भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 547, कुल 680 में से

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पृष्ठ 547

तृतीय उद्योतः ४८७ ध्वन्यालोकः ब्देनार्थं प्रकाशयितुं समीहते कदाचित्स्वशब्दानभिधेयत्वेन प्रयोजना- पेक्षया कयाचित् । स तु द्विविधोऽपि प्रतिपाद्यो विषयः शब्दानां न लिङ्गितया स्वरूपेण प्रकाशते, अपि तु कृत्रिमेणाकृत्रिमेण वा सम्बन्धा- न्तरेण । विवक्षाविषयत्वं हि तस्यार्थस्य शब्दैर्लिङ्गितया प्रतीयते न तु स्वरूपम् । यदि हि लिङ्गितया तत्र शब्दानां व्यापारः स्यात्तच्छब्दार्थे सम्यङ् मिथ्यात्वादि विवादा एव न प्रवर्तेरन् धूमादिलिङ्गानुमितानु- मेयान्तरवत् । व्यङ्ग्यश्चार्थो वाच्यसामर्थ्याक्षिप्ततया वाच्यवच्छब्दस्य सम्बन्धी भवत्येव । साक्षादसाक्षाद्भावो हि सम्बन्धस्याप्रयोजकः । वाच्यवाचकभावाश्रयत्वं च व्यञ्जकत्वस्य प्रागेव दर्शितम् । तस्माद्वक्तृ- भिप्रायरूप एव व्यङ्ग्ये लिङ्गतया शब्दानां व्यापारः । तद्विषयीकृते तु प्रतिपाद्यतया । प्रतीयमाने तस्मिन्नभिप्रायरूपेऽनभिप्रायरूपे च वाचकत्वे नैव व्यापारः सम्बन्धान्तरेण वा । न तावद्वाचकत्वेन यथोक्तं प्राक् । अर्थ का प्रतिपादन करना चाहता है, कभी प्रयोजन की किसी अपेक्षा से अपने शब्द के अनभिधेय रूप से । वह दोनों प्रकार का भी शब्दों का प्रतिपाद्य विषय लिङ्गी (अनु- मेय) रूप से स्वरूपतः प्रकाशित नहीं होता, अपि तु कृत्रिम अथवा अकृत्रिम सम्बन्धान्तर से । शब्दों से इस अर्थ का विवक्षाविषयत्व लिङ्गी (अनुमेय) रूप से प्रतीत होता है न कि (अर्थ का) स्वरूप नहीं (प्रतीत होता) । यदि वहाँ शब्दों का व्यापार लिङ्गी रूप से हो तो धूम आदि लिङ्ग से अनुमित अन्य अनुमेय की भाँति शब्द के अर्थ में 'सम्यक् है या मिथ्या है' ऐसे विवाद ही न हों और व्यङ्ग्य अर्थ वाच्य के सामर्थ्य से आक्षिप्त होने के कारण वाच्य की भाँति शब्द का सम्बन्धी होता ही है, क्योंकि साक्षात् और असाक्षाद् भाव सम्बन्ध का प्रयोजक नहीं है । और व्यञ्जकत्व का वाच्यवाचक भावाश्रयत्व पहले ही दिखाया जा चुका है । इसलिए वक्ता के अभिप्राय रूप ही व्यङ्ग्य में लिङ्ग रूप से शब्दों का व्यापार होता है और उसके द्वारा विषयीकृत (अर्थ) में प्रतिपाद्य रूप से । अभिप्राय रूप और अनभिप्राय रूप उस प्रतीयमान में वाचकत्व से ही व्यापार होगा अथवा सम्बन्धान्तर से ? वाचकत्व से तो नहीं होगा जैसा कि पहले कह चुके हैं । सम्बन्धान्तर से, व्यञ्जकत्व लोचनम् कयाचिदिति । गोपनकृतसौन्दर्यादिलाभाभिसन्धानादिकयेत्यर्थः । शब्दार्थ गोपनकृत सौन्दर्यादिलाभ के अभिसन्धान आदि अपेक्षा से । शब्द के अर्थ में—। भाव