ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८४ सलोचन-ध्वन्यालोकः 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 ध्वन्यालोकः अशब्दमर्थं रमणीयं हि सूचयन्तो व्याहारास्तथा व्यापारा निबद्धा- श्चानिबद्धाश्च विदग्धपरिषत्सु विविधा विभाव्यन्ते । तानुपहास्यता- मात्मनः परिहरन् कोऽतिसन्दधीत सचेताः । ब्रूयात्, अस्त्यतिसन्धा- नावसरः व्यञ्जकत्वं शब्दानां गमकत्वं तच्च लिङ्गत्वमतश्च व्यङ्ग्य- प्रतीतिर्लिङ्गिप्रतीतिरेवेति लिङ्गलिङ्गिभाव एव तेषां व्यङ्ग्यव्यञ्जकभावो नापरः कश्चित् । अतश्चैतदवश्यमेव बोद्धव्यं यस्माद्वक्तुरभिप्रायापेक्षया व्यञ्जकत्वमिदानीमेव त्वया प्रतिपादितं वक्तुरभिप्रायश्चानुमेयरूप एव । उसे कौन छिपा सकता है ? विदग्ध जनों की सभाओं में शब्दरहित रमणीय अर्थ को सूचित करने वाले वचन तथा व्यापार विविध प्रकार के निबद्ध और अनिबद्ध रूप में मिलते हैं । अपनी उपहास्यता से बचता हुआ कौन सचेता उन्हें अतिसन्धान करेगा ? कोई कह सकता है, अतिसन्धान का है अवसर । शब्दों का गमकत्व ( बोधकत्व ) व्यञ्जकत्व है और वह लिङ्गत्व है, और इसलिए व्यङ्ग्य की प्रतीति लिङ्गी की प्रतीति ही है, इस प्रकार उनका ( शब्दों का ) लिङ्गलिङ्गिभाव ही है, दूसरा कोई व्यङ्ग्य-व्यञ्जकभाव नहीं । और यह अवश्य जान लेना चाहिए क्योंकि आपने अभी ही वक्ता के अभिप्राय की अपेक्षा से व्यञ्जकत्व का प्रतिपादन किया है और वक्ता का अभिप्राय अनुमेय रूप ही है । लोचनम् ऽस्पृष्टमित्यर्थः । रमणीयमिति । यद्गोप्यमानतयैव सुन्दरीभवतीत्यनेन ध्वन्यमा- नतायामसाधारणप्रतीतिलाभः प्रयोजनमुक्तम् । निबद्धाः प्रसिद्धाः । तानिति व्यवहारान् । कः सचेता अतिसन्दधीत नाद्रियेतेत्यर्थः । लक्षणे शत्रादेशः आत्मनः कर्मभूतस्य योपहसनीयता तस्याः परिहारेणोपलक्षितस्तां परिजिही- षुरित्यर्थः । अस्तीति । व्यञ्जकत्वं नापह्रूयते तच्चतिरिक्तं न भवति अपि तु लिङ्गलिङ्गिभाव एवायम् । इदानीमेवेति । जैमिनीयमतोपक्षेपे । अस्पृष्ट । रमणीय—। जो गोप्यमान रूप से ही सुन्दर होता है, इससे ( अर्थ की ) ध्वन्यमानता में असाधारण प्रतीति का लाभ इस प्रयोजन को कहा है । निबद्ध प्रसिद्ध । उन्हें व्यवहारों को । कौन सचेता अतिसन्धान करेगा, अर्थात् आदर नहीं करेगा । लक्षण में शतृ आदेश कर्मभूत आत्मा की अर्थात् अपनी जो उपहसनीयता है उसका परिहार उपलक्षित है, अर्थात् उस ( उपहसनीयता ) को छोड़ देना चाहने वाला । है ( अवसर )—। व्यंजकत्व को छिपाते नहीं, परन्तु वह अतिरिक्त नहीं अपितु यह लिङ्गलिङ्गि भाव ही है । अभी ही—। जैमिनीय मत के निराकरण के प्रसङ्ग में ।