भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 498

४३८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः शृङ्गारविरुद्धरसस्पर्शः शृङ्गाराङ्गानां यः स न केवलमविरोधलक्ष- णयोगे सति न दुष्यति यावद्विनेयानुन्मुखीकर्तुं काव्यशोभार्थमेव वा क्रियमाणो न दुष्यति । शृङ्गाररसाङ्गैरुन्मुखीकृताः सन्तो हि विनेयाः शृङ्गार के विरुद्ध रसों में शृङ्गार के अङ्गों का जो स्पर्श है वह न केवल अविरोध के लक्षणों का योग होने पर नहीं दूषित होता, बल्कि शिष्यों को उन्मुख करने के निमित्त काव्य की शोभा के लिए ही अथवा किया जाता हुआ नहीं दूषित होता । क्योंकि शृङ्गार रस के अङ्गों द्वारा उन्मुख किए जाने पर शिष्य लोग सुखपूर्वक विनय के लोचनम् भङ्ग्या रसान्तरगता अपि विभावानुभावाद्या वर्णनीया यया शृङ्गाराङ्गभाव- मुपागमन् । यथा ममैव स्तोत्रे— त्वां चन्द्रचूडं सहसा स्पृशन्ती प्राणेश्वरं गाढवियोगतप्ता । सा चन्द्रकान्ताकृतिपुत्रिकेव संविद्विलीयापि विलीयते मे ॥ इत्यत्र शान्तविभावानुभावानामपि शृङ्गारभङ्ग्या निरूपणम् । विनेया- नुन्मुखीकर्तुं या काव्यशोभा तदर्थं नैव दुष्यतीति सम्बन्धः । वाग्रहणेन पक्षान्तरमुच्यते । तदेव व्याचष्टे—न केवलमिति । वाशब्दस्यैतद्व्याख्यानम् । अविरोधलक्षणं परिपोषपरिहारादि पूर्वोक्तम् । विनेयानुन्मुखीकर्तुं या काव्य- शोभा तदर्थमपि वा विरुद्धसमावेशः न केवलं पूर्वोक्तैः प्रकारैः, न तु काव्य- शोभा विनेयोन्मुखीकरणमन्तरेणास्ते, व्यवधानाव्यवधाने नापि लभ्येते आदि हैं उनमें भी उस शृङ्गार के अङ्गों का सम्बन्धी स्पर्श दोषयुक्त नहीं। उस अङ्गी से रसान्तरगत भी विभाव, अनुभाव आदि का वर्णन करना चाहिए जिससे (वे) शृङ्गार के अङ्ग बन जाँय । जैसे, मेरे ही स्तोत्र में— चन्द्र का भूषण धारण करने वाले तुम प्राणेश्वर को सहसा स्पर्श करती हुई, गाढ वियोग से तप्त मेरी संवित् (अन्तःकरण अथवा उसकी वृत्ति) चन्द्रकान्त की बनी पुतली की भांति विलीन होकर भी विलीन हो रही है । यहां शान्त के विभाव और अनुभावों का भी शृङ्गार की भङ्गी से निरूपण है। 'शिष्यों को उन्मुख करने के लिए जो काव्य की शोभा है उसके लिए नहीं दूषित होता' यह (वाक्य का) सम्बन्ध है । 'अथवा' ग्रहण से पक्षान्तर कहा गया है । उसी का व्याख्यान करते हैं—न केवल—। 'अथवा' शब्द का यह व्याख्यान है। परिपोष परिहार आदि अविरोध के लक्षण पहले कहे जा चुके हैं । शिष्यों को उन्मुख करने के लिए जो काव्य की शोभा है उसके लिए भी अथवा विरुद्ध समावेश है, न केवल पूर्वोक्त प्रकारों से (विरुद्ध समावेश नहीं दूषित होता है), न कि काव्य की शोभा शिष्यों को उन्मुख करने के बिना हो सकती है, (बल्कि वह तो रसान्तर से व्यवधान और