भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 545, कुल 680 में से

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पृष्ठ 545

तृतीय उद्योतः ४८५ ध्वन्यालोकः अत्रोच्यते—नन्वेवमपि यदि नाम स्यात्तत्किं नश्छिन्नम् । वाच- कत्वगुणवृत्तिव्यतिरिक्तो व्यञ्जकत्वलक्षणः शब्दव्यापारोऽस्तीत्यस्मा- भिरभ्युपगतम् । तस्य चैवमपि न काचित् क्षतिः । तद्धि व्यञ्जकत्वं लिङ्गत्वमस्तु अन्यद्वा । सर्वथा प्रसिद्धशाब्दप्रकारविलक्षणत्वं शब्दव्या- पारविषयत्वं च तस्यास्तीति नास्त्येवावयोर्विवादः । न पुनरयं परमार्थो यद्व्यञ्जकत्वं लिङ्गत्वमेव सर्वत्र व्यङ्ग्यप्रतीतिश्च लिङ्गिप्रती- तिरेवेति । यहाँ कहते हैं—यदि इस प्रकार भी हो तो हमारा कुछ नहीं बिगड़ा है । वाच- कत्व और गुणवृत्ति से व्यतिरिक्त व्यञ्जकत्व रूप शब्द व्यापार है यह हमने स्वीकार किया है । उसकी इस प्रकार भी कोई हानि नहीं । वह व्यञ्जकत्व लिङ्गत्व हो अथवा और कुछ सर्वथा वह प्रसिद्ध शाब्द प्रकार से विलक्षण और शब्दव्यापार का विषय है, इस प्रकार हम दोनों में विवाद ही नहीं । फिर यह ( कोई ) परमार्थ नहीं कि व्यञ्जकत्व लिङ्गत्व ही है और सर्वत्र व्यङ्ग्य की प्रतीति लिङ्गी की प्रतीति ही है । लोचनम् यदि नाम स्यादिति । प्रौढवादितयाभ्युपगमेऽपि स्वपक्षस्तावन्न सिध्यतीति दर्शयति—शब्देति । शब्दस्य व्यापारः सन् विषयः शब्दव्यापारविषयः, अन्ये तु शब्दस्य यो व्यापारस्तस्य विषयो विशेष इत्याहुः । न पुनरिति । प्रदीपालो- कादौ लिङ्गलिङ्गिभावशून्योऽपि हि व्यङ्ग्यव्यञ्जकभावोऽस्तीति व्यङ्ग्यव्यञ्जकभा- वस्य लिङ्गलिङ्गिभावोऽव्यापक इति कथं तादात्म्यम् । विषय इति । शब्द उच्चरिते यावति प्रतिपत्तिस्तावन्विषय इत्युक्तः । तत्र शब्दप्रयुयुक्षा अर्थप्रतिपि- पादयिषा चेत्युभय्यपि विवक्षानुमेया तावत् । यस्तु प्रतिपादयिषायां कर्मभूतोऽ- र्थस्तत्र शब्दः करणत्वेन व्यवस्थितः न त्वसावनुमेयः, तद्विषया हि प्रति- यदि इस प्रकार भी हो—। प्रौढ़वादी बन कर स्वीकार करने पर भी ( पूर्व- पक्षी का ). अपना पक्ष सिद्ध नहीं होता, यह दिखाते हैं—शब्द—। शब्द का व्यापार होता हुआ विषय शब्दव्यापार का विषय है, परन्तु अन्य लोग 'शब्द का जो व्यापार उसका विषय अर्थात् विशेष' यह कहते हैं । फिर—। प्रदीप के आलोक आदि में लिङ्गलिङ्गिभाव से रहित भी व्यङ्ग्यव्यंजक भाव है, इस प्रकार व्यङ्ग्यव्यंजक भाव का लिङ्गलिङ्गिभाव अव्यापक है, इसलिए तादात्म्य ( अभेद ) कैसे होगा ? विषय—। शब्द के उच्चरित होने पर जितने अंश में ज्ञान होगा उतना विषय है यह कहा गया है । वहां शब्द के प्रयोग की इच्छा और अर्थ के प्रतिपादन की इच्छा ये दोनों विवक्षायें अनुमेय हैं । परन्तु जो प्रतिपादन की इच्छा में कर्मभूत अर्थ है उसमें शब्द करण रूप से व्यवस्थित है न कि वह अनुमेय है, क्योंकि उसके विषय की