भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 501, कुल 680 में से

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तृतीय उद्योतः ४४१

ध्वन्यालोकः इत्थमनेनानन्तरोक्तेन प्रकारेण रसादीनां रसभावतदाभासानां परस्परं विरोधस्याविरोधस्य च विषयं विज्ञाय सुकविः काव्यविषये प्रतिभातिशययुक्तः काव्यं कुर्वन्न क्वचिन्मुह्यति । एवं रसादिषु विरोधाविरोधनिरूपणस्योपयोगित्वं प्रतिपाद्य व्यञ्जकवाच्यवाचकनिरूपणस्यापि तद्विषयस्य तत्प्रतिपाद्यते— वाच्यानां वाचकानां च यदौचित्येन योजनम् । रसादिविषयेणैतत्कर्म मुख्यं महाकवेः ॥ ३२ ॥ वाच्यानामिति वृत्तविशेषाणां वाचकानां च तद्विषयाणां रसादि- इस प्रकार अभी कहे गए प्रकार के अनुसार रस आदि रस, भाव उसके आभास के परस्पर विरोध और अविरोध के विषय को जान कर सुकवि काव्य के विषय में अतिशय प्रतिभा से युक्त होकर काव्य निर्माण करता हुआ कहीं पर भ्रमित नहीं होता । इस प्रकार रस आदि में विरोध और अविरोध के निरूपण की उपयोगिता का प्रतिपादन करके उनके विषय (सम्बन्ध) के व्यञ्जक वाच्य तथा वाचक के निरूपण की भी उस (उपयोगिता) का प्रतिपादन करते हैं— वाच्य और वाचकों का जो रसादिविषयक औचित्य से जोड़ना है महाकवि मुख्य कर्म है ॥ ३२ ॥ वाच्य अर्थात् इतिवृत्त विशेषों का और उनके विषय के वाचकों का रसादिविषयक लोचनम् रसादिषु रसादिविषये व्यञ्जकानि यानि वाच्यानि विभावादीनि वाचकानि च सुप्तिङादीनि तेषां यन्निरूपणं तस्येति । तद्विषयस्येति । रसादिविषयस्य । तदिति उपयोगित्वम् । मुख्यमिति । ‘आलोकार्थी’ इत्यत्र यदुक्तं तदेवोपसंहृतम् । महाकवेरिति सिद्धवत्फलनिरूपणम् । एवं हि महाकवित्वं नान्यथेत्यर्थः । इति- वृत्तविशेषाणामिति । इतिवृत्तं हि प्रबन्धवाच्यं तस्य विशेषाः प्रागुक्ताः— ‘विभावभावानुभाव·सञ्चार्यौचित्यचारुणः । विधिः कथाशरीरस्य’ इत्यादिना । रसादि में अर्थात् रसादि के विषय में जो वाच्य विभावादि और वाचक सुप् तिङ् आदि हैं उनका जो निरूपण है उसका । उनके विषय के—। रसादि के विषय के । उस—। उपयोगिता । मुख्य—। ‘आलोकार्थी’ में जो कहा है उसी का उपसंहार किया है । महाकवि—। सिद्ध की भांति फल का निरूपण है, अर्थात् इस प्रकार महाकवित्व होता है अन्यथा नहीं । इतिवृत्तविशेष—। इतिवृत्त प्रबन्ध का वाच्य होता है, उसके विशेष पहले कहे गए हैं—विभाव, भाव, अनुभाव और सञ्चारी के औचित्य से

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