भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 499, कुल 680 में से

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पृष्ठ 499

तृतीय उद्योतः ४३९ ध्वन्यालोकः सुखं विनयोपदेशान् गृह्णन्ति । सदाचारोपदेशरूपा हि नाटकादिगोष्ठी विनेयजनहितार्थमेव मुनिभिरवतारिता । किं च शृङ्गारस्य सकलजनमनोहराभिरामत्वात्तदङ्गसमावेशः काव्ये शोभातिशयं पुष्यतीत्यनेनापि प्रकारेण विरोधिनि रसे शृङ्गारा- ङ्गसमावेशो न विरोधी । ततश्च— उपदेशों को ग्रहण कर लेते हैं। सदाचार के उपदेशरूप नाटक आदि गोष्ठियों को मुनियों ने शिष्य जनों के हित के लिए ही निकाला है। और भी, शृङ्गार क्योंकि समस्त लोगों के मन को हरण करने वाला एवं सुन्दर होता है इस कारण उसके अङ्गों का समावेश काव्य में अतिशय शोभा को पुष्ट करता है, इस प्रकार भी विरोधी रस में शृङ्गार के अङ्गों का समावेश विरोधी नहीं। और इसलिए— लोचनम् यथान्यैर्व्याख्याते । सुखमिति । रञ्जनापुरःसरमित्यर्थः । ननु काव्यं क्रीडारूपं क च वेदादिगोचरा उपदेशकथा इत्याशङ्कयाह—सदाचारेति । मुनिभिरिति— भरतादिभिरित्यर्थः । एतच्च प्रभुमित्रसम्मितेभ्यः शास्त्रेतिहासेभ्यः प्रीतिपूर्वकं जायासम्मितत्वेन नाट्यकाव्यगतं व्युत्पत्तिकारित्वं पूर्वमेव निरूपितमस्मा- भिरिति न पुनरुक्तभयादिह लिखितम् । ननु शृङ्गाराङ्गताभङ्ग्या यद्विभावादिनिरूपणमेतावत्तैव किं विनेयोन्मुखी- कारः । न; अस्ति प्रकारान्तरं, तदाह—किं चेति । शोभातिशियमिति । अलङ्कार- विशेषमुपमाप्रभृतिं पुष्यति सुन्दरीकरोतीत्यर्थः । यथोक्तम्—‘काव्यशोभायाः अव्यवधान से भी प्राप्त होती है, जैसा कि अन्य लोगों द्वारा किए गए व्याख्यान में । सुखपूर्वक अर्थात् रञ्जनापूर्वक । ‘काव्य तो क्रीडा रूप है फिर वेद आदि में रहने वाली उपदेश की कथा कहां ?' यह आशङ्का करके कहते हैं—सदाचार—। मुनियों ने—। अर्थात् भरत आदि ने । प्रभुसम्मित तथा मित्रसम्मित शास्त्रों और इतिहासों से (अतिरिक्त ही) यह प्रीतिपूर्वक जायासम्मित रूप से नाट्यगत और काव्यगत व्युत्पत्तिकारित्व को हमने पहले ही निरूपण किया है, इसलिए पुनरुक्त होने के भय से यहां नहीं लिखा । ( शङ्का ) शृङ्गार के अङ्ग होने की भङ्गी जो विभाव आदि का निरूपण है उतने से ही ( काम चल जायगा ) शिष्यों को उन्मुख करना क्या ? ( समाधान ) नहीं; प्रका- रान्तर है, उसे कहते हैं—और भी—। अतिशय शोभा को—। अर्थात् उपमा प्रभृति अलङ्कार विशेष को पुष्ट करता है। जैसे, कहा है—‘काव्य की शोभा करने वाले धर्म