भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 542, कुल 680 में से

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पृष्ठ 542

४८२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः शब्दार्थसम्बन्धवादिनां तु युक्तिविदामनुभवसिद्ध एवायं व्यञ्जकभावः शब्दानांमर्थान्तराणामिवाविरोधश्चेति न प्रतिक्षेप्यपदवीमवतरति । 'वाचकत्वे हि तार्किकाणां विप्रतिपत्तयः प्रवर्त्तन्ताम्, किमिदं स्वा- भाविकं शब्दानामाहोस्वित्सामयिकमित्याद्याः । व्यञ्जकत्वे तु तत्प्र- जाय ? शब्द और अर्थ के सम्बन्ध को कृत्रिम मानने वाले युक्तिवेत्ताओं (नैयायिकों) के मत में यह शब्दों का व्यञ्जकत्व अन्य अर्थों (के व्यञ्जकत्व) की भाँति सिद्ध एवं विरोधरहित है, अतः निराकरण के योग्य नहीं है । वाचकत्व के सम्बन्ध में तार्किकों की विप्रतिपत्तियां हो सकती हैं, क्या शब्दों का यह (वाचकत्व) स्वाभाविक है अथवा सङ्केतकृत (सामयिक) है इत्यादि । परन्तु लोचनम् सम्बन्ध इति ये वदन्ति नैयायिकसौगतादयः । यथोक्तम्—'न सामयिकत्वा- च्छब्दार्थप्रत्ययस्ये'ति । तथा शब्दाः संकेतितं प्राहुरिति । अर्थान्तराणामिति । दीपादीनाम् । नन्वनुभवेन द्विचन्द्राद्यपि सिद्धं तच्च विमतिपदमित्याशङ्क्याह— अविरोधश्चेति । अविद्यमानो विरोधो निरोधो बाधकात्मको द्वितीयेन ज्ञानेन यस्य तेनानुभवसिद्धश्चाबाधितश्चेत्यर्थः । अनुभवसिद्धं न प्रतिक्षेप्यं यथा वाच- कत्वम् । ननु तत्राप्येषां विमतिः । नैतत्; न हि वाचकत्वे सा विमतिः, अपि तु वाचकत्वस्य नैसर्गिकत्वकृत्रिमत्वादौ तदाह—वाचकत्वे हीति । नन्वेवं व्यञ्जक- त्वस्यापि धर्मान्तरमुखेन विप्रतिपत्तिविषयतापि स्यादित्याशङ्क्याह—व्यञ्जकत्वे सङ्केम मात्र स्वभाव का बनाया गया शब्द-अर्थ का सम्बन्ध है यह जो कहते हैं, नैयायिक, बौद्ध आदि । जैसे कहा है—'शब्द लिङ्ग द्वारा अर्थ का बोधक नहीं होता क्योंकि शब्द के अर्थ का बोध सामयिक (अर्थात् सङ्केतकृत) होता है । इस प्रकार शब्द संकेतित (अर्थ) को कहते हैं । अन्य अर्थों—। दीप आदि । द्विचन्द्र आदि भी अनुभव से सिद्ध है और उसमें विमति होगी, यह आशङ्का करके कहते हैं—विरोध रहित—। अर्थात् जिस (व्यंजकत्व) का द्वितीय ज्ञान का बाधकात्मक निरोध रूप विरोध विद्यमान नहीं, इसलिए (व्यंजकत्व) अनुभवसिद्ध और अबाधित है । अनुभव से सिद्ध को निराकरण नहीं किया जा सकता, जैसे वाचकत्व को । (शङ्का) उस (वाचकत्व के विषय) में भी इन (नैयायिकों) की विमति है । (समाधान) यह नहीं, वाचकत्व के विषय में वह विमति नहीं है, अपितु वाचकत्व के नैसर्गिकत्व और कृत्रिमत्व आदि के सम्बन्ध में है, उसे कहते हैं—वाचकत्व के सम्बन्ध में—। तब तो इस प्रकार धर्मान्तर (नैसर्गिकत्व आदि) के द्वारा व्यंजकत्व के विषय में भी विप्रतिपत्ति हो सकती है ! यह आशङ्का करके कहते हैं—व्यंजकत्व में—।