ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें: तृतीय उद्योतः ४८१
ध्वन्यालोकः ध्वनिव्यवहारस्य प्रयोजकमिति यथोक्तव्यञ्जकत्वविशेषे ध्वनिलक्षणे नातिव्याप्तिर्न चाव्याप्तिः । तस्माद्वाक्यतत्त्वविदां मतेन तावद्व्यञ्जक- त्वलक्षणः शाब्दो व्यापारो न विरोधी प्रत्युतानुगुण एव लक्ष्यते । परिनिश्चितनिरपभ्रंशशब्दब्रह्मणां विपश्चितां मतमाश्रित्यैव प्रवृत्तोऽयं ध्वनिव्यवहार इति तैः सह किं विरोधाविरोधौ चिन्त्येते । कृत्रिम- प्रायरूप सभी ध्वनिव्यवहार का प्रयोजक होता है, इस प्रकार यथोक्त व्यञ्जकत्व विशेषरूप ध्वनि के लक्षण में न अतिव्याप्ति है और न अव्याप्ति है । इसलिए वाक्य- तत्त्ववेत्ताओं (मीमांसकों) के मत से भी व्यञ्जकत्व रूप शाब्द व्यवहार विरोधी नहीं, बल्कि अनुकूल ही लक्षित होता है । निरपभ्रंश शब्दब्रह्म को परिनिश्चित करने वाले विद्वानों (वैयाकरणों) के मत के आधार पर ही यह ध्वनिव्यवहार प्रवृत्त हुआ है, इसलिए जिनके (उनके ?) साथ विरोध-अविरोध की चिन्ता क्यों की लोचनम् सास्तीति दर्शयति—परिनिश्चितेति । परितः निश्चितं प्रमाणेन स्थापितं निरप- भ्रंशं गलितभेदप्रपञ्चतया अविद्यासंस्काररहितं शब्दाख्यं प्रकाशपरामर्शस्वभावं ब्रह्म व्यापकत्वेन बृहद्विशेषशक्तिनिर्भरतया च बृंहितं विश्वनिर्माणशक्तीश्वर- त्वाच्च बृंहणम् यैरिति । एतदुक्तं भवति—वैयाकरणास्तावद्ब्रह्मपदेनात्यत्किंचिदिच्छन्ति तत्र का कथा वाचकत्वव्यञ्जकत्वयोः, अविद्यापदे तु तैरपि व्यापारान्तरमभ्युपगतमेव । एतच्च प्रथमोद्द्योते वितत्य निरूपितम् । एवं वाक्यविदां पदविदां चाविमति- विषयत्वं प्रदर्श्य माणतत्त्वविदां तार्किकाणामपि न युक्तात्र विमतिरिति दर्शयि- तुमाह—कृत्रिमेति । कृत्रिमः सङ्केतमात्रस्वभावः परिकल्पितः शब्दार्थयोः नहीं यह दिखाते हैं—परिनिश्चित—। जिन्होंने शब्दाख्य प्रकाशपरामर्शस्वभाव ब्रह्म— व्यापक होने के कारण और बृहत् एवं विशेष शक्ति से पूर्ण होने के कारण बृंहित तथा विश्व का निर्माण करने वाली शक्ति का ईश्वर होने के कारण बृंहण (परिपोष रूप)— को निरपभ्रंश अर्थात् भेद प्रपंच के गलित हो जाने से अविद्या के संस्कार से रहित परिनिश्चित अर्थात् प्रमाण से स्थापित किया है । बात यह कही गई—वैयाकरण लोग 'ब्रह्म' पद से कुछ दूसरा ही चाहते हैं, वहाँ वाचकत्व और व्यंजकत्व का प्रसंग ही नहीं, परन्तु उन्होंने भी अविद्या की स्थिति में व्यापारान्तर की स्वीकार किया ही है । इसे प्रथम उद्योत में विस्तार करके निरूपण कर चुके हैं। इस प्रकार वाक्यविदों (मीमांसकों) और पदविदों (वैयाकरणों) की अविमति का विषयत्व दिखा कर प्रमाणतत्त्वविद तार्किकों (नैयायिकों) की भी विमति यहां ठीक नहीं है यह दिखाने के लिए कहते हैं—कृत्रिम—। कृत्रिम अर्थात्
३१ ध्व०