भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 502, कुल 680 में से

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पृष्ठ 502

४४२ सलोचन-ध्वन्यालोकः

ध्वन्यालोकः विषयेणौचित्येन यद्योजनमेतन्महाकवेर्मुख्यं कर्म । अयमेव हि महाक- वेर्मुख्यो व्यापारो यद्रसादीनेव मुख्यतया काव्यार्थीकृत्य तद्व्यक्त्य- नुगुणत्वेन शब्दानांमर्थानां चोपनिबन्धनम् । एतच्च रसादितात्पर्येण काव्यनिबन्धनं भरतादावपि सुप्रसिद्ध- मेवेति प्रतिपादयितुमाह — औचित्य के साथ जो जोड़ना है, यह महान् कवि का मुख्य कर्म है । महाकवि का मुख्य यही व्यापार है जो रसादि को मुख्य रूप से काव्य का अर्थ बना कर उनकी व्यञ्जना के अनुगुण रूप से शब्दों और अर्थों का उपनिबन्धन है । और यह रसादि के तात्पर्य से काव्य का निबन्धन भरत आदि में भी सुप्रसिद्ध ही है यह प्रतिपादन करने के लिए कहते हैं— लोचनम् काव्यार्थीकृत्येति ! अन्यथा लौकिकशास्त्रीयवाक्यार्थेभ्यः कः काव्यार्थस्य विशेषः । एतच्च निर्णितमाद्योद्द्योते—'काव्यस्यात्मा स एवार्थः' इत्यत्रा- न्तरे ॥ ३२ ॥ एतच्चेति । यदस्माभिरुक्तमित्यर्थः । भरतादावित्यादिग्रहणादलङ्कारशास्त्रेषु परुषाद्या वृत्तय इत्युक्तं भवति । द्वयोरपि तयोरिति । वृत्तिलक्षणयोर्व्यवहारयोरि- त्यर्थः । जीवभूता इति । 'वृत्तयः काव्यमातृकाः' इति ब्रुवाणेन मुनिना रसोचिते- तिवृत्तसमाश्रयणोपदेशेन रसस्यैव जीवितत्वमुक्तम् । भामहादिभिश्च— स्वादुकाव्यरसोन्मिश्रं वाक्यार्थमुपभुञ्जते । प्रथमालीढमधवः पिबन्ति कटुभेषजम् ॥ सुन्दर कथाशरीर का विधान०' इत्यादि द्वारा । काव्य का अर्थ बनाकर—। अन्यथा लौकिक और शास्त्रीय वाक्यार्थों से काव्यार्थ का विशेष ( भेद ) कौन होगा ? यह प्रथम उद्योत में निर्णय कर चुके हैं—'काव्य का आत्मा वही अर्थ है' इस प्रसङ्ग में ॥ ३२ ॥ और यह—। अर्थात् जिसे हमने कहा है । 'भरत आदि में' इस ग्रहण से यह बात कही गई कि अलङ्कार शास्त्रों में परुषा आदि वृत्तियां हैं । उन दोनों के भी—। अर्थात् दोनों वृत्ति रूप व्यवहारों के । जीवभूत—। 'वृत्तियां काव्य की माताएं होती हैं' यह कथन करते हुए मुनि ने रसोचित वृत्ति के समाश्रय के उपदेश द्वारा रस का ही जीवि- तत्व कथन किया है । और भामह आदि ने— स्वादु काव्य के रस से मिले वाक्यार्थ का उपयोग करते हैं, ( इसका मतलब हुआ कि ) पहले मधु का आलेहन करके कटु औषध का पान करते हैं ।

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