ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः यदपि स्वपक्षसिद्धयेऽस्मदुक्तमनूदितं त्वया वक्त्रभिप्रायस्य व्यङ्ग्य- त्वेनाभ्युपगमात्तत्प्रकाशने शब्दानां लिङ्गत्वमेवेति तदेतद्यथास्माभिर- भिहितं तद्विभज्य प्रतिपाद्यते श्रूयताम्—द्विविधो विषयः शब्दानाम्— अनुमेयः प्रतिपाद्यश्च । तत्रानुमेयो विवक्षालक्षणः । विवक्षा च शब्द- स्वरूपप्रकाशनेच्छा शब्देनार्थप्रकाशनेच्छा चेति द्विप्रकारा । तत्राद्या न शाब्दव्यवहाराङ्गम् । सा हि प्राणित्वमात्रप्रतिपत्तिफला । द्वितीया तु शब्दविशेषावधारणावसितव्यवहितापि शब्दकरणव्यवहारनिबन्धनम् । ते तु द्वे अप्यनुमेयो विषयः शब्दानाम् । प्रतिपाद्यस्तु प्रयोक्तुरर्थप्रति- पादनसमीहाविषयीकृतोऽर्थः । स च द्विविधः—वाच्यो व्यङ्ग्यश्च । प्रयोक्ता हि कदाचित्स्वश- और जो कि अपने पक्ष की सिद्धि के लिए तुमने हमारे-कथन को अनूदित किया है कि वक्ता के अभिप्राय को व्यङ्ग्य रूप से स्वीकार करने के कारण उस (व्यङ्ग्य) के प्रकाशन में शब्द लिङ्ग ही होते हैं, तो इसे जैसा कि हमने कहा है उसे प्रतिपादन करते हैं, सुनो—शब्दों का विषय दो प्रकार का है अनुमेय और प्रतिपाद्य । उनमें अनुमेय विवक्षा रूप है । और दो प्रकार की है, शब्द के स्वरूप के प्रकाशन की इच्छा और शब्द से अर्थ के प्रकाशन की इच्छा । उनमें पहली शब्द व्यवहार का अङ्ग नहीं है । क्योंकि उसका फल प्राणित्व मात्र का ज्ञान है । परन्तु दूसरी शब्द विशेष के अवधारण से अवसित (समाप्त) एवं व्यवहित होकर भी शब्दकरणक व्यवहार का निबन्धन है । वे दोनों ही शब्दों का विषय अनुमेय हैं । प्रतिपाद्य तो प्रयोक्ता की अर्थप्रतिपादन की इच्छा से विषयीकृत अर्थ है । और वह दो प्रकार का है—वाच्य और व्यङ्ग्य । प्रयोक्ता कभी अपने शब्द से लोचनम् पिपादयिषैव केवलमनुमीयते । न च तत्र शब्दस्य करणत्वे यैव लिङ्ग- स्येतिकर्तव्यता पक्षधर्मत्वग्रहणादिका सास्ति, अपि त्वन्यैव संकेतस्फुर- णादिका तन्न तत्र शब्दो लिङ्गम् । इतिकर्तव्यता च द्विधा-एकयाभि- धाव्यापारं करोति द्वितीयया व्यञ्जना व्यापारम् । तदाह—तत्रेत्यादिना । प्रतिपादनेच्छा ही केवल अनुमेय होती है। शब्द के करणत्व में जो ही लिङ्ग की यक्षधर्मत्व ग्रहण आदि इतिकर्तव्यता (सहकारी कारण) है वह है, बल्कि अन्य ही सङ्केतस्फुरण आदि (इतिकर्तव्यता) है, इसलिए वहां शब्द लिङ्ग नहीं है। इति- कर्तव्यता दो प्रकार की है—(शब्द) एक से अभिधा व्यापार करता है, दूसरी से व्यंजना व्यापार । उसे कहते हैं—वहाँ इत्यादि द्वारा । किसी अपेक्षा से—। अर्थात्