ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
पृष्ठ 497, कुल 680 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ४३७ ध्वन्यालोकः रतेश्च स्वल्पेनापि निमित्तेन भङ्गसम्भवात्सुकुमारतमः सर्वेभ्यो रसेभ्यो मनागपि विरोधिसमावेशं न सहते । अवधानातिशयवान् रसे तत्रैव सत्कविः । भवेत्तस्मिन् प्रमादो हि झटित्येवोपलक्ष्यते ॥ २९ ॥ तत्रैव च रसे सर्वेभ्योऽपि रसेभ्यः सौकुमार्यातिशययोगिनि कविरवधानवान् प्रयत्नवान् स्यात् । तत्र हि प्रमाद्यतस्तस्य सहृदयमध्ये क्षिप्रमेवावज्ञानविषयता भवति । शृङ्गाररसो हि संसारिणां नियमेना- नुभवविषयत्वात् सर्वरसेभ्यः कमनीयतया प्रधानभूतः । एवं च सति— विनेयानुन्मुखीकर्तुं काव्यशोभार्थमेव वा । तद्विरुद्धरसस्पर्शस्तदङ्गानां न दुष्यति ॥ ३० ॥ परिपोषरूप होने से और रति का थोड़े भी निमित्त से भङ्ग सम्भव हो जाने से सब रसों से अधिक सुकुमार होता है, थोड़ा भी विरोधी का समावेश नहीं सहन करता । सत्कवि उसी रस में अतिशय अवधान करे, क्योंकि उसमें प्रमाद झट से लक्षित हो जाता है ॥ २९ ॥ सभी रसों से अतिशय सौकुमार्य रखने वाले उसी रस में कवि अवधान करे, प्रयत्नशील हो । क्योंकि उसमें प्रमाद करते हुए उसका अज्ञान शीघ्र ही सहृदयों के मध्य में विदित हो जायगा । शृङ्गार रस संसारी जनों के नियमतः अनुभव का विषय होने के कारण सभी रसों से कमनीय होने के कारण प्रधानभूत है । और ऐसा होने पर— शिष्यों को उन्मुख करने के लिए जो काव्य की शोभा है उसके लिए ही उसके विरुद्ध रसों में उसके अङ्गों का स्पर्श अथवा दूषित नहीं होता ॥ ३० ॥ लोचनम् सुकुमारस्तावद्रसजातीयस्ततोऽपि करुणस्ततोऽपि शृङ्गार इति तम- प्रत्ययः ॥ २८–२६ ॥ एवं चेति । यतोऽसौ सर्वसंवादीत्यर्थः । तदिति । शृङ्गारस्य विरुद्धा ये शान्तादयस्तेष्वपि तदङ्गानां शृङ्गाराङ्गानां सम्बन्धी स्पर्शो न दुष्टः । तया सम्बन्ध है । एक तो रसमात्र सुकुमार होता है, उसमें भी करुण और उसमें भी शृङ्गार इस लिए 'तमप्' प्रत्यय है ॥ २८–२९ ॥ और ऐसा—। अर्थात् जिस कारण वह ( शृङ्गार ) सर्वसंवादी ( अर्थात् सभी सहृदयों के हृदय का संवाद रखने वाला ) है । उसके—। शृङ्गार के विरुद्ध जो शान्त