीतिविश्रान्तिकारिणी, सा चाभिप्रायनिष्ठैव नाभिप्रेतवस्तुपर्यवसाना । नन्वेवमभिप्रायस्यैव व्यङ्ग्यत्वातित्रिविधं व्यङ्ग्यमिति यदुक्तं तत्कथमित्याह- यत्त्विति । एवं मीमांसकानां नात्र विमतिर्युक्तेति प्रदर्श्य वैयाकरणानां नैवात्र कारण । नान्तरीयक रूप से-। भाव यह कि 'गाय को लाओ' यह सुनने पर अभिप्राय के व्यक्त होने पर भी उस अभिप्राय से विशिष्ट अर्थ ही अभिप्रेत आनयन आदि क्रिया के योग्य है, न कि अभिप्रायमात्र कुछ होगा । विवक्षित रूप से-। अर्थात् प्राधान्यतः । परन्तु जो-। भाव यह कि ध्वनि के उदाहरणों में । काव्य वाक्यों से नयन-आनयन आदि क्रियाओं के उपयोग की प्रतीति नहीं उपस्थापित होती है, बल्कि (उस) प्रतीति की विश्रान्तिकारिणी प्रतीति (उपस्थापित होती है) और वह (प्रतीति) अभि- प्राय में ही रहती है, न कि अभिप्रेत वस्तु (वाच्य अर्थ) में पर्यवसित होती है । इस प्रकार जब कि अभिप्राय ही व्यङ्ग्य होता है तो 'तीन प्रकार का व्यङ्ग्य होता है' यह जो कहा है वह कैसे ? यह कहते हैं-जोकि-। इस प्रकार यहाँ मीमांसकों की विमति ठीक नहीं यह दिखा कर यहाँ वह वैयाकरणों की (भी ठीक)