भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 543, कुल 680 में से

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पृष्ठ 543

तृतीय उद्योतः ४८३ ध्वन्यालोकः ष्ठभाविनि भावान्तरसाधारणे लोकप्रसिद्ध एवानुगम्यमाने को विम- तीनामवसरः । अलौकिके ह्यर्थे तार्किकाणां विमतयो निखिलाः प्रव- र्त्तन्ते न तु लौकिके । न हि नीलमधुरादिष्वशेषलोकेन्द्रियगोचरे बाधारहिते तत्त्वे परस्परं विप्रतिपन्ना दृश्यन्ते । न हि बाधारहितं नीलं नीलमिति ब्रुवन्नपरेण प्रतिषिध्यते नैतन्नीलं पीतमेतदिति । तथैव व्यञ्जकत्वं वाचकानां शब्दानामवाचकानां च गीतध्वनीनाम- शब्दरूपाणां च चेष्टादीनां यत्सर्वेषामनुभवसिद्धमेव तत्केनापह्नुयते । उसके (वाचकत्व के) बाद होने वाले, भावान्तर-साधारण, लोकप्रसिद्ध, अनुगम्य- मान व्यञ्जकत्व में विमतियों का अवसर ही कहां? क्योंकि तार्किकों की विमतियाँ अलौकिक पदार्थ में प्रवृत्त होती हैं न कि लौकिक में । नील, मधुर आदि अशेष लोगों की इन्द्रियों के गोचर बाधारहित तत्त्व में परस्पर विप्रतिपन्न नहीं देखे जाते । बाधा- रहित नील को 'नील' कहते हुए को 'यह पीत है नील नहीं' यह (कह कर) दूसरा कोई प्रतिषेध नहीं करता । उसी प्रकार वाचक शब्दों का, अवाचक गीत ध्वनियों का और अशब्दरूप चेष्टा आदि का जो व्यञ्जकत्व सभी का अनुभव सिद्ध है

लोचनम्

त्विति । भावान्तरेति । अक्षिनिकोचादेः साङ्केतिकत्वं चक्षुरादिकस्यानादिर्यो- ग्यतेति दृष्ट्वा काममस्तु संशयः शब्दास्याभिधेयप्रकाशने व्यञ्जकत्वं तु यादृ- शमेकरूपं भावान्तरेषु तादृगेव प्रकृतेऽपीति निश्चितैकरूपे कः संशयस्यावकाश इत्यर्थः । नैतन्नीलमिति नीले हि न विप्रतिपत्तिः, अपि तु प्राधानिकमिदं पारमा- णवमिदं ज्ञानमात्रमिदं तुच्छमिदमिति तत्सृष्टावलौकिक्य एव विप्रतिपत्तयः । वाचकानामिति । ध्वन्युदाहरणेष्विति भावः । अशब्दमिति । अभिधाव्यापारेणा- भावान्तर—। अर्थात् अक्षिनिकोच आदि का सांकेतिकत्व चक्षु आदि की अनादि योग्यता है यह देख कर शब्द के अभिधेय के प्रकाशन में चाहे जो संशय हो परन्तु व्यंजकत्व जिस प्रकार भावान्तरों में एकरूप है उस प्रकार ही प्रकृत में भी है इस प्रकार निश्चित एक रूप वाले (व्यंजकत्व) में संशय का अवकाश कहाँ ? 'यह नील नहीं है' यह विप्रतिपत्ति नील में नहीं, अपि तु उस (जगत्) की सृष्टि में अलौकिक में ही यह प्रधान (अर्थात् मूल प्रकृति) द्वारा रचित है, यह परमाणुओं द्वारा रचित है, यह ज्ञान मात्र है, यह तुच्छ (शून्य) है ये विप्रतिपत्तियाँ हैं । वाचक शब्दों का—। भाव यह कि ध्वनि के उदाहरणों में । शब्दरहित—। अर्थात् अभिधा व्यापार से