ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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४४० सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
सत्यं मनोरमा रामाः सत्यं रम्या विभूतयः ।
किं तु मत्ताङ्गनापाङ्गभङ्गलोलं हि जीवितम् ॥
इत्यादिषु नास्ति रसविरोधदोषः ।
विज्ञायेत्थं रसादीनामविरोधविरोधयोः ।
विषयं सुकविः काव्यं कुर्वन्मुह्यति न क्वचित् ॥ ३१ ॥
'यह ठीक है कि स्त्रियां मनोरम होती हैं, यह ठीक है कि विभूतियां रम्य होती
हैं, किन्तु जीवन मतवाली अङ्गना के कटाक्ष-भङ्ग की भांति चञ्चल होता है।'
इत्यादि में रसविरोध का दोष नहीं है ।
इस प्रकार रस आदि के अविरोध और विरोध के विषय को जान कर सुकवि
काव्य निर्माण करता हुआ कहीं पर भ्रमित नहीं होता ॥ ३१ ॥
लोचनम्
कर्तारो धर्मा गुणास्तदतिशयहेतवस्त्वलङ्कारा' इति । मत्ताङ्गनेति । अत्र हि
शान्तविभावे सर्वस्यानित्यत्वे वर्ण्यमाने न कस्यचिद्विभावस्य शृङ्गारभङ्ग्या
निबन्धः कृतः, किं तु सत्यमिति परहृदयानुप्रवेशेनोक्तम्; न खल्वलीक-
वैराग्यकौतुकरुचिं प्रकटयामः, अपि तु यस्य कृते सर्वमभ्यर्थ्यते तदेवेदं
चलमिति; तत्र मत्ताङ्गनापाङ्गभङ्गस्य शृङ्गारं प्रति सम्भाव्यमानविभावा-
नुभावत्वेनाङ्गस्य लोलतायामुपमानतोक्तेति प्रियतमाकटाक्षो हि सर्वस्या-
भिलषणीय इति च तत्प्रीत्या प्रवृत्तिमान् गुडजिह्विकया प्रसक्तानुप्रसक्त-
वस्तुतत्त्वसंवेदनेन वैराग्ये पर्यवस्यति विनेयः ॥ ३० ॥
तदेतदुपसंहरन्नस्योक्तस्य प्रकरणस्य फलमाह—विज्ञायेत्थमिति ॥ ३१ ॥
गुण है और ( शोभा ) को बढ़ाने वाले अलङ्कार हैं'। मतवाली अङ्गना—। यहां सभी
का अनित्यत्व रूप शान्त के विभाव के वर्णन में किसी विभाव का शृङ्गार की भङ्गी से
निबन्धन नहीं किया है, 'किन्तु ठीक है' यह दूसरे के हृदय में अनुप्रवेश के द्वारा कहा
है; हम मिथ्या वैराग्य के कौतुक के प्रति रुचि प्रकट करते हैं, अपितु जिसके लिए सब
कुछ चाहते हैं वही यह ( जीवन ) चञ्चल है; वहां शृङ्गार के प्रति विभाव और अनुभाव
के सम्भाव्यमान होने से अङ्गभूत मतवाली अङ्गना के अपाङ्गभङ्ग की चञ्चलता में उप-
मानता कही गई है, क्यों कि प्रियतमा का कटाक्ष सबका अभिलषणीय है इसलिए
उसकी प्रीति से प्रवृत्त होकर शिष्य गुडजिह्विका द्वारा प्रसक्तानुप्रसक्त वस्तुओं के तत्त्व के
संवेदन से वैराग्य में पर्यवसित होगा ॥ ३० ॥
तो इसका उपसंहार करते हुए इस उक्त प्रकरण का फल कहते हैं—इस प्रकार ॰॰
जानकर ॥ ३१ ॥