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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

४५४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तस्मादभिधानाभिधेयप्रतीत्योरिव वाच्यव्यङ्ग्यप्रतीत्योर्निमित्तनि- मित्तिभावान्नियमभावी क्रमः । स तूक्तयुक्त्या क्वचिल्लक्ष्यते क्वचिन्न लक्ष्यते । तदेवं व्यञ्जकमुखेन ध्वनिप्रकारेषु निरूपितेषु कश्चिद् ब्रूयात्— किमिदं व्यञ्जकत्वं नाम व्यङ्ग्यार्थप्रकाशनम् , न हि व्यञ्जकत्वं इसलिए अभिधान और अभिधेय की प्रतीति की भांति ही वाच्य और व्यङ्ग्य की प्रतीति का निमित्तनैमित्तिभाव के कारण क्रम नियमभावी है । किन्तु वह उक्त युक्ति के अनुसार कहीं पर लक्षित होता है, कहीं पर नहीं लक्षित होता है । ( शङ्का ) तो इस प्रकार व्यञ्जक के द्वारा ध्वनि के प्रकारों का निरूपण होने पर यदि कोई कहे—क्या यह व्यञ्जकत्व व्यङ्ग्य अर्थ का प्रकाशन ( रूप ) है ? अर्थ का लोचनम् रूपाणां वृत्तीनां जीवितमुपनागरिकाद्यानां च सर्वस्यास्योभयस्यापि वृत्तिव्यव- हारस्य रसादिनियमितविषयत्वादिति यत्प्रस्तुतं तत्प्रसङ्गेन रसादीनां वाच्या- तिरिक्तत्वं समर्थयितुं क्रमो विचारित इत्येतदुपसंहरति—तस्मादिति । अभिधा- नस्य शब्दरूपस्य पूर्वं प्रतीतिस्ततोऽभिधेयस्य । यदाह तत्र भवान्— ‘विषयत्वमनापन्नैः शब्दैरर्थः प्रकाश्यते’ इत्यादि । अतोऽनिर्ज्ञातरूपत्वात्किमाहेत्यभिधीयते’ इत्यत्रापि चाविनाभाववत्सम- यस्याभ्यस्तत्वात्क्रमो न लक्ष्येतापि । उद्द्योतारम्भे यदुक्तं व्यञ्जनमुखेन ध्वनेः स्वरूपं प्रतिपाद्यत इति तदिदानी- मुपसंहरन्व्यञ्जकभावं प्रथमोद्द्योते समर्थितमपि शिष्याणामेकप्रघट्टकेन हृदि निवेशयितुं पूर्वपक्षमाह—तदेवमिति । कश्चिदिति । मीमांसकादिः । किमिदमिति । और उपनागरिका आदि वृत्तियों के जीवित हैं, क्योंकि यह समस्त वृत्तिव्यवहार का विषय रसादि से नियन्त्रित होता है, यह जो प्रस्तुत था उसके प्रसंग से रसादि का वाच्याति- रिक्तत्व समर्थन करने के लिए क्रम विचार किया है । अब इसे उपसंहार करते हैं— इसलिए। पहले शब्दरूप अभिधान की प्रतीति तब अभिधेय की । क्योंकि महानुभाव का कहते हैं— ‘स्वयं ज्ञात न हुए शब्दों से अर्थ प्रकाशित नहीं होता है’ इत्यादि । इसलिए रूप के ज्ञात न होने के कारण ‘क्या कहते हैं ?’ ‘यह कहते हैं’ यहाँ पर भी ( अर्थात् अभिधान और अभिधेय की प्रतीतियों में भी ) अविनाभाव की भाँति समय ( अर्थात् सङ्केत ) के अभ्यस्त होने के कारण क्रम लक्षित न भी होगा । उद्योत के आरम्भ में जो कहा है कि व्यञ्जक के द्वारा ध्वनि का स्वरूप प्रतिपादन करते हैं, उसका अब उपसंहार करते हुए व्यञ्जकत्व का प्रथम उद्योत में समर्थन हो जाने पर भी एक प्रकरण के द्वारा शिष्यों के हृदय में निविष्ट करने के लिए पूर्वपक्ष कहते हैं—

तृतीय उद्योतः ४५५

ध्वन्यालोकः
व्यङ्ग्यत्वं चार्थस्य व्यञ्जकसिद्ध्यधीनं व्यङ्ग्यत्वम्, व्यङ्ग्यापेक्षया च
व्यञ्जकत्वसिद्धिरित्यन्योन्यसंश्रयादव्यवस्थानम् । ननु वाच्यव्यति-
रिक्तस्य व्यङ्ग्यस्य सिद्धिः प्रागेव प्रतिपादिता तत्सिद्ध्यधीना च
व्यञ्जकसिद्धिरिति कः पर्यनुयोगावसरः । सत्यमेवैतत् ; प्रागुक्तयुक्ति-
भिर्वाच्यव्यतिरिक्तस्य वस्तुनः सिद्धिः कृता, स त्वर्थो व्यङ्ग्यतयैव
व्यञ्जकत्व और व्यङ्ग्यत्व इसलिए अव्यवस्थित है कि व्यङ्ग्यत्व की सिद्धि व्यञ्जक की
सिद्धि के अधीन है और व्यङ्ग्य की अपेक्षा से व्यञ्जकत्व की सिद्धि है यह अन्योन्या-
श्रय हो जाता है । ( समाधान ) वाच्य से व्यतिरिक्त व्यङ्ग्य की सिद्धि का प्रतिपादन
पहले ही कर चुके हैं, और उसके अधीन व्यञ्जक की सिद्धि है, फिर प्रश्न का अवसर
कैसा ? ( शङ्का ) यह ठीक ही है; पहले कही हुई युक्तियों द्वारा वाच्य से व्यतिरिक्त
वस्तु की सिद्धि की है, परन्तु उस अर्थ को व्यङ्ग्यरूप से ही क्यों व्यपदेश करते हैं ?
और जहां ( वह अर्थ ) प्राधान्यतः रहता है वहां उसे वाच्यरूप से ही व्यपदेश
लोचनम्
वक्ष्यमाणश्चोदकस्याभिप्रायः । प्रागेवेति । प्रथमोद्द्योते अभाववादनिराकरणे ।
अतश्च न व्यञ्जकसिद्ध्या तत्सिद्धियेनान्योन्याश्रयः शङ्क्येत, अपि तु हेत्वन्त-
रैस्तस्य साधितत्वादिति भावः । तदाह—तत्सिद्धीति । स त्विति । अस्त्वसौ
द्वितीयोऽर्थः, तस्य यदि व्यङ्ग्य इति नाम कृतम्, वाच्य इत्यपि कस्मान्न
क्रियते ? व्यङ्ग्य इति वा वाच्याभिमतस्यापि कस्मान्न क्रियते ? अवगम्य-
मानत्वेन हि शब्दार्थत्वं तदेव वाचकत्वम् । अभिधा हि यत्पर्यन्ता तत्रैवाभिधाय-
कत्वमुचितम्, तत्पर्यन्तता च प्रधानीभूते तस्मिन्नर्थ इति मूर्धाभिषिक्तं ध्वनेर्य-
तो इस प्रकार—। कोई—। मीमांसक आदि । क्या यह—। अर्थात् चोद्यवादी (दोषद्रष्टा)
का वक्ष्यमाण अभिप्राय । पहले ही—। प्रथम उद्योत में अभाववाद के निराकरण के
प्रसङ्ग में । भाव यह कि इसलिए व्यञ्जक की सिद्धि से उसकी सिद्धि नहीं होती है,
जिससे अन्योन्याश्रय की शङ्का की जाय, बल्कि अन्य हेतुओं से वह सिद्ध किया जाता
है । इसलिए कहते हैं—उसकी सिद्धि—। परन्तु उस—। माना कि वह दूसरा अर्थ है,
यदि उसका 'व्यङ्ग्य' नाम देते हैं तो 'वाच्य' भी नाम क्यों नहीं करते? अथवा वाच्य रूप
से अभिमत का भी 'व्यङ्ग्य' क्यों नहीं ( नाम ) करते है ? शब्द के द्वारा जो अवगम्य-
मानत्व है वही वाचकत्व है । जहाँ तक अभिधा है वहीं अभिधायकत्व उचित है और
उस ( अभिधा ) की पर्यन्तता प्रधानीभूत उस अर्थ में है, इस प्रकार जो ध्वनि का
मूर्धाभिषिक्त रूप निरूपण किया गया है, उसमें ही अभिधा व्यापार को होना ठीक है ।

कस्माद्व्यपदिश्यते यत्र च प्राधान्येनानवस्थानं तत्र वाच्यतयैवासौ व्यपदेष्टुं युक्तः, तत्परत्वाद्वाक्यस्य । अतश्च तत्प्रकाशिनो वाक्यस्य वाचकत्वमेव व्यापारः । किं तस्य व्यापारान्तरकल्पनया ? तस्मा- त्तात्पर्यविषयो योऽर्थः स तावन्मुख्यतया वाच्यः । या त्वन्तरा तथाविधे विषये वाच्यान्तरप्रतीतिः सा तत्प्रतीतेरुपायमात्रं पदार्थप्रती- तिरिव वाक्यार्थप्रतीतेः । करना ठीक है, क्योंकि वाक्य का तात्पर्य उसी में है । और इसलिए उस ( अर्थ ) के प्रकाशक वाक्य का वाचकत्व ही व्यापार है । उसके अन्य व्यापार की कल्पना से क्या लाभ ? इसलिए जो अर्थ तात्पर्य का विषय है वह मुख्यरूप से वाच्य है । किन्तु जो उस प्रकार के विषय में बीच में वाच्यान्तर की प्रतीति है वह उस उस प्रतीति का वाक्यार्थप्रतीति का पदार्थप्रतीति की भांति उपायमात्र है ।

द्रूपं निरूपितं तत्रैवाभिधाव्यापारेण भवितुं युक्तम् । तदाह—यत्र चेति । तत्प्रकाशिन इति । तद्व्यङ्ग्याभिमतं प्रकाशयत्यवश्यं यद्वाक्यं तस्येति । उपायमात्रमित्यनेन साधारण्योक्त्या भाट्टं प्राभाकरं वैयाकरणं च पूर्वपक्षं सूचयति । भाट्टमते हि— वाक्यार्थमितये तेषां प्रवृत्तौ नान्तरीयकम् । पाके ज्वालेव काष्ठानां पदार्थप्रतिपादनम् ॥ इति शब्दावगतैः पदार्थैस्तात्पर्येण योऽर्थ उत्थाप्यते स एव वाक्यार्थः, स एव च वाच्य इति । प्राभाकरदर्शनेऽपि दीर्घदीर्घो व्यापारो निमित्तिनि वाक्यार्थे, पदार्थानां तु निमित्तभावः पारमार्थिक एव । वैयाकरणानां तु सोऽपारमार्थिक इसलिए कहते हैं—और जहाँ— । उसके प्रकाशक— । उस व्यङ्ग्य रूप अभिमत को जो वाक्य अवश्य प्रकाशिक करता है उसका । ‘उपाय मात्र’ इस साधारण कथन से भाट्ट, प्राभाकर और वैयाकरण पूर्वपक्ष को सूचित करते हैं । क्योंकि भाट्टमत में वाक्यार्थ के ज्ञान के लिए उन ( पदों ) की प्रवृत्ति में पदार्थ का प्रतिपादन पाक कार्य में काष्ठों की ज्वाला की भाँति नान्तरीयक ( उपाय मात्र ) है । इसलिए शब्दों से अवगत पदार्थों द्वारा तात्पर्य रूप से जो अर्थ उठाया जाता है वही वाक्यार्थ है और वही वाच्य है । प्राभाकरदर्शन में भी दीर्घदीर्घ व्यापार नैमित्तिक कार्यरूप-वाक्यार्थ में ( होता है ), किन्तु पदार्थों का निमित्तभाव पारमार्थिक ही होता है । ( वैयाकरणों की दृष्टि में ) वह अपारमार्थिक है यह विशेष है । इसे हमने प्रथम

तृतीय उद्योतः ४५७ ध्वन्यालोकः अत्रोच्यते—यत्र शब्दः स्वार्थमभिदधानोऽर्थान्तरमवगमयति तत्र यत्तस्य स्वार्थाभिधायित्वं यच्च तदर्थान्तरावगमहेतुत्वं तयोरविशेषो विशेषो वा। न तावदविशेषः; यस्मात्तौ द्वौ व्यापारौ भिन्नविषयौ भिन्नरूपौ च प्रतीयेते एव। तथाहि वाचकत्वलक्षणो व्यापारः शब्दस्य स्वार्थविषयः गमकत्वलक्षणस्त्वर्थान्तरविषयः । न च स्वपरव्यवहारो वाच्यव्यङ्ग्ययोरपह्रोतुं शक्यः, एकस्य सम्बन्धित्वेन प्रतीतेरपरस्य सम्बन्धिसम्बन्धित्वेन । वाच्यो ह्यर्थः साक्षाच्छब्दस्य यहां कहते हैं—जहां शब्द अपने अर्थ का अभिधान करता हुआ अर्थान्तर का अवगमन कराता है वहां जो उसका उसका स्वार्थाभिधायित्व और जो उसके अर्थान्तर का अवगमहेतुत्व है उन दोनों में अविशेष है अथवा विशेष ? अविशेष तो नहीं है, क्योंकि वे दोनों व्यापार भिन्न विषय और भिन्नरूप प्रतीत होते ही हैं। जैसा कि शब्द का वाचकत्वरूप व्यापार अपने अर्थ को विषय करता है, किन्तु गमकत्वरूप (व्यापार) अर्थान्तर को विषय करता है। वाच्य और व्यङ्ग्य के स्व-पर व्यवहार का अपह्नव नहीं किया जा सकता, क्योंकि एक सम्बन्धीरूप से प्रतीत होता है दूसरा सम्बन्धी के सम्बन्धी रूप से। वाच्य अर्थ शब्द का साक्षात् सम्बन्धी है, किन्तु लोचनम् इति विशेषः । एतच्चास्माभिः प्रथमोद्द्योत एव वितत्य निर्णीतमिति न पुनरा- यस्यते ग्रन्थयोजनैव तु क्रियते। तदेतन्मतत्रयं पूर्वपक्षे योज्यम्। अत्रेति पूर्वपक्षे । उच्यत इति सिद्धान्तः । वाचकत्वं गमकत्वं चेति स्वरूपतो भेदः स्वार्थेऽर्थान्तरे च क्रमेणेति विषयतः । ननु तस्माच्चेदसौ गम्यते- ऽर्थः कथं तर्ह्युच्यतेऽर्थान्तरमिति । नो चेत्स तस्य न कश्चिदिति को विषयर्थ इत्याशङ्क्याह-न चेति । न स्यादिति । एवकारो भिन्नक्रमः, नैव स्यादित्यर्थः । यावता न साक्षात्सम्बन्धित्वं तेन युक्त एवार्थान्तरव्यवहार इति विषयभेद उद्योत में ही विस्तार करके निर्णय किया है, इसलिए पुनः श्रम नहीं करते, किन्तु ग्रन्थ की योजना है कर देते हैं। इन तीनों मतों को पूर्वपक्ष में लगाना चाहिए। यहां अर्थात् पूर्वपक्ष में। कहते हैं सिद्धान्त। वाचकत्व और गमकत्व यह स्वरूपतः भेद है और क्रम से स्वार्थ में और अर्थान्तर में विषयतः (भेद) है। यदि उस (शब्द) से वह अर्थ (व्यङ्ग्य अर्थ) अवगत होता है तो क्यों अर्थान्तर कहते हैं? यदि नहीं, तो उसका (वह) कोई नहीं, फिर 'विषय' का अर्थ क्या? यह आशङ्का करके कहते हैं—स्व-पर व्यवहार—। नहीं होगा—। 'ही' भिन्नक्रम है, अर्थात् नहीं ही होगा। जिस कारण साक्षात् सम्बन्धित्व नहीं है उस कारण अर्थान्तर व्यवहार ठीक ही

४५८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः सम्बन्धी तदितरस्त्वभिधेयसामर्थ्याक्षिप्तः सम्बन्धिसम्बन्धी । यदि च स्वसम्बन्धित्वं साक्षात्तस्य स्यात्तदार्थान्तरत्वव्यवहार एव न स्यात् । तस्माद्विषयभेदस्तावत्तयोर्व्यापारयोः सुप्रसिद्धः । रूपभेदोऽपि प्रसिद्ध एव । न हि यैवाभिधानशक्तिः सैवावगमनशक्तिः । अवाचकस्यापि गीतशब्दादे रसादिलक्षणार्थावगमदर्शनात् । अशब्दस्यापि चेष्टादेरर्थ- विशेषप्रकाशनप्रसिद्धेः । तथाहि 'व्रीडायोगान्नतवदना' इत्यादिश्लोके चेष्टाविशेषः सुकविनार्थप्रकाशनहेतुः प्रदर्शित एव । तस्माद्भिन्नविषय- उससे इतर (व्यङ्ग्य अर्थ) अभिधेय की सामर्थ्य से आक्षिप्त होकर सम्बन्धी का सम्बन्धी है । यदि वह शब्द का साक्षात् सम्बन्धी होगा तब (उसमें) अर्थान्तरत्व का व्यवहार ही नहीं होगा । इसलिए उन दोनों व्यापारों का विषयभेद सुप्रसिद्ध है । रूपभेद भी प्रसिद्ध ही है, क्योंकि जो ही अभिधानशक्ति है वही अवगमनशक्ति नहीं है । क्योंकि अवाचक भी गीत शब्द आदि से रसादिरूप अर्थ का अवगम देखा जाता है अशब्द भी चेष्टा आदि से अर्थविशेष के प्रकाशन की प्रसिद्धि है । जैसा कि 'व्रीडा- योगान्नतवदना' इत्यादि श्लोक में सुकवि ने अर्थ प्रकाशन के हेतु चेष्टाविशेष को दिखाया ही है । इसलिए भिन्न विषय और भिन्नरूप होने के कारण शब्द का जो लोचनम् उक्तः । ननु भिन्नेऽपि विषये अक्षशब्दादेर्बह्वर्थस्य एक एवाभिधालक्षणो व्यापार इत्याशङ्क्य रूपभेदमुपपादयति—रूपभेदोऽपीति । प्रसिद्धमेव दर्शयति— न हीति । विप्रतिपन्नं प्रति हेतुमाह—अवाचकस्यापीति । यदेव वाचकत्वं तदेव- गमकत्वं यदि स्यादावाचकस्य गमकत्वमपि न स्यात्, गमकत्वे नैव वाचकत्व- मपि न स्यात् । न चैतदुभयमपि गीतशब्दे शब्दव्यतिरिक्ते चाधोवक्त्रत्वकु- चकम्पनबाष्पावेशादौ तस्यावाचकस्याप्यवगमकारित्वदर्शनादवगमकारिणोऽ- प्यवाचकत्वेन प्रसिद्धत्वादिति तात्पर्यम् । एतदुपसंहरति—तस्माद्विन्नेति । है, इसलिए विषयभेद कहा है । विषय भिन्न होने पर भी बह्वर्थ 'अक्ष' आदि शब्दों का एक ही अभिधारूप व्यापार होगा, यह आशङ्का करके रूपभेद का उपपादन करते हैं— रूपभेद भी—। प्रसिद्धि को ही दिखाते हैं—नहीं—। विप्रतिपन्न के प्रति हेतु कहते हैं—अवाचक का—। तात्पर्य यह कि यदि जो ही वाचकत्व है वही गमकत्व है तो अवाचक का भी गमकत्व न होगा, गमकत्व न होने पर वाचकत्व भी नहीं ही होगा । यह दोनों भी (वाचकत्व और गमकत्व) गीत शब्द में और शब्दव्यतिरिक्त नीच मुख होना, कुचकम्पन, बाष्पावेश आदि में नहीं हैं, क्योंकि वह अवाचक (गीत शब्द भी) अवगमकारी देखा जाता है और अवगमकारी भी अवाचक रूप से प्रसिद्ध होता है । इसका उपसंहार करते हैं—इसलिए भिन्न—। नहीं—। वाच्य अभिधा

तृतीय उद्योतः ४५९ ध्वन्यालोकः त्वाद्भिन्नरूपत्वाच्च स्वार्थाभिधायित्वमर्थान्तरावगमहेतुत्वं च शब्दस्य यत्तयोः स्पष्ट एव भेदः । विशेषश्चेन्न तर्हीदानीमवगमनस्याभिधेयसा- मर्थ्याक्षिप्तस्यार्थान्तरस्य वाच्यत्वव्यपदेश्यता । शब्दव्यापारगोचरत्वं तु तस्यास्माभिरिष्यत एव, तत्तु व्यङ्ग्यत्वेनैव न वाच्यत्वेन । प्रसिद्धा- भिधानान्तरसम्बन्धयोग्यत्वेन च तस्यार्थान्तरस्य प्रतीतेः शब्दान्त- रेण स्वार्थाभिधायिना यद्विषयीकरणं तत्र प्रकाशनोक्तिरेव युक्ता । स्वार्थाभिधायित्व और अर्थान्तरावगमहेतुत्व है, उन दोनों का भेद स्पष्ट ही है। यदि भेद है तो फिर अब अवगमनरूप, अभिधेय की सामर्थ्य से आक्षिप्त अर्थान्तर को वाच्य नहीं कहा जा सकता । परन्तु वह शब्द व्यापार का गोचर है यह हम तो स्वीकार करते ही हैं, किन्तु उसे व्यङ्ग्यरूप से हां, न कि वाच्यरूप से । और प्रसिद्ध अभिधान से अतिरिक्त सम्बन्ध के योग्य रूप से उस अर्थान्तर की प्रतीति का जो स्वार्थ का अभिधान करने वाले शब्दान्तर के द्वारा विषयीकरण है वहां 'प्रकाशन' यह कथन ही ठीक है । लोचनम् न तर्हीति । वाच्यत्वं ह्यभिधाव्यापारविषयता न तु व्यापारमात्रविषयता, तथात्वे तु सिद्धसाधनमित्येतदाह—शब्दव्यापारेति । ननु गीतादौ मा भूद्वाचकत्वमिह त्वर्थान्तरेऽपि शब्दस्य वाचकत्वमेवोच्य- ते, किं हि तद्वाचकत्वं सङ्कोच्यत इत्याशङ्क्याह—प्रसिद्धेति । शब्दान्तरेण तस्या- र्थान्तरस्य यद्विषयीकरणं तत्र प्रकाशनोक्तिरेव युक्ता न वाचकत्वोक्तिः शब्दस्य, नापि वाच्यत्वोक्तिरर्थस्य तत्र युक्ता, वाचकत्वं हि समयवशादव्यवधानेन प्रति- पादकत्वं, यथा तस्यैव शब्दस्य स्वार्थे; तदाह-स्वार्थाभिधायिनेति । वाच्यत्वं हि समयबलेन निर्व्यवधानं प्रतिपाद्यत्वं यथा तस्यैवार्थस्य शब्दान्तरं प्रति- व्यापार का विषय होता है, न कि व्यापारमात्र का विषय होता है, ऐसा होने पर तो सिद्धसाधन होगा, यह कहते हैं—शब्द व्यापार—। गीत आदि में वाचकत्व मत हो, परन्तु यहाँ अर्थान्तर में भी शब्द का वाचकत्व ही कहा जायगा, उसके वाचकत्व को सङ्कुचित क्यों करते हैं ? यह आशङ्का करके कहते हैं—और प्रसिद्ध—। शब्दान्तर द्वारा उस अर्थान्तरे का जो विषयीकरण है वहां 'प्रकाशन' कथन ही ठीक हो न कि शब्द का 'वाचकत्व' कथन । और अर्थ का वहां वाच्यत्व कथन भी ठीक नहीं, क्योंकि समय ( सङ्केत ) के द्वारा बिना किसी व्यवधान के प्रतिपादकत्व 'वाचकत्व' है, जैसे उसी शब्द का अपने अर्थ में, उसे कहते हैं—स्वार्थ का अभिधान करने वाले—। समय ( सङ्केत ) के बल से बिना किसी व्यवधान के

४६० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः न च पदार्थवाक्यार्थन्यायो वाच्यव्यङ्ग्ययोः । यतः पदार्थप्रती- तिरसत्यैवेति कैश्चिद्विद्वद्भिःस्थितम् । यैरप्यसत्यत्वमस्या नाभ्युपेयते तैर्वाक्यार्थपदार्थयोर्घटतदुपादानकारणन्यायोऽभ्युपगन्तव्यः । यथा हि घटे निष्पन्ने तदुपादानकारणानां न पृथगुपलम्भस्तथैव वाक्ये तदर्थे वा प्रतीते पदतदर्थानां तेषां तदा विभक्ततयोपलम्भे वाक्यार्थबुद्धिरेव वाच्य और व्यङ्ग्य में पदार्थ और वाक्यार्थ का न्याय नहीं चलेगा, क्योंकि कुछ विद्वानों का निश्चय है कि पदार्थ की प्रतीति असत्य ही है । जो इसे असत्य नहीं स्वीकार करते उन्हें पदार्थ और वाक्यार्थ में घट और उसके उपादानकारणों का न्याय स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि जैसे घट के निष्पन्न होने पर उसके उपादान कारणों का अलग से उपलम्भ नहीं होता, उसी प्रकार वाक्य अथवा उसके अर्थ के प्रतीत होने पर पदों का अथवा उनके अर्थों का तब अलग से उपलम्भ होने पर वाक्यार्थ- लोचनम् तदाह—प्रसिद्धेति । प्रसिद्धेन वाचकतयाभिधानान्तरेण यः सम्बन्धो वाच्यत्वं तदेव तत्र वा यद्योग्यत्वं तेनोपलक्षितस्य । न चैवविधं वाचकत्वमर्थं प्रति शब्द- स्येहास्ति, नापि तं शब्दं प्रति तस्यार्थस्योक्तरूपं वाच्यत्वम् । यदि नास्ति तर्हि कथं तस्य विषयीकरणमुक्तमित्याशङ्कयाह-प्रतीतेरिति । अथ च प्रतीयते सोऽर्थो न च वाच्यवाचकत्वव्यापारेणेति विलक्षण एवासौ व्यापार इति यावत् । नन्वेवं मा भूद्वाचकशक्तिस्तथापि तात्पर्यशक्तिर्भविष्यतीत्याशङ्कयाह—न चेति । कैश्चिदिति वैयाकरणैः । यैरपीति भट्टप्रभृतिभिः । तमेव न्यायँ व्याचष्टे- यथाहीति । तदुपादानकारणानामिति । समवायिकारणानि कपालानि अनयो- क्त्या निरूपितानि । सौगतकापिलमते तु यद्यप्युपादातव्यघटकाले उपादाना- प्रतिपाद्यत्व वाच्यत्व है, उसी अर्थ का शब्दान्तर के प्रति, उसे कहते हैं—प्रसिद्ध—। वाचक रूप से प्रसिद्ध अभिधानान्तर के साथ जो सम्बन्ध वाच्यत्व है वही अथवा वहां जो योग्यत्व है उससे उपलक्षित । इस प्रकार का वाचकत्व अर्थ के प्रति शब्द का यहां नहीं है और उस शब्द के प्रति उस उक्तरूप अर्थ का वाच्यत्व भी नहीं है । यदि नहीं है, तो कैसे उसका विषयीकरण कहा है, यह आशङ्का करके कहते हैं—प्रतीति का—। वह अर्थ प्रतीत होता है, न कि वाच्यवाचकत्व व्यापार द्वारा ( प्रतीत होता है ), इस- लिए वह व्यापार विलक्षण ही है । इस प्रकार वाचक शक्तिमत हे, तथापि तात्पर्य शक्ति होगी, यह आशङ्का करके कहते हैं—वाच्य और—। कुछ अर्थात् वैयाकरण लोग । जो भट्ट प्रभृति । उसी न्याय की व्याख्या करते हैं—क्योंकि जैसे—। उसके उपादानकारणों का—। इस कथन से समवायी कारण कपाल निरूपित होते हैं । परन्तु बौद्ध और साङ्ख्य के मत में यद्यपि

तृतीय उद्योतः ४६१ ध्वन्यालोकः दूरीभवेत्। न त्वेष वाच्यव्यङ्ग्ययोर्न्यायः, न हि व्यङ्ग्ये प्रतीयमाने वाच्यबुद्धिर्दूरीभवति, वाच्यावभासाविनाभावेन तस्य प्रकाशनात्। तस्माद् घटप्रदीपन्यायस्तयोः, यथैव हि प्रदीपद्वारेण घटप्रतीतावुत्पन्ना- यां न प्रदीपप्रकाशो निवर्तते तद्वद्व्यङ्ग्यप्रतीतौ वाच्यावभासः। यत्तु बुद्धि ही दूर हो जायगी। परन्तु यह न्याय वाच्य और व्यङ्ग्य में नहीं है, क्योंकि व्यङ्ग्य के प्रतीयमान होने पर वाच्य की बुद्धि दूर नहीं होती, उसका प्रकाशन वाच्य के साथ अविनाभाव से होता है। इसलिए उन दोनों में घट और प्रदीप का न्याय है, क्योंकि जैसे ही कि प्रदीप के द्वारा घट की प्रतीति उत्पन्न होने पर प्रदीप का प्रकाश निवृत्त नहीं होता उसी प्रकार व्यङ्ग्य की प्रतीति में वाच्य का अवभास। जो लोचनम् नां न सत्ता एकत्र क्षणक्षयित्वेन परत्र तिरोभूतत्वेन तथापि पृथक्तया नास्त्यु- पलम्भ इतीत्यंशे दृष्टान्तः। दूरीभवेदिति। अर्थैकत्वस्याभावादिति भावः। एवं पदार्थवाक्यार्थन्यायं तात्पर्यशक्तिसाधकं प्रकृते विषये निराकृत्याभिमतां प्रका- शशक्तिं साधयितुं तदुचितं प्रदीपघटन्यायं प्रकृते योजयन्नाह—तस्मादिति। यतोऽसौ पदार्थवाक्यार्थन्यायो नेह युक्तस्तस्मात्, प्रकृतं न्यायं व्याकरणपूर्वकं दार्ष्टान्तिके योजयति—यथैव हीति। ननु पूर्वमुक्तम्— यथा पदार्थद्वारेण वाक्यार्थः सम्प्रतीयते। वाक्यार्थपूर्विका तद्वत्प्रतिपत्तस्य वस्तुनः॥ इति तत्कथं स एव न्याय इह यत्नेन निराकृत इत्याशङ्क्याह-यत्त्विति। उपादातव्य घट के काल में उपादानों की सत्ता एक में (बौद्ध मत में) क्षण भर स्थायी होने के कारण और दूसरे में (सांख्य मत में) तिरोभूत होने के कारण नहीं होती तथापि अलग से उपलब्ध नहीं है इस अंश में दृष्टान्त है। दूर हो जायगी—। भाव यह कि एक अर्थ के न होने के कारण। इस प्रकार तात्पर्य शक्ति के साधक पदार्थ वाक्यार्थ न्याय को प्रकृत विषय में निराकरण करके अभिमत प्रकाश शक्ति को सिद्ध करने के लिए उसके उचित प्रदीप-घट न्याय को प्रकृत में लगाते हुए कहते हैं— इसलिए—। जिस लिए वह पदार्थ-वाक्यार्थ न्याय यहीं ठीक नहीं है, इसलिए, प्रकृत न्याय को विवरणपूर्वक दार्ष्टान्तिक में लगाते हैं—जैसे ही कि—। पहले कहा है— 'जैसे पदार्थ के द्वारा वाक्यार्थ प्रतीत होता है उसी प्रकार उस (व्यङ्ग्यरूप) वस्तु की प्रतिपत्ति वाक्यार्थ की प्रतीतिपूर्वक होती है।' तो कैसे उस न्याय को यहां यत्न से निराकरण किया है? यह आशङ्का करके

४६२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः प्रथमोद्द्योते 'यथा पदार्थद्वारेण' इत्याद्युक्तं तदुपायत्वमात्रात्साम्य- विवक्षया । नन्वेवं युगपदर्थद्वययोगित्वं वाक्यस्य प्राप्तं तद्भावे च तस्य वा- क्यतैव विघटते, तस्या ऐकार्थ्यलक्षणत्वात्; नैष दोषः; गुणप्रधानभा- वेन तयोर्व्यवस्थानात् । व्यङ्ग्यस्य हि क्वचित्प्राधान्यं वाच्यस्योपस- र्जनभावः क्वचिद्वाच्यस्य प्राधान्यमपरस्य गुणभावः । तत्र व्यङ्ग्यप्रा- धान्ये ध्वनिरित्युक्तमेव; वाच्यप्राधान्ये तु प्रकारान्तरं निर्देक्ष्यते । कि 'प्रथम उद्योत' में 'यथा पदार्थद्वारेण' इत्यादि कहा है वह उपायमात्र के अंश में साम्य की विवक्षा से । तब तो इस प्रकार एक काल में वाक्य दो अर्थों से युक्त होगा, ऐसा होने पर उसकी वाक्यता ही विघटित होगी, क्योंकि 'एकार्थत्व उसका लक्षण है' ! ( उत्तर ) यह दोष नहीं; क्योंकि उन दोनों का गुण-प्रधानरूप से व्यवस्थान है । कहीं पर व्यङ्ग्य का प्राधान्य है, वाच्य का उपसर्जनभाव और कहीं पर वाच्य का प्राधान्य है, अपर का गुणभाव । उनमें, व्यङ्ग्य के प्राधान्य में ध्वनि है यह कहा जा चुका है, किन्तु वाच्य के प्राधान्य में प्रकारान्तर का निर्देश करेंगे । इसलिए यह निश्चित लोचनम् तदिति । न तु सर्वथा साम्येनेत्यर्थः । एवमिति । प्रदीपघटवद्युगपदुभयाव- भासप्रकारेणेत्यर्थः । तस्या इति वाक्यतायाः । ऐकार्थ्यलक्षणमर्थैकत्वाद्ध वाक्यमेकमित्युक्तम् । सकृत् श्रुतो हि शब्दो यत्रैव समयस्मृतिं करोति स चेदने- नैवावगमितः तद्विरम्यव्यापाराभावात्समयस्मरणानां बहूनां युगपद्योगात्कोऽ- र्थभेदस्यावसरः । पुनः श्रुतस्तु स्मृतो वापि नासाविति भावः । तयोरिति वाच्य- व्यङ्ग्ययोः । तत्रेति । उभयोः प्रकारयोर्मध्याद्यदा प्रथमः प्रकार इत्यर्थः । प्रका- रान्तरमिति । गुणीभूतव्यङ्ग्यसञ्ज्ञितम् । व्यङ्ग्यत्वमेवेति प्रकाश्यत्वमेवेत्यर्थः । कहते हैं—जो कि—। वह—। अर्थात् न कि सर्वथा साम्यपूर्वक । इस प्रकार—। अर्थात् प्रदीप-घट की भांति एक काल में दोनों के अवभास के प्रकार से । उसका वाक्यता का । 'अर्थ एक होने से एकार्थत्व रूप एक वाक्य होता है' यह कहा है । भाव यह कि एक बार श्रुत शब्द जहां पर हो समय (सङ्केत) की स्मृति करता है वह यदि इसी से (एक बार श्रुत शब्द ही से) विदित हो गया तो विरत होने पर व्यापार नहीं होता इसलिए बहुत से सङ्केत के स्मरणों एक समय में न होने के कारण अर्थभेद का अवसर ही कहां ? वह (शब्द) फिर से न श्रुत है अथवा न स्मृत है । उन दोनों का वाच्य और व्यङ्ग्य का । उनमें—। अर्थात् दोनों प्रकारों के बीच से जब प्रथम प्रकार होगा । प्रकारान्तर—। गुणीभूतव्यङ्ग्यसंज्ञक । व्यङ्ग्यत्व ही अर्थात् प्रकाश्यत्व ही ।

तृतीय उद्योतः ४६३ ध्वन्यालोकः तस्मात्-स्थितमेतत् — व्यङ्ग्यपरत्वेऽपि काव्यस्य न व्यङ्ग्यस्याभिधे- यत्वमपि तु व्यङ्ग्यत्वमेव । किं च व्यङ्ग्यस्य प्राधान्येनाविवक्षायां वाच्यत्वं तावद्भवद्भिर्ना- भ्युपगन्तव्यमतत्परत्वाच्छब्दस्य । तदस्ति तावद्व्यङ्ग्यः शब्दानां कश्चि- द्विषय इति । यत्रापि तस्य प्राधान्यं तत्रापि किमिति तस्य स्वरूपम- पह्नूयते । एवं तावद्वाचकत्वादन्यदेव व्यञ्जकत्वम्; इतश्च वाचकत्वा- व्यञ्जकत्वस्यान्यत्वं यद्वाचकत्वं शब्दैकाश्रयमितरत्तु शब्दाश्रयमर्थाश्रयं च शब्दार्थयोर्द्वयोरपि व्यञ्जकत्वस्य प्रतिपादितत्वात् । हुआ—काव्य का व्यङ्ग्य में तात्पर्य होने पर भी व्यङ्ग्य का अभिधेयत्व नहीं, अपितु व्यङ्ग्यत्व ही है । और भी, प्राधान्य से व्यङ्ग्य की विवक्षा न होने पर शब्द के तत्पर न होने के कारण आप वाच्यत्व को नहीं मानेंगे । इसलिए शब्दों का कोई विषय व्यङ्ग्य है । जहां भी उसका प्राधान्य है वहां उसके स्वरूप का अपह्नव क्यों करते हैं ? इस प्रकार व्यञ्जकत्व वाचकत्व से अन्य ही है । और इस कारण भी व्यञ्जकत्व वाचकत्व से अन्य है कि वाचकत्व एकमात्र शब्द के आश्रित है, परन्तु दूसरा शब्द के और अर्थ के आश्रित है, क्योंकि शब्द और अर्थ दोनों के भी व्यञ्जकत्व का प्रतिपादन कर चुके हैं । लोचनम् ननु यत्परः शब्दः स शब्दार्थ इति व्यङ्ग्यस्य प्राधान्ये वाच्यत्वमेव न्याय्यम्, तर्ह्यप्राधान्ये किं युक्तं व्यङ्ग्यत्वमिति चेत्सिद्धो नः पक्षः, एतदाह— किञ्चेति । ननु प्राधान्ये मा भूद्व्यङ्ग्यत्वमित्याशङ्कयाह—यत्रापीति । अर्थान्त- रत्वं सम्बन्धिसम्बन्धित्वमनुपयुक्तसमयत्वमिति व्यङ्ग्यतायां निबन्धनं, तच्च प्राधान्येऽपि विद्यत इति स्वरूपमहेयमेवेति भावः । एतदुपसंहरति—एवमिति । विषयभेदेन स्वरूपभेदेन चेत्यर्थः । तावदिति वक्तव्यान्तरमासूत्रयति । तदे- चाह—इतश्चेति । अनेन सामग्रीभेदात्कारणभेदोऽप्यस्तीति दर्शयति । एतच्च 'शब्द जिसमें तात्पर्य रखता हो वह शब्दार्थ है' इसके अनुसार व्यङ्ग्य के प्राधान्य में वाच्यत्व ही उचित है, तो अप्राधान्य में क्या व्यङ्ग्यत्व ठीक है ? तब तो हमारा पक्ष सिद्ध हो गया, इसे कहते हैं—और भी—। प्राधान्य में व्यङ्ग्यत्व मत हो, यह आशङ्का करके कहते हैं—जहां भी—। अर्थान्तर होना, सम्बन्धी का सम्बन्धी होना, अनुपयुक्त समय ( सङ्केत ) का होना, यह व्यङ्ग्य होने में कारण हैं, और यह प्राधान्य में भी विद्यमान हैं, इस प्रकार स्वरूप अत्याज्य ही है, यह भाव है । इसका उपसंहार करते हैं—इस प्रकार—। अर्थात् विषयभेद से और स्वरूपभेद से । दूसरा वक्तव्य प्रस्तुत करते हैं। उसे ही कहते हैं—और इस कारण भी—। 'सामग्रीभेद से कारणभेद

४६४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः गुणवृत्तिस्तूपचारेण लक्षणया चोभयाश्रयापि भवति । किन्तु ततोऽपि व्यञ्जकत्वं स्वरूपतो विषयतश्च भिद्यते । रूपभेदस्तावदयम्- यदमुख्यतया व्यापारो गुणवृत्तिः प्रसिद्धा । व्यञ्जकत्वं तु मुख्यतयैव शब्दस्य व्यापारः । न ह्यर्थाद्व्यङ्ग्यत्रयप्रतीतिर्या तस्या अमुख्यत्वं मनागपि लक्ष्यते । अयं चान्यः स्वरूपभेदः—यदगुणवृत्तिरमुख्यत्वेन व्यवस्थितं वाच- कत्वमेवोच्यते । व्यञ्जकत्वं तु वाचकत्वादत्यन्तं विविक्तमेव । एतच्च गुणवृत्ति तो उपचार और लक्षणा से शब्द और अर्थ दोनों के भी आश्रित होती है । किन्तु उससे भी व्यञ्जकत्व स्वरूप से और विषय से भिन्न हो जाता है । रूपभेद यह है कि गुणवृत्ति अमुख्यरूप से व्यापार प्रसिद्ध है, परन्तु व्यञ्जकत्व मुख्यरूप से ही शब्द का व्यापार है । अर्थ से तीनों व्यङ्ग्यों की जो प्रतीति है उसका अमुख्यत्व थोड़ा भी नहीं दिखाई देता । और यह दूसरा स्वरूप भेद है कि अमुख्यरूप से व्यवस्थित वाचकत्व को ही गुणवृत्ति कहते हैं । परन्तु व्यञ्जकत्व अत्यन्त विभिन्न ही है । इसे प्रतिपादन कर चुके लोचनम् वितत्य ध्वनिलक्षणे 'यत्रार्थः शब्दो वा' इति वाग्रहणं 'व्यङ्क्तः' इति द्विवचनं च व्याचक्षाणैरस्माभिः प्रथमोद्द्योत एव दर्शितमिति पुनर्न विस्तार्यते । एवं विषयभेदात्स्वरूपभेदात्कारणभेदाच्च वाचकत्वान्मुख्यात्प्रकाशक- त्वस्य भेदं प्रतिपाद्योभयाश्रयत्वाविशेषात्तर्हि व्यञ्जकत्वगौणत्वयोः को भेद इत्याशङ्क्यामुख्यादपि प्रतिपादयितुमाह—गुणवृत्तिरिति । उभयाश्रयापीति शब्दार्थाश्रया । उपचारलक्षणयोः प्रथमोद्द्योत एव विभज्य निर्णीतं स्वरूपमिति न पुनर्लिख्यते । मुख्यतयैवेति । अस्खलद्गतित्वेनेत्यर्थः । भी है' यह इससे दिखाते हैं । इसे विस्तार करके 'ध्वनि' लक्षण में 'यत्रार्थः शब्दो वा' यहां 'वा' ग्रहण और 'व्यङ्क्तः' इसमें द्विवचन का व्याख्यान करते हुए हमने प्रथम उद्योत में ही दिखा दिया है इसलिए फिर विस्तार नहीं करते हैं । इस प्रकार विषयभेद, स्वरूपभेद और कारणभेद द्वारा मुख्य वाचकत्व से प्रकाश- कत्व के भेद का प्रतिपादन करके ( शब्द और अर्थ रूप ) उभय के आश्रित होने के अविशेष होने से, व्यञ्जकत्व और गौणत्व का क्या भेद है ? यह आशङ्का करके अमुख्य से भी ( भेद ) प्रतिपादनार्थ कहते हैं—गुणवृत्ति— । उभय के आश्रित अर्थात् शब्द और अर्थ के आश्रित । उपचार और लक्षणा का स्वरूप प्रथम उद्योत में ही निर्णीत हो चुका है इसलिए फिर नहीं लिखते हैं । मुख्यरूप से ही— । अर्थात् अस्खलद्गतिरूप से ही ।

तृतीय उद्योतः ४६५ ध्वन्यालोकः प्रतिपादितम् । अयं चापरो रूपभेदो यद्गुणवृत्तौ यदार्थोऽर्थान्तरमुपल- क्षयति तदोपलक्षणीयार्थात्मना परिणत एवासौ सम्पद्यते । यथा 'गङ्गा- यां घोषः' इत्यादौ । व्यञ्जकत्वमार्गे तु यदार्थोऽर्थान्तरं द्योतयति तदा स्वरूपं प्रकाशयन्नेवासावन्यस्य प्रकाशकः प्रतीयते प्रदीपवत् । यथा— 'लीलाकमलपत्राणि गणयामास पार्वती' इत्यादौ । यदि च यत्राति- रस्कृतस्वप्रतीतिरर्थोऽर्थान्तरं लक्षयति तत्र लक्षणाव्यवहारः क्रियते, त- देवं सति लक्षणैव मुख्यः शब्दव्यापार इति प्राप्तम् । यस्मात्प्रायेण वाक्यानां वाच्यव्यतिरिक्ततात्पर्यविषयार्थावभासित्वम् । हैं। और यह अन्य रूपभेद है कि जब गुणवृत्ति में अर्थ अर्थान्तर का उपलक्षित करता है तब उपलक्षणीय अर्थ के रूप से परिणत ही वह होता है। जैसे—'गङ्गायां घोषः' इत्यादि में। परन्तु व्यञ्जकत्व मार्ग में जब अर्थ अर्थान्तर को द्योतित करता है तब प्रदीप की भांति स्वरूप को प्रकाशित करता हुआ ही वह अन्य का प्रकाशक प्रतीत होता है। जैसे—पार्वती लीलाकमल के पत्ते गिनने लग गई' इत्यादि में। और यदि जहां अर्थ अपनी प्रतीति को तिरस्कृत करता हुआ अर्थान्तर को लक्षित करता है वहां लक्षणाव्यवहार किया जाता है, तो इस प्रकार होने पर लक्षणा ही मुख्य शब्द का व्यापार है, यह प्राप्त होता है। जिस कारण प्रायः करके वाक्य वाच्य से व्यतिरिक्त तात्पर्य विषयक अर्थ के अवभासक होते हैं। लोचनम् प्रतिपादितमिति । इदानीमेव । परिणत इति । स्वेन रूपेणानिर्भासमान इत्यर्थः । कीदृश इति मुख्यो वा न वा प्रकारान्तराभावात् । मुख्यत्वे वाचकत्वम- न्यथा गुणवृत्तिः, गुणो निमित्तं सादृश्यादि तद्द्वारिका वृत्तिः शब्दस्य व्यापारो गुणवृत्तिरिति भावः । मुख्य एवासौ व्यापारः सामग्रीभेदाच्च वाचकत्वाद्व्यति- रिच्यत इत्यभिप्रायेणाह--उच्यत इति । एवमस्खलद्गतित्वात् कथञ्चिदपि तीनों व्यङ्ग्य—। वस्तु, अलङ्कार और रस रूप । प्रतिपादन कर चुके हैं—अभी ही । परिणत—। अर्थात् अपने रूप से प्रतीत न होता हुआ । किस प्रकार का मुख्य अथवा नहीं ( अर्थात् अमुख्य ), क्योंकि तीसरा प्रकार नहीं है । मुख्य होने पर वाचकत्व ( व्यापार ) होगा, अन्यथा गुणवृत्ति ( व्यापार ) होगी । भाव यह कि गुण अर्थात् सादृश्य आदि निमित्त, उसके द्वारा वृत्ति अर्थात् शब्द का व्यापार 'गुणवृत्ति' है। वह व्यापार है मुख्य ही है और सामग्री के भेद से वाचकत्व से अलग हो जाता है, इस अभिप्राय से कहते हैं—कहते हैं—। इस प्रकार स्खलद्गति न ३० ध्व०

४६६ सलोचन-ध्वन्यालोकः

ध्वन्यालोकः

ननु त्वत्पक्षेऽपि यदार्थो व्यङ्ग्यत्रयं प्रकाशयति तदा शब्दस्य कीदृशो व्यापारः। उच्यते—प्रकरणाद्यवच्छिन्नशब्दवशेनैवार्थस्य तथा- विधं व्यञ्जकत्वमिति शब्दस्य तत्रोपयोगः कथमपह्नूयते । विषयभेदोऽ- पि गुणवृत्तिव्यञ्जकत्वयोः स्पष्ट एव । यतो व्यञ्जकत्वस्य रसादयोऽल- ङ्कारविशेषा व्यङ्ग्यरूपावच्छिन्नं वस्तु चेति त्रयं विषयः । तत्र रसादि- प्रतीतिर्गुणवृत्तिरिति न केनचिदुच्यते न च शक्यते वक्तुम् । व्यङ्ग्या- लङ्कारप्रतीतिरपि तथैव । वस्तुचारुत्वप्रतीतये स्वशब्दानभिधेयत्वेन

तुम्हारे पक्ष में भी जब अर्थ तीनों व्यङ्ग्यों को प्रकाशित करता है तब शब्द का व्यापार किस प्रकार का होता है ? कहते हैं—प्रकरण आदि से सहकृत शब्द के वश से ही अर्थ का उस प्रकार का व्यञ्जकत्व है, इसलिए शब्द का वहां उपयोग कैसे छिपाया जा सकता है ! गुणवृत्ति और व्यञ्जकत्व में विषयभेद भी स्पष्ट ही है, क्योंकि रसादि, अलङ्कारविशेष और व्यङ्ग्यरूप से अवच्छिन्न वस्तु ये तीनों व्यञ्जकत्व के विषय हैं । उनमें, रसादि की प्रतीति को गुणवृत्ति नहीं कहता और न कह सकता है । व्यङ्ग्य अलङ्कार की प्रतीति भी उसी प्रकार है । वस्तु के चारुत्व की प्रतीति के

लोचनम्

समयानुपयोगात्पृथगाभासमानत्वाच्चेति त्रिभिः प्रकारैः प्रकाशकत्वस्यैत- द्विपरीतरूपत्रयायाश्च गुणवृत्तेः स्वरूपभेदं व्याख्याय विषयभेदमप्याह-विषयभेदो- ऽपीति । वस्तुमात्रं गुणवृत्तेरपि विषय इत्यभिप्रायेण विशेषयति-व्यङ्ग्यरूपाव- च्छिन्नमिति । व्यञ्जकत्वस्य यो विषयः स गुणवृत्तेर्न विषयः अन्यश्च तस्या विषयभेदो योज्यः । तत्र प्रथमं प्रकारमाह—तत्रेति । न च शक्यत इति । लक्षणासामग्र्यास्तत्राविद्यमानत्वादिति हि पूर्वमेवोक्तम् । तथैवेति । न तत्र गुणवृत्तिर्युक्तेत्यर्थः । वस्तुनो यत्पूर्वं विशेषणं कृतं तद्व्याचष्टे—चारुत्वप्रतीतय

होने के कारण, किसी प्रकार समय ( सङ्केत ) के उपयोग न होने के कारण और पृथक् आभासमान होने के कारण, इन तीनों प्रकारों से प्रकाशकत्व ( व्यञ्जकत्व ) का और इनके विपरीत तीन रूपों वाली गुणवृत्ति का स्वरूपभेद व्याख्यान करके विषयभेद को भी कहते हैं—विषयभेद भी—। वस्तु मात्र गुणवृत्ति का भी विषय है यह विशेषता बताते हैं—व्यङ्ग्य रूप से अवच्छिन्न—। जो व्यञ्जकत्व का विषय है वह गुणवृत्ति का विषय नहीं है, और अन्य उसका विषयभेद लगा लेना चाहिए । उनमें प्रथम प्रकार को कहते हैं—उनमें—। नहीं कह सकता है—। क्योंकि यह पहले ही कह चुके हैं कि लक्षणा की सामग्री वहां विद्यमान नहीं । उसी प्रकार है—। अर्थात् वहां गुणवृत्ति ठीक नहीं । वस्तु का जो पहले विशेषण किया है उसकी व्याख्या करते हैं—चारुत्व की

तृतीय उद्योतः ४६७ ध्वन्यालोकः यत्प्रतिपिपादयितुमिष्यते तद्व्यङ्ग्यम् । तच्च न सर्वं गुणवृत्तेर्विषयः प्रसिद्धयनुरोधाभ्यामपि गौणानां शब्दानां प्रयोगदर्शनात् । तथोक्तं प्राक् । यदपि च गुणवृत्तेर्विषयस्तदपि च व्यञ्जकत्वानुप्रवेशेन । तस्मा- द्गुणवृत्तेरपि व्यञ्जकत्वस्यात्यन्तविलक्षणत्वम् । वाचकत्वगुणवृत्तिवि- लक्षणस्यापि च तस्य तदुभयाश्रयत्वेन व्यवस्थानाम् । लिए स्वशब्द द्वारा अनभिधेय रूप से जिसे प्रतिपादन करना चाहते हैं वह व्यङ्ग्य है। वह सब नहीं गुणवृत्ति का विषय है, क्योंकि प्रसिद्धि और अनुरोध से भी गौण शब्दों का प्रयोग देखा जाता है। जैसा कि पहले कह चुके हैं। और जो भी गुणवृत्ति का विषय होगा वह भी व्यञ्जकत्व के सम्बन्ध से होगा। इसलिए गुणवृत्ति से भी व्यञ्जकत्व अत्यन्त विलक्षण है। वाचकत्व और गुणवृत्ति से विलक्षण भी वह (व्यञ्ज- कत्व) दोनों के आश्रित रूप से रहता है। लोचनम् इति । न सर्वमिति । किंचित्तु भवति । यथा—‘निःश्वासान्ध इवादर्शः' इति । यदुक्तम्—'कस्यचिद् ध्वनिभेदस्य सा तु स्यादुपलक्षणम्' इति । प्रसिद्धितो लावण्यादयः शब्दाः, वृत्तानुरोधव्यवहारानुरोधादेः 'वदति बिसिनीपत्रशयन- म्' इत्येवमादयः । प्रागिति । प्रथमोद्द्योते 'रूढा ये विषयेऽन्यत्र' इत्यत्रान्तरे । न सर्वमिति यथास्माभिर्व्याख्यातं तथा स्फुटयति—यदपि चेति । गुणवृत्तेरिति पञ्चमी । अधुनेतररूपोपजीवकत्वेन तदितरस्मात्तदितररूपोपजीवकत्वेन च तदितरस्मादित्यनेन पर्यायेण वाचकत्वाद् गुणवृत्तेश्च द्वितयादपि भिन्नं व्यञ्जक- त्वमित्युपपादयति—वाचकत्वेति । चोऽवधारणे भिन्नक्रमः, अपिशब्दोऽपि । न केवलं पूर्वोक्तो हेतुकलापो यावत्तदुभयाश्रयत्वेन मुख्योपचाराश्रयत्वेन यद्व्य- प्रतीति के लिए—। सब नहीं—। कुछ तो होता है, जैसे 'निःश्वासान्ध इवादर्शः'। क्योंकि कहा है—'किसी ध्वनि के भेद का वह उपलक्षण हो सकती है'। प्रसिद्धि से 'लावण्य' आदि शब्द। वृत्तानुरोध और व्यवहारानुरोध आदि से 'वदति बिसिनीपत्र- शयनम्' इत्यादि । पहले—। प्रथम उद्योत में 'रूढा ये विषयेऽन्यत्र' इसके बीच । 'सब नहीं' को जिस प्रकार हमने व्याख्यान किया है उस प्रकार स्पष्ट करते हैं—और जो कि—। 'गुणवृत्ति' यहां पञ्चमी विभक्ति है। अब (व्यञ्जकत्व) इतर रूप (गुणवृत्ति) के उपजीवक (आश्रय) रूप के कारण इतर रूप (वाचकत्व) से (भिन्न होता है) और इतर रूप (वाचकत्व) के उपजीवक रूप से उससे इतररूप (गुणवृत्ति) से (भिन्न होता है); इस प्रकार क्रम से वाचकत्व और गुणवृत्ति इन दोनों से भी व्यञ्जकत्व भिन्न होता है यह उपपादन करते हैं—वाचकत्व—। 'और' शब्द अवधारणार्थक और भिन्न क्रम है। 'भी' शब्द भी भिन्नक्रम है। न केवल पूर्वोक्त हेतुसमूह बल्कि दोनों के आश्रित

४६८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः व्यञ्जकत्वं हि क्वचिद्वाचकत्वाश्रयेण व्यवतिष्ठते, यथा विवक्षिता- न्यपरवाच्ये ध्वनौ। क्वचित्तु गुणवृत्त्याश्रयेण यथा अविवक्षितवाच्ये ध्वनौ। तदुभयाश्रयत्वप्रतिपादनायैव च ध्वनेः प्रथमतरां द्वौ प्रभेदावुप- न्यस्तौ। तदुभयाश्रितत्वाच्च तदेकरूपत्वं तस्य न शक्यते वक्तुम्। यस्मान्न तद्वाचकत्वैकरूपमेव, क्वचिल्लक्षणाश्रयेण वृत्तेः। न च लक्षणै- करूपमेवान्यत्र वाचकत्वाश्रयेण व्यवस्थानात्। न चोभयधर्मत्वेनैव तदेकैकरूपं न भवति। यावद्वाचकत्वलक्षणादिरूपरहितशब्दधर्मत्वेना- पि। तथाहि गीतध्वनीनामपि व्यञ्जकत्वमस्ति रसादिविषयम्। न च व्यञ्जकत्व कहीं पर वाचकत्व के आश्रय से व्यवस्थित होता है, जैसे विवक्षितान्य- परवाच्य ध्वनि में, परन्तु कहीं पर गुणवृत्ति के आश्रय से, जैसे अविवक्षितवाच्य ध्वनि में। और उन दोनों (वाचकत्व और गुणवृत्ति) के आश्रयत्व के प्रतिपादनार्थ ही ध्वनि के पहले-पहल दो प्रभेद उपन्यस्त हैं। और उन दोनों पर आश्रित होने के कारण वह (व्यञ्जकत्व) उनके साथ एक रूप नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह वाचकत्व के साथ एक रूप ही नहीं है, क्योंकि कहीं पर लक्षणा के आश्रय से भी रहता है। और लक्षणा के साथ एक रूप ही नहीं है, अन्यत्र वाचकत्व के आश्रय से भी व्यवस्थित होता है। और न केवल उभयधर्म रूप से ही वह एक-एकरूप का नहीं होता है, अपि तु वाचकत्व, लक्षणा आदि रूप से रहित शब्द के धर्म रूप से भी। जैसा कि गीत ध्वनियों का भी रसादिविषयक व्यञ्जकत्व है। किन्तु उनका लोचनम् वस्थानं तदपि वाचकगुणवृत्तिविलक्षणस्यैवेति व्याप्तिघटनम्। तेनायं तात्प- र्यार्थः—तदुभयाश्रयत्वेन व्यवस्थानात्तदुभयवैलक्षण्यमिति। एतदेव विभजते—व्यञ्जकत्वं हीति। प्रथमतरामिति। प्रथमोद्द्योते 'स च' इत्यादिना ग्रन्थेन। हेत्वन्तरमपि सूचयति—न चेति। वाचकत्वगौणत्वोभय- वृत्तान्तवैलक्षण्यादिति सूचितो हेतुः। तमेव प्रकाशयति—तथाहीत्यादिना। होकर मुख्य और उपचार के आश्रित रूप से जो व्यवस्थान है वह भी वाचक और गुणवृत्ति से विलक्षण उस व्यञ्जक की व्याप्ति बनी है। इससे यह तात्पर्यार्थ है—उन दोनों के आश्रित रूप से रहने के कारण उन दोनों से वैलक्षण्य है। इसी का विभाग करते हैं—व्यञ्जकत्व—। पहले-पहल—। प्रथम उद्योत में 'और वह' इत्यादि ग्रन्थ द्वारा। दूसरा हेतु सूचित करते हैं—और लक्षणा—। 'वाचकत्व और गौणत्व इन दोनों वृत्तान्तों से वैलक्षण्य के कारण' यह हेतु सूचित किया है। उसे ही प्रकाशित करते हैं—जैसा कि—। इत्यादि द्वारा। उनका गीतादि शब्दों का। दूसरा

तृतीय उद्योतः ४६९

ध्वन्यालोकः तेषां वाचकत्वं लक्षणा वा कथञ्चिल्लक्ष्यते । शब्दादन्यत्रापि विषये व्य- ञ्जकत्वस्य दर्शनाद्वाचकत्वादिशब्दधर्मप्रकारत्वमयुक्तं वक्तुम् । यदि च वाचकत्वलक्षणादीनां शब्दप्रकाराणां प्रसिद्धप्रकारविलक्षणत्वेऽपि व्यञ्ज- कत्वं प्रकारत्वेन परिकल्प्यते तच्छब्दस्यैव प्रकारत्वेन कस्मान्न परिक- ल्प्यते । तदेवं शाब्दे व्यवहारे त्रयः प्रकाराः—वाचकत्वं गुणवृत्तिर्व्य- वाचकत्व अथवा लक्षणा किसी प्रकार नहीं लक्षित होती । शब्द के अतिरिक्त भी विषय में व्यञ्जकत्व के देखे जाने के कारण वाचकत्व आदि शब्द-धर्मों का प्रकार कहना ठीक नहीं । और यदि प्रसिद्ध प्रकारों से विलक्षण होने पर भी व्यञ्जकत्व को वाचकत्व और लक्षणा आदि शब्द-प्रकारों प्रकार (धर्म) बनाते हैं तो शब्द का ही प्रकार रूप से क्यों नहीं (उसे) बनाते हैं ? तो इस प्रकार शाब्द व्यवहार में तीन प्रकार हैं—वाचकत्व, गुणवृत्ति और लोचनम् तेषामिति । गीतादिशब्दानाम् । हेत्वन्तरमपि सूचयति—शब्दादन्यत्रेति । वाचकत्वगौणत्वाभ्यामन्यद् व्यञ्जकत्वं शब्दादन्यत्रापि वर्तमानत्वात्प्रमेयत्वा- दिवदिति हेतुः सूचितः । नन्वन्यत्रावाचके यद्व्यञ्जकत्वं तद्भवतु वाचकत्वा- देर्विलक्षणम्, वाचके तु यद् व्यञ्जकत्वं तद्विलक्षणमेवास्त्वित्याशङ्क्याह— यदीति । आदिपदेन गौणं गृह्यते । शब्दस्यैवेति । व्यञ्जकत्वं वाचकत्वमिति यदि पर्यायौ कल्प्येते तर्हि व्यञ्जकत्वं शब्द इत्यपि पर्यायता कस्मान्न कल्प्यते, इच्छाया अव्याहतत्वात् । व्यञ्जकत्वस्य तु विविक्तं स्वरूपं दर्शितं तद्विषया- न्तरे कथं विपर्यस्यताम् । एवं हि पर्वतगतो धूमोऽनग्निजोऽपि स्यादिति भावः । अधुनोपपादितं विभागमुपसंहरति—तदेवमिति । व्यवहारग्रहणेन समु- द्रघोषादीन् व्युदस्यति । हेतु भी सूचित करते हैं—शब्द के अतिरिक्त—। व्यञ्जकत्व वाचकत्व और गौणत्व से भिन्न है, क्योंकि शब्द के अतिरिक्त भी (स्थल में) वर्तमान रहता है, प्रमेयत्व आदि की भांति' यह हेतु सूचित किया । अन्यत्र अवाचक (गीतादि) स्थल में जो व्यञ्जकत्व है वह वाचकत्व आदि से विलक्षण हो, परन्तु जो वाचक में व्यञ्जकत्व है वह विलक्षण नहीं है, यह आशङ्का करके कहते हैं—और यदि—। 'आदि' पद से गौण को ग्रहण करते हैं । शब्द का ही—। व्यञ्जकत्व और वाचकत्व को यदि पर्याय बनाते हो तो व्यञ्जकत्व और शब्द को क्यों नहीं पर्याय बना लेते हैं, क्योंकि इच्छा तो अव्याहत होती है । व्यञ्जकत्व का तो अलग रूप दिखा चुके हैं वह विषयान्तर में कैसे विपर्यस्त होगा ? भाव यह कि इस प्रकार तो पर्वतगत धूम अनग्निज भी हो सकता है । अब उपपादित विभाग का उपसंहार करते हैं—तो इस प्रकार—। 'व्यवहार' के ग्रहण से समुद्र की आवाज आदि का निराकरण करते हैं ।

४७० सलोचन-ध्वन्यालोकः

ध्वन्यालोकः
ञ्जकत्वं च । तत्र व्यञ्जकत्वे यदा व्यङ्ग्यप्राधान्यं तदा ध्वनिः, तस्य
चाविवक्षितवाच्यो विवक्षितान्यपरवाच्यश्चेति द्वौ प्रभेदावनुकान्तौ
प्रथमतंरं तौ सविस्तरं निर्णितौ ।
अन्यो ब्रूयात्—ननु विवक्षितान्यपरवाच्ये ध्वनौ गुणवृत्तिता
नास्तीति यदुच्यते तद्युक्तम् । यस्माद्वाच्यवाचकप्रतीतिपूर्विका यत्रार्था-
न्तरप्रतिपत्तिस्तत्र कथं गुणवृत्तिव्यवहारः, न हि गुणवृत्तौ यदा निमि-
त्तेन केनचिद्विषयान्तरे शब्द आरोप्यते अत्यन्ततिरस्कृतस्वार्थः यथा-
व्यञ्जकत्व । उनमें से व्यञ्जकत्व में जब व्यङ्ग्य का प्राधान्य होता है तब ध्वनि होती
है, और उसके अविवक्षितवाच्य और विवक्षितान्यपरवाच्य ये दो प्रभेद क्रम-प्राप्त होते
हैं, उन्हें पहले ही विस्तारपूर्वक निर्णय कर चुके हैं ।
अन्य कोई कह सकता है—विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि में गुणवृत्ति व्यवहार
नहीं है यह जो कहते हैं सो ठीक है, क्योंकि वाच्य-वाचक की प्रतीतिपूर्वक जहां
अर्थान्तर की प्रतीति होती है वहां गुणवृत्तिव्यवहार कैसे हो सकता है ? गुणवृत्ति में
जब किसी निमित्त से अत्यन्त तिरस्कृत स्वार्थ शब्द को विषयान्तर में आरोप करते
लोचनम्
ननु वाचकत्वरूपोपजीवकत्वाद् गुणवृत्त्यनुजीवकत्वादिति च हेतुद्वयं
यदुक्तं तदविवक्षितवाच्यभागे सिद्धं न भवति तस्य लक्षणैकशरीरत्वादित्य-
भिपायेणोपक्रमते-अन्यो ब्रूयादिति । यद्यपि च तस्य तदुभयाश्रयत्वेन व्यव-
स्थानादिति ब्रुवता निर्णीतचरमेवैतत्, तथापि गुणवृत्तेरविवक्षितवाच्यस्य च
दुर्निरूपं वैलक्षण्यं यः पश्यति तं प्रत्याशङ्कानिवारणार्थोऽयमुपक्रमः । अत एवा-
द्यभेदस्याङ्गीकरणपूर्वकमयं द्वितीयभेदाक्षेपः । विवक्षितान्यपरवाच्य इत्यादिना
पराभ्युपगमस्य स्वाङ्गीकारो दर्श्यते । गुणवृत्तिव्यवहाराभावे हेतुं दर्शयितुं
तस्या एव गुणवृत्तेस्तावद् वृत्तान्तं दर्शयति—न हीति । गुणतया वृत्तिर्व्यापारो
जो कि वाचकत्व रूप उपजीवकत्व और गुणवृत्ति रूप अनुजीवकत्व ये दो हेतु कहे
हैं वह अविवक्षितवाच्य के अंश में सिद्ध नहीं होते, क्योंकि उसका एकमात्र शरीर
लक्षणा है, इस अभिप्राय से उपक्रम करते हैं—अन्य कोई कह सकता है—। 'वह उन
दोनों के आश्रय से व्यवस्थित होता है' यह यद्यपि कथन करते हुए निर्णय कर ही चुके
हैं तथापि जो व्यक्ति गुणवृत्ति और अविवक्षितवाच्य का वैलक्षण्य दुर्निरूप देखता है
उसकी आशङ्का के निवारणार्थ यह उपक्रम है । इसी लिए यह प्रथम भेद का अङ्गीकार-
पूर्वक दूसरे भेद का आक्षेप है । 'विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि में' इत्यादि द्वारा अन्य
किसी के मन्तव्य की स्वीकृति दिखाते हैं । गुणवृत्ति व्यवहार के न होने का कारण
दिखाने के लिए उसी गुणवृत्ति का वृत्तान्त दिखाते हैं—गुणवृत्ति में—। गुण रूप

४. चतुर्थ उद्योत: ध्वनि द्वारा प्रतिभा-अनन्तता, रस-ध्वनि की सार्वभौमिकता एवं उपसंहार

तृतीय उद्योतः ४७१ ध्वन्यालोकः 'अग्निर्माणवकः' इत्यादौ, यदा वा स्वार्थमंशेनापरित्यजंस्तत्सम्बन्धद्वा- रेण विषयान्तरमाक्रामति, यथा- 'गङ्गायां घोषः' इत्यादौ । तदावि- वक्षितवाच्यत्वमुपपद्यते । अत एव च विवक्षितान्यपरवाच्ये ध्वनौ वा- च्यवाचकयोर्द्वयोरपि स्वरूपप्रतीतिरर्थावगमनं च दृश्यत इति व्यञ्ज- कत्वव्यवहारो युक्त्यनुरोधी । स्वरूपं प्रकाशयन्नेव परावभासको व्य- ञ्जक इत्युच्यते, तथाविधे विषये वाचकत्वस्यैव व्यञ्जकत्वमिति गुण- वृत्तिव्यवहारो नियमेनैव न शक्यते कर्तुम् । हैं, जैसे 'माणवक अग्नि है' इत्यादि में; अथवा जब (शब्द) स्वार्थ को अंशतः नहीं छोड़ता हुआ विषयान्तर पर पहुंच जाता है, जैसे 'गङ्गा में घोष' इत्यादि में, विवक्षित- वाच्यत्व नहीं बनता। और इसीलिए विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि में वाच्य और वाचक दोनों की भी स्वरूपप्रतीति और अर्थ का ज्ञान देखा जाता है इस लिए व्यञ्ज- कत्वव्यवहार युक्त्यनुकूल है । स्वरूप को प्रकाशित करता हुआ भी अन्य को अवभा- सित कराने वाला 'व्यञ्जक' कहलाता है, उस प्रकार के विषय में वाचकत्व का ही व्यञ्जकत्व है, इसलिए गुणवृत्ति-व्यवहार नियमतः ही नहीं किया जा सकता । लोचनम् गुणवृत्तिः । गुणेन निमित्तेन सादृश्यादिना वृत्तिः अर्थान्तरविषयेऽपि शब्दस्य सामानाधिकरण्यमिति गौणं दर्शयति । यदा वा स्वार्थमिति लक्षणां दर्शयति । अनेन भेदद्वयेन च स्वीकृतमविवक्षितवाच्यभेदद्वयात्मकमिति सूचयति । अत एव अत्यन्ततिरस्कृतस्वार्थशब्देन विषयान्तरमाक्रामति चेत्यनेन शब्देन तदेव भेदद्वयं दर्शयति-अत एव चेति । यत एव न तत्रोक्तहेतुबलाद् गुणवृत्ति- व्यवहारो न्याय्यस्तत इत्यर्थः । युक्तिं लोकप्रसिद्धिरूपामबाधितां दर्शयति- स्वरूपमिति । उच्यत इति प्रदीपादिः, इन्द्रियादेस्तु करणत्वान्न व्यञ्जकत्वं प्रतीत्युत्पत्तौ । (अप्रधान रूप) से वृत्ति अर्थात् व्यापार गुणवृत्ति है । सादृश्य आदि गुण के निमित्त से वृत्ति अर्थात् अर्थान्तर के विषय में शब्द का सामानाधिकरण्य ('गुणवृत्ति') है, इससे गौण भेद दिखाते हैं। 'अथवा जब स्वार्थ को' इससे लक्षणा को दिखाते हैं। इन दोनों भेदों से अविवक्षितवाच्य का स्वीकृत भेदद्वयात्मक है' यह सूचित करते हैं । इसी लिए और 'अत्यन्ततिरस्कृत स्वार्थ' शब्द से और 'विषयान्तर पर पहुँच जाता है' इस शब्द से उन्हीं दोनों भेदों को दिखाते हैं-और इसीलिए-। अर्थात् जिस कारण ही वहां उक्त हेतु के बल से गुणवृत्ति व्यवहार ठीक नहीं है उस कारण । लोकप्रसिद्धिरूप अबा- धित युक्ति दिखाते हैं-स्वरूप की-। कहलाता है प्रदीप आदि, किन्तु इन्द्रियादिकरण होते हैं अतः प्रतीति की उत्पत्ति में व्यञ्जक नहीं कहलाते ।

४७२ सलोचन-ध्वन्यालोकः

ध्वन्यालोकः
अविवक्षितवाच्यस्तु ध्वनिर्गणवृत्तेः कथं भिद्यते । तस्य
प्रभेदद्वये गुणवृत्तिप्रभेदद्वयरूपता लक्ष्यत एव यतः । अयमपि
न दोषः । यस्मादविवक्षितवाच्यो ध्वनिर्गणवृत्तिमार्गाश्रयोऽपि
भवति न तु गुणवृत्तिरूप एव । गुणवृत्तिर्हि व्यञ्जकत्वशून्यापि
दृश्यते । व्यञ्जकत्वं च यथोक्तचारुत्वहेतुं व्यङ्ग्यं विना न
परन्तु अविवक्षितवाच्य ध्वनि गुणवृत्ति से भिन्न कैसे होगा, जब कि उसके दोनों
प्रभेदों में गुणवृत्ति के दो प्रभेदों की रूपता लक्षित ही होती है ! यह भी दोष नहीं
है, क्योंकि अविवक्षितवाच्यध्वनि गुणवृत्ति के मार्ग पर आश्रित भी होता है, न कि
गुणवृत्तिरूप ही होता है । क्योंकि गुणवृत्ति व्यञ्जकत्व से रहित भी देखी जाती है ।
और व्यञ्जकत्व यथोक्त चारुत्व के हेतु व्यङ्ग्य के बिना व्यवस्थित नहीं होता । परन्तु
लोचनम्
एवमभ्युपगमं प्रदर्श्यक्षेपं दर्शयति—अविवक्षितेति । तुशब्दः पूर्वस्माद्विशेषं
द्योतयति । तस्येति । अविवक्षितवाच्यस्य यत्प्रभेदद्वयं तस्मिन् गौणलाक्षणि-
कत्वात्मकं प्रकारद्वयं लक्ष्यते निर्भास्यत इत्यर्थः । एतत्परिहरति—अयमपीति ।
गुणवृत्तेर्यो मार्गः प्रभेदद्वयं स आश्रयो निमित्ततया प्राक्कक्ष्यानिवेशी यस्ये-
त्यर्थः । एतच्च पूर्वमेव निर्णीतम् । ताद्रूप्याभावे हेतुमाह—गुणवृत्तिरिति ।
गौणलाक्षणिकरूपोभयी अपीत्यर्थः । ननु व्यञ्जकत्वेन कथं शून्या गुणवृत्ति-
र्भवति, यतः पूर्वमेवोक्तम्—
मुख्यां वृत्तिं परित्यज्य गुणवृत्त्यार्थदर्शनम् ।
यदुद्दिश्य फलं तत्र शब्दो नैव स्खलद्गतिः ॥ इति ।
इस प्रकार अभ्युपगम को दिखा कर आक्षेप दिखाते हैं—अविवक्षित—। ‘परन्तु’
शब्द पहले से विशेष को प्रकट करता है । उसके—। अविवक्षित वाच्य के जो दो प्रभेद
हैं उनमें गौण और लाक्षणिक रूप दो प्रकार लक्षित होते हैं, अर्थात् निर्भासित होते हैं ।
( इसका परिहार करते हैं—यह भी—। गुणवृत्ति का जो मार्ग प्रभेदद्वय है वह आश्रय
अर्थात् निमित्त रूप से पहली कक्ष्या में रहने वाला है जिसका । इसे पहले ही निर्णय कर
चुके हैं । ताद्रूप्य के अभाव का हेतु कहते हैं—गुणवृत्ति—। अर्थात् गौण और
लाक्षणिक रूप दोनों भी । गुणवृत्ति व्यंजकत्व से शून्य कैसे हो सकती है ? क्योंकि पहले
ही कहा है—
‘जिस फल को उद्देश्य करके, मुख्य वृत्ति को छोड़ कर गुण वृत्ति द्वारा अर्थ
का ज्ञान कराते हैं उसमें शब्दस्खलद्गति ( अर्थात् बाधित अर्थ वाला ) नहीं है ।’

तृतीय उद्योतः ४७३ ध्वन्यालोकः व्यवतिष्ठते। गुणवृत्तिस्तु वाच्यधर्माश्रयेणैव व्यङ्ग्यमात्राश्रयेण चाभे- दोपचाररूपा सम्भवति, यथा—तीक्ष्णत्वादग्निर्मााणवकः, आह्लाद- कत्वाच्चन्द्र एवास्या मुखमित्यादौ। यथा च 'प्रिये जने नास्ति पुन- रुक्तम्' इत्यादौ। यापि लक्षणरूप गुणवृत्तिः साप्युपलक्षणीयार्थसंब- न्धमात्राश्रयेण चारुरूपव्यङ्ग्यप्रतीतिं विनापि सम्भवत्येव, यथा— मञ्चाः क्रोशन्तीत्यादौ विषये। गुणवृत्ति वाच्यधर्म के आश्रय से ही और व्यङ्ग्यमात्र के आश्रय से अभेदोपचार रूप सम्भव होती है, जैसे 'तीक्ष्ण होने से माणवक अग्नि है'; आह्लादक होने से इस इसका मुख चन्द्र ही है' इत्यादि में। और जैसे 'प्रिय जन में पुनरुक्ति नहीं है' इत्यादि में। जो भी लक्षणारूप गुणवृत्ति है वह भी उपलक्षणीय अर्थ के साथ सम्बन्ध मात्र के आश्रय से चारुरूप व्यङ्ग्य की प्रतीति के बिना भी सम्भव होती है, जैसे—'मञ्च आक्रोश करते हैं' इत्यादि विषय में। लोचनम् न हि प्रयोजनशून्य उपचारः प्रयोजनांशनिवेशी च व्यञ्जनव्यापार इति भवद्भिरेवाभ्यधायीत्याशङ्क्याभिमतं व्यञ्जकत्वं विश्रान्तिस्थानरूपं तत्र नास्ती- त्याह-व्यञ्जकत्वं चेति। वाच्यधर्मेति। वाच्यविषयो यो धर्मोऽभिधाव्यापारस्त- स्याश्रयेण तदुद्बृंहणायेत्यर्थः। श्रुतार्थापत्ताविवार्थान्तरस्याभिधेयार्थोपपादन एव पर्यवसानादिति भावः। तत्र गौणस्योदाहरणमाह—यथेति। द्वितीयमपि प्रकारं व्यञ्जकत्वशून्यं निदर्शयितुमुपक्रमते—यापीति। चारुरूपं विश्रान्तिस्थानं, तदभावे स व्यञ्जकत्वव्यापारो नैवोन्मीलति, प्रत्यावृत्त्य वाच्य एव विश्रान्तेः, क्षणदृष्टनष्टदिव्यविभवप्राकृतपुरुषवत्। आप ही कह चुके हैं कि उपचार प्रयोजनशून्य नहीं होता और व्यंजन व्यापार प्रयोजन के अंश में रहता है, यह आशङ्का करके विश्रान्तिस्थान रूप अभिमत व्यंजकत्व वहाँ नहीं है—और व्यञ्जकत्व—। वाच्यधर्म—। अर्थात् वाच्यविषयक जो धर्म अभिधा व्यापार उसके आश्रय से उसके उपबृंहण के लिए। भाव यह कि क्योंकि श्रुतार्थापत्ति की भाँति अर्थान्तर का पर्यवसान अभिधेय अर्थ के उपपादन में ही होता है। उनमें, गौण का उदाहरण कहते हैं—जैसे—। व्यंजकत्वरहित दूसरे प्रकार को भी दिखाने के लिए उपक्रम करते हैं—जो भी—। चारु रूप अर्थात् विश्रान्ति का स्थान, उसके अभाव में वह व्यंजकत्व व्यापार उन्मीलित नहीं होता, क्योंकि लौट कर वाच्य में ही विश्रान्ति हो जाती है, उस दरिद्र पुरुष की भाँति जिसकी दिव्य सम्पत्ति क्षण में ही दिख जाने के बाद नष्ट हो जाती है।